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UP Assembly Election 2027: भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए अभी से अपनी चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है.
भारतीय जनता पार्टी (BJP) उत्तर प्रदेश में पूरी तरह से चुनावी मोड में आ गई है. साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी के लिए पार्टी ने तय समय से करीब एक साल पहले ही जमीन पर काम करना शुरू कर दिया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कैबिनेट विस्तार के बाद, अब भाजपा का पूरा ध्यान संगठन को मजबूत करने और राज्य भर में अपने बूथ नेटवर्क को कसने पर है.
2027 के चुनावों के लिए भाजपा की शुरुआती रणनीति बहुत दिलचस्प है. पार्टी सबसे पहले उन 61 विधानसभा सीटों पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जहां वह पिछले लगातार तीन विधानसभा चुनावों (2012, 2017 और 2022) में एक बार भी जीत दर्ज नहीं कर पाई है.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने नेताओं से अभियान के शुरुआती दौर में इन कमजोर और मुश्किल सीटों को प्राथमिकता देने को कहा है. भाजपा की योजना इन सीटों से चुनावी डेटा, जातिगत समीकरण और बूथ लेवल का फीडबैक इकट्ठा करने की है, ताकि जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए हर सीट के हिसाब से एक अलग और खास रोडमैप तैयार किया जा सके.
भाजपा के एक सीनियर नेता ने बताया कि पार्टी नेतृत्व इस बात को लेकर थोड़ा चिंतित है कि 2022 में दोबारा सरकार बनाने के बावजूद उसकी सीटों की संख्या में गिरावट आई थी. याद दिला दें कि 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पर 312 सीटें जीती थीं, लेकिन 2022 के चुनाव में यह आंकड़ा घटकर 255 पर आ गया था. नेता का कहना है कि 2027 से पहले संगठन का मुख्य काम इस गिरावट को रोकना है, ताकि देश के सबसे महत्वपूर्ण सियासी राज्य में पार्टी की राजनीतिक पकड़ कमजोर न पड़े.
नेतृत्व का मानना है कि विपक्ष जिस तरह से जातिगत समीकरणों को साधकर गठबंधन बना रहा है, उसे देखते हुए अगर भाजपा के वोट बैंक में थोड़ी भी सेंध लगती है, तो 2027 में बड़ा नुकसान हो सकता है. इसलिए रणनीति सिर्फ नई सीटें जीतने की नहीं है, बल्कि अपने पुराने गढ़ों को बचाए रखने की भी है. इसके लिए बूथ मैनेजमेंट सुधारने, सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों तक पहुंच बढ़ाने और सहयोगियों के साथ तालमेल बेहतर करने पर जोर दिया जा रहा है.
लखनऊ यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर ए.के. मिश्रा ने मनी कंट्रोल से बातचीत में कहा कि भाजपा ने 2022 के चुनावों के बाद अपने गठबंधन के ढांचे को राजनीतिक रूप से बदलने की कोशिश की है. उन्होंने कहा, "भाजपा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) और राष्ट्रीय लोक दल जैसे दलों को अपने साथ लाने में कामयाब रही है, जो 2022 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ थे. इस बदलाव से भाजपा को उन इलाकों में नुकसान कम करने में मदद मिल सकती है, जहां जातिगत समीकरण खेल बिगाड़ते रहे हैं." उन्होंने आगे कहा कि भाजपा उन पिछड़ी जातियों को दोबारा जोड़ने के लिए माइक्रो-लेवल सोशल इंजीनियरिंग कर रही है, जो पिछले चुनाव में विपक्ष की तरफ झुकी दिख रही थीं.
भाजपा ने जिन 61 कमजोर सीटों की पहचान की है, उनका गणित कुछ ऐसा है-
गौर करने वाली बात यह है कि पूर्वी और पश्चिमी यूपी की इन 35 सीटों में से समाजवादी पार्टी ने 2022 के चुनाव में अकेले 27 सीटें जीती थीं. हालांकि, भाजपा नेताओं का मानना है कि स्वार, रामपुर और कुंदरकी जैसी सीटों पर हाल ही में हुए उपचुनावों में मिली जीत ने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाया है. बाकी बची सीटों में से 3 सीटें राजभर की पार्टी ने जीती थीं, जो अब भाजपा के साथ सरकार में हैं. इसके अलावा अपना दल (एस) और निषाद पार्टी के पास 2-2 सीटें हैं, जबकि 1 सीट बसपा के खाते में गई थी.
चुनाव की तैयारियों के तहत भाजपा ने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंकना शुरू कर दिया है. प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने बूथ से लेकर जिला स्तर तक नियमित बैठकें शुरू कर दी हैं और कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया है कि वे सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों के घर-घर जाएं. कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वे लोगों से मिलकर यह सुनिश्चित करें कि उन्हें सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ मिल रहा है या नहीं, और अगर उन्हें कोई शिकायत है तो उसे दूर करने में मदद करें.
इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर महीने होने वाले 'मन की बात' कार्यक्रम के बाद नियमित बैठकें करने और उसका फीडबैक सीधे नेतृत्व तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है. कुल मिलाकर, 2027 की इस बड़ी लड़ाई के लिए भाजपा अभी से संगठन में बड़े बदलाव और फेरबदल की जमीन तैयार कर रही है.