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बदलते मौसम और बढ़ते तापमान के कारण इन बर्फानी झीलों के टूटने से अचानक बाढ़ आने का खतरा बना हुआ है. इस तबाही को रोकने के लिए सरकार चार सबसे जोखिम वाली झीलों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी कर रही है.
नेपाल में आई भयंकर बाढ़ से हुए भारी नुकसान के बाद अब हिमाचल प्रदेश सरकार भी पूरी तरह से अलर्ट मोड में आ गई है. राज्य आपदा प्रबंधन के विशेष सचिव पुष्पेंद्र राणा ने बताया है कि हिमाचल के बेहद दूरदराज और ऊंचाई वाले इलाकों में करीब 67 ऐसी ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं, जो भविष्य में किसी बड़े खतरे की वजह बन सकती हैं.
इनमें से सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी जाने वाली 4 झीलों पर सरकार जल्द से जल्द अर्ली वार्निंग सिस्टम यानी समय से पहले चेतावनी देने वाली प्रणाली लगाने की दिशा में काम कर रही है. हिमालयी क्षेत्रों में बदलते मौसम और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जिससे इन झीलों में पानी का स्तर लगातार बढ़ रहा है.
जब इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटते हैं, तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर बहने लगता है. इसे वैज्ञानिक भाषा में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहते हैं. ऐसी स्थिति में बिना किसी भारी बारिश के भी घाटियों में अचानक भयंकर सैलाब आ सकता है, जो रास्ते में आने वाले पुलों, सड़कों और पूरे के पूरे गांवों को पल भर में तबाही के मुहाने पर लाकर खड़ा कर देता है, जैसा नेपाल में हुआ.
आपदा प्रबंधन अधिकारी पुष्पेंद्र राणा के मुताबिक, राज्य जलवायु परिवर्तन केंद्र ने सैटेलाइट तस्वीरों और वैज्ञानिक डेटा के आधार पर 10 हेक्टेयर से बड़े आकार की 67 झीलों को छांटा है. उन्होंने माना कि इतनी बड़ी संख्या में खतरनाक झीलों का होना वाकई बहुत चिंता का विषय है. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हाल के सालों में हुई आपदाओं ने यह साबित किया है कि अब तबाही के लिए सिर्फ भारी बारिश ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि बिना किसी मौसमी चेतावनी के भी ये झीलें तबाही मचा सकती हैं.
इसी खतरे से निपटने के लिए हिमाचल सरकार राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ मिलकर काम कर रही है. राष्ट्रीय भूस्खलन शमन कार्यक्रम के तहत किन्नौर और लाहौल-स्पीति जिले की सबसे संवेदनशील झीलों को पहले चरण में शामिल किया गया है. इनमें पारचू झील और सांगला-किन्नौर क्षेत्र की कुछ बेहद जोखिम वाली जगहें शामिल हैं.
सरकार का लक्ष्य इन झीलों पर ऐसे सेंसर और सिस्टम लगाना है, जो झील का जलस्तर या स्थिति बदलते ही तुरंत निचले इलाकों में रहने वाले लोगों और प्रशासन को खबर दे सकें. हालांकि, इस पूरी योजना के रास्ते में तकनीक की बड़ी दीवार खड़ी है. ये ज्यादातर झीलें समुद्र तल से हजारों फीट की ऊंचाई पर ऐसे दुर्गम इलाकों में हैं, जहां न तो सड़कें हैं और न ही मोबाइल नेटवर्क का कोई नामो-निशान.
ऐसे में वहां सेंसर कैसे लगाए जाएं और बिना इंटरनेट या नेटवर्क के डेटा को शहरों तक कैसे भेजा जाए, यह एक बड़ी पहेली बनी हुई है. इस समस्या का समाधान निकालने के लिए राज्य सरकार C-DAC (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्ड कंप्यूटिंग) की मदद ले रही है. NDMA से अंतिम मंजूरी मिलते ही दीपांग घाट जैसी जगहों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने का काम शुरू कर दिया जाएगा.
इसके साथ ही, अगर कभी अचानक पानी छोड़ना पड़े या कोई झील फूटे, तो पानी का स्तर कहां तक जा सकता है, इसके लिए निचले इलाकों में हाइएस्ट फ्लड लेवल (HFL) की मार्किंग भी की जा रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ भारतीय सीमा के भीतर ही करीब 1,000 ऐसी छोटी-बड़ी ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं.
इन पर 24 घंटे बारीक नजर रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेटा और तकनीक का आदान-प्रदान बहुत जरूरी हो गया है. हिमाचल प्रदेश जिस तरह से आए दिन बादलों के फटने, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए इन बर्फानी झीलों पर समय रहते नकेल कसना बेहद जरूरी हो गया है.
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