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बिहार के गया जी में प्रेतशिला नाम की एक पहाड़ी है जिसके बारे में तो आप जानते ही होंगे, लेकिन क्या आप जातने हैं कि प्रेतशिला कभी सोने की हुआ करती थी आइए जानते ये अनूठी एतिहासिक कहानी
बिहार में एक बहुत फेमस शहर हैं जिसे गया के नाम से जाना जाता है. ये शहर कई अलग-अलग मायनों में अपने आप को महत्वपूर्ण बनाता है पर हिंदू धर्म के मानने वाले लोगों के लिए ये शहर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है. सबसे के लिए ये शहर गया होगा पर हिंदू परंपरा का अनुसरण करने वाले लोगों के लिए ये शहर गयाजी है जिसे एक पवित्र शहर का दर्जा प्राप्त है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह से प्रयागराज और काशी. यूं तो इस शहर के इतिहास के बारें में कई कहानियां प्रचिलित हैं, ऐसा कहा जाता है कि मानव की पृथ्वी पर अंतिम यात्रा का यह शहर आखिरी पड़ाव होता है. इसके बाद जीवात्मा धराधाम से मुक्त हो जाती है.
प्रेतशिला और ब्रह्मा जी की वरदान
आज हम आपको इसी शहर से जुड़े एक खास स्थान के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके इतिहास की कहानी बहुत फेमस हैं. गया जी जिले में एक प्रेतशिला नाम का पहाड़ी हैं. इसके बारें में आपने जरूर सुना होगा. एक पौराणिक कथा के अनुसार कहते है कि ये प्रेतशिला कभी सोने की हुआ करती थी. इसे ब्राह्मा जी ने ब्राह्मणों को दान में दिया था. ब्राह्मा जी ने शर्त रखी थी कि अगर इस पहाड़ी को कोई ब्राह्मणों से छीनेगा या दान में लेगा तो यह उसी समय पत्थर की हो जाएगी. इस शिला पर धर्मराज की नजर पड़ी तो उन्होंने छल से इसे एक पंडा को दान में दिलवा दिया. जैसे ही इस प्रेतशिला के दान का संकल्प ब्राह्मण ने पढ़ा पहाड़ी तुरंत पत्थर की हो गई.
धामी पंडा ने सुनाई सारी कहानी
गया जी के धामी पंडा नरेश इसके बारे में एक कहानी बताते है उनका कहना है कि जब ब्रह्मा जी ने गयासुर के शरीर पर यज्ञ किया तो उसका शरीर 5 कोस में फैल गया था. जिस प्रेतशिला पर्वत की बात हम कर रहे वहां गयासुर का अंगूठा आया था. तबी ब्रह्मा जी ने कहा था कि यहां प्रेतो का पिंडदान करने से उनकी मुक्ति हो जाएगी. उसी समय जब ब्र्ह्मा जी ब्रह्माणों से दान न लेने को कहा और कहा कि मै तुम्हें इतनी संपत्ति दूंगा कि कभी कमी नहीं पड़ेगी.
कैसे सोना हुआ पत्थर
तभी ब्रह्मा जी के वरदान से ये पहाड़ सोने का हो गया. इस पहाड़ के नीचे ब्रह्मकुंड तालाब भी था. धामी पंडा नरेश के अनुसार इस तालाब में पानी की जगह दूध की धारा रहती थी, लेकिन कलयुग आते ही यह शिला बिलुप्त हो गई. दरअसल एक बार धर्मराज यहां अपने पू्र्वजों का पिंडदान करने प्रेतशिला पर आए. उन्होंने सभी पंडों को दान देना शुरू किया लेकिन किसी ने भी उनका दान स्वीकार नहीं किया. तब राजा ने सोचा कि अगर ब्राह्मणों ने दान नहीं लिया तो पूजा सफल नहीं होगी. इसलिए उन्होंने सभी ब्राह्मणों को घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया.
ब्रह्मा जी ने दिया श्राप
भोजन के बाद ब्राह्मणों के पान दिया गया, इस पान में पंचरत्न का भस्म मिला हुआ था. जैसै ही ब्राह्मणों ने पान खाया तुरंत आकाशवाणी हुई कि ब्राह्मणों ने दान लिया है और तभी ब्रह्मा जी ने श्राप दिया कि यह सोने की शिला पत्थर की हो जाएगी और तालाब पानी का हो जाएगा. उनके पद चिन्ह पर पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिलेगा. आज भी ब्रह्मा जी के पद चिन्ह पर सोने की तीन लकीरें इस पहाड़ पर दिखती हैं.