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Digvijay Singh B'Day: 77 साल के हुए दिग्गी राजा, कभी उनके चलते थानेदार ने रोक दी थी नरेंद्र मोदी की कार 

28 फरवरी, 2025 को अपना 77वां जन्मदिन मना रहे दिग्विजय सिंह को दिग्गी राजा नाम मिलने की कहानी बड़ी रोचक है. नरेंद्र मोदी से उनकी सियासी अदावत भी जगजाहिर है.

Digvijay Singh B'Day: 77 साल के हुए दिग्गी राजा, कभी उनके चलते थानेदार ने रोक दी थी नरेंद्र मोदी की कार 
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कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह आज 77 साल के हो गए हैं. 28 फरवरी 1947 को इंदौर में पैदा हुए दिग्विजय को सियासत विरासत में मिली थी. उनके पिता बलभद्र सिंह भी विधायक रहे थे. दिग्विजय ने साल 1969 में केवल 22 साल की उम्र में राघोगढ़ नगरपालिका का चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पारी का आगाज किया था. इसके बाद वे विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री बने. अभी वे राज्यसभा के सांसद हैं. कभी कांग्रेस के सबसे मजबूत नेताओं में गिने जाने वाले दिग्विजय का सियासी करियर अब अंत की ओर है, लेकिन वे अब भी प्रासंगिक बने हुए हैं. बहरहाल, दिग्विजय को राजनीति विरासत में भले मिली हो, लेकिन दिग्गी राजा नाम का राघोगढ़ राजघराने से कोई कनेक्शन नहीं है. दिग्विजय को यह नाम एक अखबार के संपादक ने दिया था, लेकिन इसकी कहानी बड़ी रोचक है.

दरअसल, राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने युवा कांग्रेस नेताओं की एक कोर टीम बनाई थी. दिग्विजय सिंह उस समय लोकसभा के सांसद थे और उन्हें भी इस टीम में रखा गया था. दिल्ली के एक बड़े होटल में एक मीटिंग हो रही थी जिसमें कांग्रेस के बड़े नेता और पत्रकार मौजूद थे. इसमें आरके करंजिया भी थे जो एक अखबार के संपादक थे.

मीटिंग के दौरान करंजिया जब भी दिग्विजय सिंह का नाम लेते, अटक जाते. कई बार कोशिश करने के बाद भी वे दिग्विजय का सही उच्चारण नहीं कर पाए. तब करंजिया ने उन्हें पहली बार दिग्गी राजा कहा. यह नाम छोटा और बोलने में आसान था. करंजिया ने अपनी सहूलियत के लिए उन्हें दिग्गी राजा कहा था, लेकिन तभी से यह नाम दिग्विजय के साथ जुड़ गया. चुनावी रैलियों से लेकर अखबार की खबरों तक में दिग्विजय के लिए अक्सर दिग्गी राजा नाम का इस्तेमाल होता है. हालांकि, दिग्विजय को खुद यह नाम पसंद नहीं है.

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दिग्विजय की शख्सियत ऐसी है कि उन्हें पसंद या नापसंद किया जा सकता है, अनदेखी नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनका रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है. दिग्विजय और मोदी एक-दूसरे के सियासी दुश्मन हैं और इसकी शुरुआत 1990 के दशक में ही हो गई थी. एक बार तो ऐसा हुआ था कि एक अदने से थानेदार ने भोपाल में नरेंद्र मोदी की कार रोक दी थी और इसकी वजह थे दिग्विजय सिंह.

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ये वाकया 1998 का है जब मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने थे और मोदी को प्रदेश भाजपा का प्रभारी बनाया गया था. तब दिग्विजय मुख्यमंत्री थे. मोदी रायपुर से भोपाल लौटे थे और पार्टी के प्रदेश कार्यालय लौटे थे. एयरपोर्ट से दो कारों में मोदी कार्यालय की ओर निकले थे. उनके साथ पार्टी के कुछ नेता और कुछ पत्रकार भी थे. मोदी की कार भोपाल के हमीदिया चौराहे पर पहुंची तो एक थानेदार ने उसे रुकने का इशारा किया. ड्राइवर ने पुलिसवाले को समझाने की कोशिश की. ड्राइवर ने कार में नरेंद्र मोदी के होने के बारे में भी बताया, लेकिन पुलिसकर्मी पर कोई असर नहीं पड़ा. उसने यह धमकी भी दी कि विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा की सरकार बनी तो उसे नतीजे भुगतने होंगे. थानेदार इसके बाद भी टस से मस नहीं हुआ.

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हुआ यूं था कि ठीक उसी समय दिग्विजय सिंह का काफिला हमीदिया चौराहे से गुजरने वाला था. इसके लिए ट्रैफिक को रोका गया था. सड़क पर पुलिसकर्मी तैनात थे. मोदी की कार को तब तक रुकना पड़ा जब तक कि दिग्विजय का काफिला वहां से गुजर नहीं गया. जब विधानसभा चुनाव हुए तो सभी अनुमानों को गलत साबित करते हुए कांग्रेस सत्ता में वापसी करने में सफल रही. यह पहला मौका था जब मोदी के प्रभारी रहते भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था. इससे पहले उन्हें हिमाचल प्रदेश और हरियाणा का प्रभारी बनाया गया था और दोनों जगह भाजपा जीती थी. दिग्विजय से मोदी की राजनीतिक अदावत की शुरुआत भी शायद तभी हो गई थी.    

 

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