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'DM और अधिकारियों की सैलरी से काटो मुआवजे की रकम', नोएडा प्रदर्शन मामले में आरोपी आकृति को रिहा करते हुए बोला HC

हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस वजह या उचित प्रक्रिया के नागरिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन करने वाली ज्यादतियों या गैर कानूनी कार्यों को सुधारते समय, न्यायपालिका पीड़ित नागरिकों को मुआवजा दिलाने के लिए कड़े आदेश दे सकती है.

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'DM और अधिकारियों की सैलरी से काटो मुआवजे की रकम', नोएडा प्रदर्शन मामले में आरोपी आकृति को रिहा करते हुए बोला HC

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Image Source: Allahabad High Court)

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  • नोएडा प्रदर्शन में हिंसा भड़काने की आरोपी आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करने का आदेश
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिरासत का आदेश जारी करने के तरीके और प्रक्रिया पर जताई नाराजगी
  • हाईकोर्ट ने कहा- आकृति चौधरी को दिया जाए पांच लाख रुपये का मुआवजा
  • हाईकोर्ट ने मुआवजे की रकम जिला मजिस्ट्रेट और हिरासत का आदेश जारी करने वाले अधिकारियों की सैलरी काटने को कहा

अप्रैल में हुए नोएडा मजदूर प्रदर्शन में हिंसा भड़काने की आरोपी आकृति चौधरी की हिरासत रद्द करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है. दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (National Security Act, NSA) के तहत हिरासत में लिया गया था. कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट की ओर से हिरासत का आदेश जारी किए जाने के तरीके की आलोचना की है.

आकृति चौधरी को मिलेगा पांच लाख रुपये का मुआवजा

जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि आकृति चौधरी को लगातार जेल में रखने से अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है क्योंकि हिरासत के आधार में कोई ठोस वजह नहीं नजर आ रही है. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार कोई ऐसा मैसेज या वीडियो नहीं पेश कर पाई है, जिससे साबित होता हो कि आकृति चौधरी ने हिंसा भड़काई. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि आकृति चौधरी को पांच लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए और यह रकम गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम और एसएचओ स्तर तक के अन्य अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए जिन्होंने हिरासत का आदेश पारित किया.

कोर्ट ने किस बात पर जताई नाराजगी?

आकृति चौधरी को अप्रैल, 2026 में नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से उपजे मामलों में गिरफ्तार किया गया था और बाद में उन पर एनएसए लगा दिया गया. कोर्ट ने दो सितंबर को अपने 15 पन्नों के आदेश में कहा था कि अधिकारियों को बहुत अधिकार दिए जाते हैं क्योंकि नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण को बनाए रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की होती है. हालांकि कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि अधिकारियों को यह याद रखना चाहिए कि उनकी निष्ठा संविधान के प्रति है ना कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति. आदेश में यह भी कहा गया कि अधिकारी जनता के सेवक होते हैं और लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है.

कोर्ट ने कहा- आरोपों के लिए कोई ठोस सबूत नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि बिना किसी ठोस वजह या उचित प्रक्रिया के नागरिक स्वतंत्रताओं का उल्लंघन करने वाली ज्यादतियों या गैर कानूनी कार्यों को सुधारते समय, न्यायपालिका पीड़ित नागरिकों को मुआवजा दिलाने के लिए कड़े आदेश दे सकती है. कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में पुलिस रिपोर्ट में बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ आरोप लगाए गए थे, वहां जिला मजिस्ट्रेट से यह उम्मीद की जाती थी कि वह एनएसए के कड़े प्रावधान लागू करने का निर्णय करने से पहले रिकॉर्ड की जांच कर लें. कोर्ट ने कहा कि आकृति चौधरी एक छात्रा और कार्यकर्ता थी जिसका कोई क्रिमिनल रिकॉर्ड नहीं था और ऐसी कोई सामग्री नहीं पेश की गई जो यह साबित करती हो कि उन्होंने हिंसा भड़काई.

कोर्ट ने आकृति चौधरी की गिरफ्तारी के संबंध में गंभीर विसंतगियां भी पाईं. उनके मामले में उन्हें 11 अप्रैल को शाम साढ़े पांच बजे नोएडा में बॉटिनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से गिरफ्तार किया गया. हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा कि आकृति को 12 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था. राज्य सरकार ने आरोप लगाया था कि आकृति चौधरी और उनके साथियों ने हिंसा भड़काने की साजिश रची. वहीं, वॉट्सऐप मैसेज की जांच के दौरान कोर्ट ने बार बार सरकार से उन सामग्री को पेश करने को कहा जिनसे साबित होता हो कि आकृति चौधरी ने लोगों को हिंसा के लिए भड़काया. कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार एक भी मैसेज या वीडियो क्लिप नहीं दिखा सकी जिससे हिंसा भड़काने की बात साबित होती हो.

 

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