भारत
40 साल की उम्र में पीएम बने राजीव देश की राजनीति में हवा के नए झोंके की तरह आए. उनके पास राजनीति का अनुभव कम था, लेकिन उनके नजरिए में आधुनिकता थी. स्वतंत्र भारत के वो पहले प्रधानमंत्री थे जिसने आजादी के संघर्ष में खुद भागीदारी नहीं की थी.
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता पर बुधवार सुबह हमला हो गया. जन सुनवाई के दौरान एक शख्स सीएम के करीब आया, उनसे बातचीत करने लगा और इसी दौरान उनको थप्पड़ मार दिया. बताया जा रहा है कि हमलावर की मानसिक हालत ठीक नहीं है. बताया यह भी जा रहा है कि लावारिस कुत्तों के मामले में दिल्ली के सीएम के रुख से हमलावर दुखी था, इसीलिए उसने हमला कर दिया. कारण चाहे जो भी हो, लेकिन राजनेताओं पर हमले की यह देश में पहली घटना नहीं है. एक बार तो एक पूर्व प्रधानमंत्री भी इस तरह के हमले का शिकार हो चुके हैं. उन पर ये हमला देश के बाहर हुआ था और एक विदेशी सैनिक ने किया था. खास बात ये कि आज उस पूर्व प्रधानमंत्री का जन्मदिन है.
हम बात कर रहे हैं भारत में कंप्यूटर और टेलीकॉम क्रांति की शुरुआत करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की. अपनी मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद केवल 40 साल की उम्र में पीएम बने राजीव देश की राजनीति में हवा के नए झोंके की तरह आए. उनके पास राजनीति का अनुभव कम था, लेकिन उनके नजरिए में आधुनिकता थी. स्वतंत्र भारत के वो पहले प्रधानमंत्री थे जिसने आजादी के संघर्ष में खुद भागीदारी नहीं की थी. वयस्क मताधिकार, पंचायती राज व्यवस्था, अयोध्या में मंदिर का ताला खुलवाना- प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गांधी के कई फैसलों का असर आज भी देश की सियासत पर नजर आता है. विदेश नीति के मामले में राजीव ने गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) और सार्क (SAARC) को मजबूत बनाया, रूस से भारत के संबंधों को नई दिशा दी और अमेरिका के साथ भी रिश्तों को बेहतर किया. हालांकि, उनकी विदेश नीति में श्रीलंका को एक धब्बे के रूप में देखा जाता है. श्रीलंका में भारतीय शांति सेना को भेजने के राजीव के फैसले के चलते ही उन पर पहले हमला हुआ और फिर उनकी मौत की वजह भी यही बना.
1970 के दशक में श्रीलंका में लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) नाम का संगठन वजूद में आया. लिट्टे का लक्ष्य श्रीलंका से अलग एक स्वतंत्र तमिल राज्य की स्थापना करना था. उस समय श्रीलंका में सिंहली और तमिलों के बीच तनाव था, जो कई बार हिंसक संघर्ष में तब्दील हो जाता था. समय के साथ यह आंदोलन ज्यादा हिंसक होता गया. 1983 में लिट्टे के सदस्यों ने जाफना में 13 श्रीलंकाई सैनिकों की हत्या कर दी. इसके बाद लिट्टे और सेना के बीच लड़ाई तेज हो गई और श्रीलंका में गृह युद्ध छिड़ गया. श्रीलंका में तमिलों की हालत पर भारत में भी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं. तमिलों की बहुसंख्यक आबादी वाले तमिलनाडु में इसको लेकर जगह-जगह विरोध-प्रदर्शन होने लगे. सेना के साथ तनाव बढ़ा तो श्रीलंका से लाखों तमिल समुद्र के रास्ते भारत आने लगे. यानी पड़ोसी देश में तमिलों पर हो रहे कथित अत्याचार का सीधा असर अब भारत पर पड़ने लगा था.
1986 में स्थिति और गंभीर हो गई जब जाफना पर श्रीलंकाई सेना ने हमला कर दिया. जाफना तमिलों का मजबूत गढ़ था. सेना ने इस पर हमला किया, जिसमें कई तमिलों की जान चली गई. इसके बाद राजीव गांधी की सरकार ने बड़ा फैसला लिया. भारत ने जाफना में फंसे तमिलों की मदद के लिए ऑपरेशन पवन की शुरुआत की. इसके तहत भारतीय सैनिकों को श्रीलंका भेजा गया. भारत ने शुरुआत में समुद्री मार्ग से अपने सैनिक भेजने की कोशिश की, लेकिन श्रीलंकाई सेना ने इसकी इजाजत नहीं दी. राजीव और उनके कूटनीतिक विशेषज्ञों को श्रीलंकाई सेना की ये हरकत नागवार गुजरी. इसके बाद भारत ने ऐलान कर दिया कि वह तमिलों तक हवाई मार्ग से मदद पहुंचाएगा, जिसमें वायुसेना भी शामिल होगी. साथ ही श्रीलंकाई सेना को सीधी चेतावनी दी कि भारतीय वायु सेना के विमानों पर हमला नहीं करे, नहीं तो इसे भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा माना जाएगा.
भारत के इस ऐलान के बाद श्रीलंका के पास विकल्प नहीं बचा. श्रीलंका सरकार लिट्टे के साथ समझौता करने को तैयार हो गई. जुलाई 1987 में भारतीय शांति सेना की जाफना में तैनाती शुरू हुई. अब शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने थे. इसके लिए राजीव गांधी कोलंबो पहुंचे. 30 जुलाई को जब उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर दिया जा रहा था, विजिथा रोहन विजेमुनि नाम के नौसैनिक ने अपनी बंदूक की बट से राजीव पर हमला कर दिया. राजीव ने समय रहते खुद को संभाल लिया, नहीं तो उन्हें गंभीर चोट लग सकती थी. विजिथा सिंहली समुदाय से था. वह शांति सेना भेजने के फैसले को लेकर राजीव गांधी से नाराज था. राजीव की सुरक्षा टीम ने विजिथा को घेर लिया. बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया.
करीब तीन साल तक भारतीय शांति सैनिक श्रीलंका में तैनात रहे. करीब 1200 भारतीय जवान इस दौरान शहीद हुए. राजीव का यही फैसला अततः उनकी असामयिक मौत का भी कारण बना. शांति स्थापना के लिए भारतीय सैनिकों को भेजने का निर्णय लिट्टे को भी पसंद नहीं आया. लिट्टे हमेशा के लिए राजीव गांधी का दुश्मन बन गया और 1991 में एक आत्मघाती हमले में उनकी हत्या कर दी.
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