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राहुल गांधी के ताजा आरोप बेहद संगीन हैं. उन्होंने साफ कहा है कि नरेंद्र मोदी वोटों की चोरी कर तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद भी कांग्रेस ने ऐसे आरोप लगाए थे.
2019 के लोकसभा चुनाव का समय था. कांग्रेस पार्टी राफेल खरीद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने में लगी थी. इसी दौरान कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एक नारा उछाला- चौकीदार चोर है. बीजेपी और पीएम मोदी ने थोड़ा इंतजार किया, यह जानने के लिए कि राहुल के नारे का आम लोगों पर क्या असर होता है. जब देखा कि यह मुद्दा जोर नहीं पकड़ रहा तो मोदी ने सोशल मीडिया पर 'मैं भी चौकीदार' अभियान शुरू कर दिया. कुछ ही देर में यह एक्स (तब ट्विटर) पर ट्रेंड करने लगा. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान मैं भी चौकीदार लिखी टोपी पहने बीजेपी कार्यकर्ताओं ने ऐसा माहौल बना दिया कि चुनाव में बीजेपी को पहले से भी बड़ी जीत मिल गई. राहुल गांधी का नारा टांय टांय फिस्स हो गया. चौकीदार चोर है की चर्चा इसलिए क्योंकि राहुल ने एक बार फिर नया नारा दिया है- वोट चोर सरकार. अपने आरोप के पक्ष में वे जगह-जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे हैं. सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन भी हो रहे हैं, लेकिन आम लोगों का इससे खास जुड़ाव अब तक देखने को नहीं मिला. ये आश्चर्यजनक है क्योंकि वोट हरेक नागरिक का मूलभूत अधिकार है. ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि कांग्रेस के नारे लोगों को प्रभावित क्यों नहीं कर पाते.
संगीन हैं वोट चोरी के आरोप
राहुल गांधी के ताजा आरोप बेहद संगीन हैं. उन्होंने साफ कहा है कि नरेंद्र मोदी वोटों की चोरी कर तीसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद भी कांग्रेस ने ऐसे आरोप लगाए थे. फिर जब बिहार में मतदाता पुनरीक्षण अभियान शुरू हुआ तो इस मुद्दे ने तूल पकड़ा. राहुल ने इस साजिश में चुनाव आयोग को भी कटघरे में खड़ा किया है. ये आरोप पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करने वाले हैं. दूसरी विपक्षी पार्टियां भी इस मुद्दे पर राहुल के साथ आ गई हैं, लेकिन आम लोगों में इसको लेकर खास उत्सुकता नहीं दिख रही. सामान्य बेरुखी बताकर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती क्योंकि पारदर्शी और साफ सुथरी चुनाव व्यवस्था ही लोकतंत्र का आधार होता है.
कांग्रेस की अपनी कमजोरियां
कांग्रेस के आरोपों के प्रति आम लोगों की उदासीनता का सबसे बड़ा कारण पार्टी खुद ही है. देश की सबसे बड़ी पार्टी 2009 के बाद से सत्ता से दूर है, लेकिन उसके पुराने कारनामे अब भी लोगों को याद हैं. कांग्रेस भ्रष्टाचार का कोई मुद्दा उठाती है तो बीजेपी कॉमनवेल्थ, 2जी और कोयला घोटाले की याद दिलाने लगती है. नैरेटिव वॉर में भी कांग्रेस, बीजेपी से पिछड़ जाती है. ताज्जुब है कि मोदी अब भी कांग्रेस पर जवाहरलाल नेहरू का नाम लेकर तंज कसते हैं जबकि उनकी मौत को अब 60 साल से ज्यादा हो चुके हैं. कांग्रेस आज तक इसका प्रतिकार तक नहीं कर पाई. एनडीए सरकार की खासियत है कि वह दूसरों की उपलब्धियों की भी अपने नाम पर ब्रांडिंग कर लेती है. दूसरी ओर, कांग्रेस अपने प्रतीकों और उपलब्धियों को भी सहेजकर नहीं रख पा रही. आजन्म कांग्रेसी रहे सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मदिन पर कांग्रेस से बड़ा आयोजन बीजेपी करती है. कांग्रेस का लुंज-पुंज संगठन भी इसका एक बड़ा कारण है. संगठन की कमजोरी के चलते पार्टी नेतृत्व के संदेश कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंच पाते. कई बार पार्टी की अपनी नीतियां भी इसकी वजह बन जाती हैं. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली पार्टी के मंच पर सबसे आगे यदि सजायाफ्ता लालू यादव बैठे हों, तो आम लोगों के लिए भरोसा करना मुश्किल है. बीजेपी को कांग्रेस के इस विरोधाभास का अंदाजा है. वह मौके की ताक में रहती है और सही समय पर ऐसा प्रहार करती है कि कांग्रेस के लिए जवाब देना टेढ़ी खीर साबित होता है.
नारों का चुनाव भी अहम
सियासी कारणों से अलग हटकर देखें तो नारों का भी एक मनोविज्ञान होता है. ज्यादातर सकारात्मक नारे ही लोगों के दिलों में उतर पाते हैं. नकारात्मक नारे सभी लोकप्रिय होते हैं जब लोगों में नाराजगी ज्यादा हो. 1971 मे विपक्षी गठबंधन ने इंदिरा हटाओ, देश बचाओ का नारा दिया. इंदिरा ने इसको पलट दिया और नारा दिया- गरीबी हटाओ. इंदिरा गांधी भारी बहुमत से ये चुनाव जीती. वहीं, 1977 में विपक्ष का नारा था- इंदिरा का देखो खेल, खा गई चीनी पी गई तेल. नकारात्मक होते हुए भी इंदिरा इसे पलट नहीं पाईं क्योंकि आपातकाल की ज्यादतियों के कारण लोग उनसे ज्यादा नाराज थे. नारों का ये मनोविज्ञान विदेशों में भी देखने को मिलता है. बराक ओबामा जब पहली बार सीनेटर चुने गए तो विरोधियों ने उन्हें मुसलमान कहकर प्रचारित करना शुरू कर दिया. ओबामा बार-बार कहते कि वे मुसलमान नहीं हैं, लेकिन वो बेअसर होता. 2008 में राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कहना शुरू किया कि वे ईसाई हैं. इसके बाद मुसलमान शब्द का शोर कम पड़ने लगा.
मोदी से मुकाबले की चुनौती
राहुल गांधी की समस्या यह भी है कि उनका सामना एक ऐसे शख्स से है जो विपक्ष के तीर को उसी की ओर मोड़ने में पारंगत है. 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी को 'मौत का सौदागर' कहा था. सोनिया और कांग्रेस को आज तक इसका अफसोस होगा. 2014 के लोकसभा चुनाव में मणिशंकर अय्यर ने मोदी को चायवाला और प्रियंका गांधी ने नीच कहा था. मोदी ने इसे कांग्रेस के खिलाफ ही हथियार बनाकर उसे पटकनी दे दी थी. राहुल ने इस बार मुद्दा ऐसा उठाया है जिसका वास्ता आम लोगों से है. लोकतंत्र मे वोट का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण होता है. इस पर किसी तरह की चोट नागरिकों को बर्दाश्त नहीं होती. यदि वे वोट चोरी के आरोप सिद्ध करने में सफल रहे तो चुनाव में फायदा मिलने की उम्मीद हो सकती है, बशर्ते मोदी फिर इसकी कोई काट न ढूंढ लें.
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