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Bihar Election 2025: इलेक्शन के ऐलान से पहले ही चुनावी मोड में आए PM मोदी, उनके मिशन से समझिए मगध का मर्म

मगध को गुरु चाणक्य की धरती माना जाता है. वही चाणक्य जिसने नंद वंश का अंत कर चंद्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी दिलाई थी. तब चाणक्य ने मगध का शासक चुना था.

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Bihar Election 2025: इलेक्शन के ऐलान से पहले ही चुनावी मोड में आए PM मोदी, उनके मिशन से समझिए मगध का मर्म
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को गयाजी में थे. उन्होंने यहां हजारों करोड़ की विकास परियोजनाओं का ऐलान किया. इस दौरान बिहार में विधानसभा चुनाव के ऐलान से पहले ही मोदी के लगातार दौरों से ये तो स्पष्ट है कि वोटर लिस्ट रिवीजन को लेकर कांग्रेस और आरजेडी की यात्रा ने एनडीए को परेशानी में डाल दिया है. मोदी ने अपनी सभा के लिए मगध क्षेत्र के गयाजी को क्यों चुना, ये जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं. साल 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव का समय था. लालू प्रसाद यादव हर हाल में जीतना चाहते थे. वे तब बक्से से जिन्न निकलने का दावा करते थे. लालू अपने चुनावी तिकड़मों के लिए मशहूर थे, लेकिन उनकी जीत की राह में विपक्षी पार्टियों से ज्यादा टीएन शेषन रुकावट बन रहे थे. यही वो दौर था जब शेषन ने कहा था कि वे नाश्ते में राजनेताओं को खाते हैं. इसका जवाब लालू ने अपनी चिरपरिचित गंवई शैली में कुछ इस तरह दिया था- ऊ शेषनवा जानता नै है. उसको भैंस पर बिठाकर गंगाजी में हेला देंगे. तब चुनाव प्रक्रिया को साफ-सुथरा बनाने की शेषन की तमाम कोशिशों के बीच भी लालू का विजय रथ नहीं रुका था. इसकी सबसे बड़ी वजह बिहार का मगध और सारण क्षेत्र था. 

मगध पर बीजेपी की निगाहें

तभी से ये दोनों इलाके आरजेडी का मजबूत गढ़ बने हुए हैं. नीतीश कुमार ने कुछ समय के लिए इसमें सेंध लगाई और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए. हालांकि, 2020 के विधानसभा चुनाव में मगध क्षेत्र में नीतीश की पार्टी जेडीयू का सूपड़ा साफ हो गया था. बीजेपी भी 3 सीटें ही जीत पाई थी. सच्चाई ये है कि मगध क्षेत्र ही बिहार का मुख्यमंत्री तय करता है. कोई आश्चर्य नहीं कि बीजेपी की निगाहें भी इस क्षेत्र पर टिकी हैं. शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार दौरे और गयाजी में जनसभा को संबोधित करते हुए हजारों करोड़ की विकास परियोजनाओं की सौगात देना इसी सिलसिले की एक कड़ी हो सकती है. 

2020 में मगध में जेडीयू का सफाया

मगध को गुरु चाणक्य की धरती माना जाता है. वही चाणक्य जिसने नंद वंश का अंत कर चंद्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी दिलाई थी. तब चाणक्य ने मगध का शासक चुना था. अब मगध बिहार का शासक चुनता है. गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद और अरवल जिले मगध क्षेत्र में आते हैं. इन 5 जिलों को मिलाकर 26 विधानसभा सीटें हैं. 2020 के चुनाव में इनमें से 20 सीटें महागठबंधन ने जीती थीं. एनडीए को बमुश्किल 6 सीटें मिल पाई थीं. इस क्षेत्र के तीन जिलों में एनडीए का खाता तक नहीं खुला था. जेडीयू का तो पूरे मगध क्षेत्र से सफाया हो गया था. इससे पहले 2015 में भी एनडीए को 5 सीटें ही मिली थी. 2015 में जेडीयू भी महागठबंधन के साथ था. पिछले साल लोकसभा चुनाव में भी इस क्षेत्र की तीन में से दो सीटें आरजेडी ने जीती थीं.

'नीतीश के बाद' पर बीजेपी की नजर

इससे पहले 2010 में बीजेपी और जेडीयू एक साथ लड़े थे. तब नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग ने मगध क्षेत्र में महागठबंधन का सफाया कर दिया था. स्पष्ट है कि मगध का इलाका बीजेपी की कमजोर नस रहा है. पार्टी खुद भी इसे समझती है. जीतनराम मांझी की हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के साथ गठबंधन इसी सोच का नतीजा है. मांझी का सबसे ज्यादा प्रभाव मगध क्षेत्र में ही है. 2025 का बिहार चुनाव बीजेपी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि नीतीश का सियासी करियर अब अंत की ओर है. बीजेपी अपने दम पर बिहार की सत्ता हासिल करने का इरादा कर चुकी है. इसकी शुरुआत के लिए यह चुनाव शायद सबसे मुफीद समय है.

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