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क्या पति को सैलरी का 25% गुजारा भत्ता देना ही होगा? इलाहाबाद HC ने साफ किया नियम

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक टिप्पणी की है.

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क्या पति को सैलरी का 25% गुजारा भत्ता देना ही होगा? इलाहाबाद HC ने साफ किया नियम

गुजारा भत्ते को लेकर कोर्ट का बड़ा फैसला (AI Image)

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  • कोर्ट ने कहा कि पति की नेट सैलरी का 25% गुजारा भत्ता देने का कोई तय या कड़ा कानून नहीं
  • ये केवल एक सामान्य सलाह, जिसे परिस्थितियों के अनुसार कम या ज्यादा भी कर सकते हैं
  • अदालत के अनुसार, गुजारा भत्ते की गणना पति की ग्रॉस सैलरी पर नहीं होनी चाहिए
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल तलाक होने से महिला का अधिकार खत्म नहीं होता

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते को लेकर एक बहुत ही जरूरी और बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने मंगलवार (14 जुलाई 2026) को साफ कहा है कि ऐसा कोई तय या कड़ा नियम नहीं है कि पति को अपनी नेट सैलरी का 25 फीसदी हिस्सा पत्नी को गुजारा भत्ते के तौर पर देना ही पड़ेगा. यह 25% वाली बात सिर्फ एक सामान्य सलाह या गाइडलाइन की तरह है, कोई परमानेंट कानून नहीं है.

अदालत का मानना है कि हर परिवार और हर शादीशुदा जोड़े के हालात एक जैसे नहीं होते. हर केस की अपनी अलग परिस्थितियां होती हैं. इसलिए, निचली अदालतें मामले की गंभीरता और दोनों पक्षों की जरूरतों को देखते हुए इस रकम को 25% से कम या ज्यादा भी तय कर सकती हैं. यह फैसला जस्टिस अचल सचदेव की सिंगल बेंच ने दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया.

क्या है पूरा मामला?

दरअसल, यह पूरा मामला कानपुर देहात की एक फैमिली कोर्ट के फैसले से जुड़ा है. वहां की कोर्ट ने पत्नी के लिए 12 हजार रुपये महीना गुजारा भत्ता तय किया था. इस फैसले के खिलाफ दोनों ही पक्ष हाईकोर्ट पहुंच गए. पीटीआई के अनुसार, पत्नी पिंकी उर्फ प्रीति का कहना था कि 12 हजार रुपये में गुजारा नहीं होता, इसलिए इस रकम को बढ़ाया जाए. वहीं पति जय प्रकाश ने इस आदेश को चुनौती देते हुए कहा था कि यह रकम ज्यादा है. 

हाईकोर्ट ने इस मामले को गहराई से समझा और सबसे पहले यह साफ किया कि जब भी गुजारा भत्ते का हिसाब लगाया जाता है, तो वो पति की ग्रॉस सैलरी यानी कुल कमाई पर नहीं, बल्कि नेट इनकम यानी शुद्ध आय पर तय होता है. नेट इनकम का मतलब है कि टैक्स और जरूरी कटौतियों के बाद जो पैसा असल में हाथ में बचता है, उसी के आधार पर फैसला होना चाहिए. 

तलाक के बाद भी बना रहता है हक 

इस केस में एक पेंच यह भी था कि पति को पहले ही पत्नी से तलाक मिल चुका था. ऐसे में अमूमन लोगों को लगता है कि तलाक के बाद जिम्मेदारी खत्म हो जाती है, लेकिन कोर्ट ने इस पर बहुत ही मानवीय और कानूनी रूप से मजबूत टिप्पणी की. हाईकोर्ट ने कहा कि सिर्फ तलाक हो जाने से किसी महिला का गुजारा भत्ता पाने का हक खत्म नहीं हो जाता.

अगर महिला के पास कमाई का कोई जरिया नहीं है, उसने दूसरी शादी नहीं की है और उसका आचरण सही है, तो वह अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की पूरी हकदार है. कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी महिला बेसहारा न हो और वह समाज में एक सम्मानजनक जीवन जी सके. 

कोर्ट का अंतिम फैसला 

अदालत ने पाया कि पत्नी सचमुच अपना खर्चा उठाने में असमर्थ थी, जबकि पति की आर्थिक स्थिति अच्छी थी. कागजातों की जांच के बाद सामने आया कि पति की नेट सैलरी 67,043 रुपये महीना थी. हाईकोर्ट ने महसूस किया कि फैमिली कोर्ट ने पति की कमाई और जरूरतों का सही से आंकलन किए बिना ही 12 हजार रुपये तय कर दिए थे, जो कि कम थे.

आमतौर पर हाईकोर्ट निचली अदालतों के फैसलों में सीधे दखल नहीं देता, लेकिन अगर फैसला अधूरा या गलत तथ्यों पर आधारित हो, तो कोर्ट को हस्तक्षेप करने का पूरा अधिकार है. इसी को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने गुजारा भत्ते की रकम को 12 हजार से बढ़ाकर सीधे 20,000 रुपये महीना कर दिया.

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