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Chirag Paswan: एनडीए में रहते हुए भी नीतीश पर हमलावर और तेजस्वी-प्रशांत किशोर से नजदीकी, चिराग पासवान की यह रणनीति उन्हें बिहार चुनाव के बाद सत्ता की समीकरणों में एक बड़ा चेहरा बना सकती है. क्या चिराग अपने लिए एक बड़े मौके के रूप में देख रहे हैं?
एक थे रामविलास पासवान. 'भारतीय राजनीति के मौसम वैज्ञानिक'. चुनाव से पहले उनकी गतिविधियों पर विशेषज्ञों की भी नजर टिकी रहती थी. रामविलास पासवान के सियासी फैसलों में विचारधारा उतनी महत्वपूर्ण नहीं थी जितनी सत्ता और टाइमिंग थी. रामविलास के बारे में माना जाता था कि वे हवा का रुख भांपने में उस्ताद थे. वे चुनाव से पहले जिस खेमे को चुनते थे, उसकी जीत की संभावना ज्यादा मानी जाती थी. यही कारण था कि रामविलास केंद्र में कांग्रेस, बीजेपी, जनता दल- हर पार्टी की सरकार में केबिनेट मंत्री रहे. रामविलास पासवान की अब मृत्यु हो चुकी है, लेकिन उनके बेटे चिराग पासवान राजनीति में एक्टिव हैं. केंद्रीय मंत्री हैं और उनकी पार्टी एलजेपी (आर) बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है. बिहार में करीब तीन महीने बाद विधानसभा चुनाव होने हैं. ताज्जुब की बात है कि चिराग इन चुनावों से पहले एक पहेली बने हुए हैं. उनकी गतिविधियों से चुनाव के नतीजों का कोई अंदाजा तो नहीं ही मिल रहा, चिराग की अपनी भूमिका भी अस्पष्ट दिख रही है. वे जिस गठबंधन का हिस्सा हैं, उसी की सरकार को लॉ एंड ऑर्डर पर रोज घेर रहे हैं. सूबे की राजनीति में तीसरा कोण बनने की उम्मीद में पहली बार चुनावी मैदान में उतर रहे प्रशांत किशोर की खुलेआम तारीफ भी कर रहे हैं. तो क्या मौसम वैज्ञानिक का बेटा चुनावी बयार का रुख नहीं भांप पा रहा...या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि चिराग मानसून के बाद कटने वाली फसल के लिए अभी से अपने प्यादे फिट कर रहे हैं.
चिराग की फ्यूचर प्लानिंग को डिकोड करने की कोशिश करें, इससे पहले उनके आसपास फैले कंफ्यूजन को समझना जरूरी है. चिराग एनडीए का हिस्सा हैं लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को निशाने पर लेने का कोई मौका नहीं छोड़ते. खुद सांसद और मंत्री हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव लड़ने का संकेत दे रहे हैं. उनकी सभाओं में नारा भी बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट का लगता है जबकि गठबंधन की सभाओं में फिर एक बार, एनडीए सरकार के नारे गूंजते हैं. इतना ही नहीं, बिहार में फिलहाल एनडीए को सबसे ज्यादा खतरा तेजस्वी यादव और प्रशांत किशोर से है. चिराग, तेजस्वी को अपना छोटा भाई और प्रशांत किशोर को दोस्त मानते हैं. ये कंफ्यूजन इतना ज्यादा है कि अब एनडीए के नेता भी चिराग के रवैये पर सवाल खड़े कर रहे हैं. दूसरी ओर, पप्पू यादव उन्हें महागठबंधन में शामिल होने का न्यौता दे रहे हैं.
इससे पहले कि आप चिराग के बारे में कोई फैसला करें, ये जान लीजिए कि उनके लिए ये घालमेल कोई कंफ्यूजन नहीं है. ये उनकी चुनावी रणनीति का हिस्सा है. चिराग की निगाहें जितनी इस चुनाव पर हैं, उतनी ही भविष्य पर हैं. उन्हें पता है कि उनका दुश्मन नंबर 1 कौन है और भविष्य में कौन उनका दोस्त हो सकता है. वे इसी को ध्यान में रखकर चुनावी बिसात पर अपने प्यादे बिठा रहे हैं.
चिराग अपने बयानों में बिहार सरकार को कटघरे में खड़ा करते हैं जिसके मुखिया नीतीश कुमार हैं, लेकिन वे बीजेपी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोलते. खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताने वाले चिराग कई मौकों पर प्रधानमंत्री को अपना अभिभावक बता चुके हैं. उन्होंने कभी ये भी नहीं कहा कि वे एनडीए का हिस्सा नहीं रहेंगे. इससे स्पष्ट है कि उनकी दुश्मनी नीतीश से है. उन्हें पता है कि बिहार की राजनीति में जिस बढ़ी हुई भूमिका के लिए वे खुद को पेश करना चाह रहे हैं, वो नीतीश के रहते उन्हें नहीं मिल सकती. चिराग एनडीए में रहकर नीतीश का विकल्प बनना चाहते हैं और इस चुनाव को अपने लिए एक बड़े मौके के रूप में देख रहे हैं.
चिराग के लिए ये चुनाव वास्तव में एक बड़ा अवसर हो सकता है. नीतीश अपने सियासी करियर के अंत की ओर हैं. जेडीयू में उनका विकल्प अब तक कोई सामने नहीं आया. बीजेपी के पास बिहार में नेताओं की कमी नहीं है, लेकिन कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है. एनडीए के बाकी दलों में कोई ऐसा नहीं है जिसका पूरे बिहार में वोट बैंक हो, सिवाय चिराग की एलजेपी (आर) के. चिराग खुद को उस हालत के लिए तैयार कर रहे हैं जबकि नीतीश की पार्टी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए. यदि ऐसा होता है तो वे खुद को सीएम पद का दावेदार घोषित कर सकते हैं.
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हालांकि, चिराग भी जानते हैं कि ये इतना आसान नहीं है. बीजेपी ने 2020 में कम सीटें मिलने के बावजूद नीतीश को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन अब ऐसा संभव नहीं है. यही वजह है कि वे अपने सभी विकल्प खुले रख रहे हैं. वे कभी तेजस्वी यादव को छोटा भाई बताते हैं तो कभी प्रशांत किशोर को ईमानदार नेता. बिहार चुनाव में यदि किसी गठबंधन को बहुमत नहीं मिला तो राजनीतिक उलटफेर की पूरी संभावना है. ऐसी हालत में कौन किसके साथ होगा, ये अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल है. चिराग को अंदेशा है कि चुनाव के बाद बिल्ली के भाग्य से छींका टूट सकता है. छींका नहीं भी टूटा तो नीतीश कुमार पर लगातार हमले कर वे सीटों के बंटवारे में अपनी पार्टी के लिए ज्यादा सीटों का दबाव तो बना ही सकते हैं.
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