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अमेरिका में हर देश के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड बनाये जाते हैं. इनकी संख्या और प्रतिशत रखा जाता है, जो भारत का भर चुका है. 1 अक्टूबर से नया अमेरिकी वित्तीय वर्ष शुरू होगा, जिसके बाद वीजा संख्याओं का नया कोटा फिर से जारी किया जाएगा.
अमेरिका में बसने और अपनी मेहनत के दम पर परमानेंट रेजीडेंसी पाने का सपना देख रहे सबसे काबिल भारतीयों पर बहुत बड़ा संकट मंडराने लगा है। अगर आप या आपका कोई करीबी अमेरिका में ग्रीन कार्ड की फाइल प्रोसेस होने का इंतजार कर रहा है, तो विदेश मंत्रालय (US State Department) की इस ताजा चेतावनी को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने अपने सितंबर के 'वीजा बुलेटिन' में अलर्ट जारी किया है. इसमें अमेरिका का कहना है कि चालू वित्तीय वर्ष, जो 30 सितंबर को खत्म हो रहा है. इसके खत्म होने से पहले ही EB-1 वीजा कैटेगरी का कोटा भारतीयों के लिए पूरी तरह खत्म हो सकता है. इसकी वजह इस बार EB-1 वीजा की मांग इतनी ज्यादा रही कि भारत के लिए तय की गई सालाना सीमा (Pro-rated limit) समय से पहले ही पूरी होने की कगार पर है, जैसे ही यह सीमा छुएगी, अमेरिकी सरकार इस कैटेगरी में नये वीजा जारी करना तुरंत बंद कर देगी.
EB-1 (Employment Based First Preference) कोई आम वीजा श्रेणी नहीं है. इसे अमेरिका में 'आइंस्टीन वीजा' की तरह देखा जाता है. इसमें देश के वो सबसे प्रतिभाशाली लोग आते हैं जो, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित वैज्ञानिक, शोधकर्ता या प्रोफेसर हैं. असाधारण प्रतिभा वाले एथलीट, कलाकार या एंटरप्रेन्योर हैं. इसके साथ ही मल्टीनेशनल कंपनियों के शीर्ष एक्जीक्यूटिव और मैनेजर्स शामिल हैं. अब तक भारतीयों के बीच यह धारणा थी कि EB-2 या EB-3 टेक्निकल प्रोफेशनल्स और ग्रेजुएट लोगों का सालों का लंबा बैकलॉग है, लेकिन EB-1 सबसे फास्ट ट्रैक रास्ता है, लेकिन अब इस सबसे प्रीमियम रास्ते पर भी ताला लगने की नौबत आ गई है.
अमेरिका में हर देश के लिए रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड के 7 प्रतिशत पर-कंट्री कैप होता है.पहले जो भारतीय H-1B पर थे और EB-2/EB-3 की दशकों लंबी कतार से परेशान थे, उन्होंने अपनी नौकरी, पद और योग्यता को अपग्रेड करके EB-1 की कतार में शिफ्ट होना शुरू कर दिया. पिछले 2-3 सालों में इस पोर्टिंग (Category Upgrade) का दायरा इतनी तेजी से बढ़ा कि जो EB-1 श्रेणी कभी खाली रहती थी, वह आज पूरी तरह से ओवरफ्लो हो गई है. यानी समस्याओं से बचने के लिए भारतीय प्रोफेशनल्स से जो रास्ता निकाला था. अब वह पूरी तरह ओवरफ्लो हो चुका है.
यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों के जीवन और उनके बच्चों के भविष्य से जुड़ा व्यावहारिक संकट है, जो बच्चे अपने माता-पिता के वीजा पर अमेरिका में रह रहे हैं, वे 21 साल की उम्र होते ही सेल्फ-वीजा के दायरे से बाहर हो जाते हैं. ग्रीन कार्ड में देरी का मतलब है कि बच्चों को या तो स्टूडेंट वीजा पर जाना पड़ेगा या अमेरिका छोड़ना पड़ेगा. वहीं ग्रीन कार्ड न मिलने तक प्रोफेशनल्स न तो खुलकर नौकरियां बदल सकते हैं और ना ही अपनी खुद की टेक कंपनी शुरू करने का जोखिम ले सकते हैं.