भारत
थ्री-टियर 'स्मार्ट बॉर्डर' मॉडल के तहत भौगोलिक स्थिति के अनुसार सुरक्षा घेरा तैयार किया जा रहा है. पूरे सिस्टम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित सेंसर के नेटवर्क से जोड़ा जा रहा है.
भारत अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश के साथ हजारों किलोमीटर की सीमा साझा करता है. भारतीय सुरक्षा बल इन सीमाओं की निगरानी करते हैं और नियमित गश्त करते हैं. भारत ने सीमाओं पर कंटीली बाड़ भी लगाई है. जमीन पर मौजूद रडार स्टेशनों के माध्यम से हवाई सीमा की भी निगरानी की जाती है. लेकिन, मौजूदा दौर में ये उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं. जमीनी घुसपैठ रोकना तो आसान है लेकिन, ड्रोन जैसे साधन सुरक्षा में आसानी से सेंध लगा पा रहे हैं. पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगी सीमाओं पर तस्कर और देश के दुश्मन सस्ते ड्रोन का इस्तेमाल कर रहे हैं. इस चुनौती को देखते हुए भारत थ्री-टियर 'स्मार्ट बॉर्डर' रणनीति पर काम कर रहा है. आइये जानते हैं इसके बारे में विस्तार से.
साल 2016 के पठानकोट एयरबेस हमले के बाद गृह मंत्रालय ने कॉम्प्रेहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम की शुरुआत की थी. इसका उद्देश्य उन इलाकों में निगरानी रखना था जहां जमीन पर बांड़ नहीं लगाई जा सकती. इसमें थर्मल नाइट-विजन, जमीन के नीचे सिस्मिक सेंसर, इन्फ्रारेड अलार्म और रडार शामिल थे.
कॉम्प्रेहेंसिव इंटीग्रेटेड बॉर्डर मैनेजमेंट सिस्टम से घुसपैठ पर अंकुश तो लगा लेकिन, पंजाब, राजस्थान और जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में तस्करों और आतंकवादी नेटवर्कों ने जमीनी सुरंगों के बजाय ड्रोन का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. छोटे ड्रोन बहुत कम ऊंचाई और धीमी गति से उड़ते हैं. ये पारंपरिक वायु रक्षा रडार की पकड़ में आसानी से नहीं आते. इनके छोटे इलेक्ट्रिक मोटर बहुत कम गर्मी छोड़ते हैं, जिससे थर्मल कैमरे भी इन्हें आसानी से नहीं देख पाते. ये ड्रोन नशीले पदार्थ (ड्रग्स), हथियार, गोला-बारूद और जाली नोट सीमा पार निर्धारित GPS लोकेशंस पर गिराकर वापस लौट जाते हैं.
ड्रोन की इस चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने पाकिस्तान और बांग्लादेश से लगी लगभग 6,000 किलोमीटर लंबी सीमा पर 'स्मार्ट बॉर्डर' रणनीति तैयार की है. इसे मध्य-2027 तक पूरी तरह से लागू करने का लक्ष्य है. यह प्रणाली तीन लेयरों में काम करती है.
इसमें पहला लेयर एंटी-कट/एंटी-क्लाइंब बाड़, फ्लडलाइट्स और गश्त का होगा जो पैदल घुसपैठ रोकने के लिए है.
दूसरा लेयर जमीनी सेंसर नेटवर्क का होगा जिसमें सिस्मिक सेंसर, लेजर ट्रिपवाइयर, लॉन्ग-रेंज थर्मल कैमरे और नदियों के लिए सोनार सिस्टम लगाए जाएंगे.
तीसरा लेयर एंटी-ड्रोन सुरक्षा ग्रिड से जुड़ा होगा. यह काउंटर-UAV रडार, माइक्रो-डॉप्लर सेंसर, रेडियो फ्रीक्वेंसी स्निफर और इलेक्ट्रॉनिक जैमर्स वाली सुरक्षा परत होगी.
थ्री-टियर 'स्मार्ट बॉर्डर' मॉडल के तहत भौगोलिक स्थिति के अनुसार सुरक्षा घेरा तैयार किया जा रहा है. जहां बाड़ लगाना संभव नहीं है, वहां सैटेलाइट, हाई-अल्टीट्यूड ड्रोन और सिस्मिक सेंसर लगाए जा रहे हैं. बांग्लादेश सीमा पर नदी और डेल्टा क्षेत्र में बाढ़ से बाड़ बह जाती है. यहां लेजर वॉल, अंडरवॉटर सोनार और एरोस्टैट प्लेटफॉर्म लगाए जा रहे हैं. पंजाब, गुजरात और राजस्थान के खुले और विशाल मैदानी क्षेत्र में एंटी-ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं.
पूरे सिस्टम को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर आधारित सेंसर के ऐसे ऐसे नेटवर्क से जोड़ा गया है जो सीधे फॉरवर्ड ऑपरेटिंग पोस्ट से सेंट्रल कमांड सेंटर तक काम करता है. शुरुआत में सात से आठ रणनीतिक इलाकों में पायलट प्रोग्राम शुरू किए जा रहे हैं. इसका मुख्य मकसद 2027 के मध्य तक संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा का एक मज़बूत और प्रभावी सिस्टम तैयार करना है.