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राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने बीती को बिसार कर आगे की सुध लेने का फैसला किया है. दोनों भाइयों ने बरसों बाद मंच साझा किया. उनके बेटों ने भी एक-दूसरे के लिए अपनी बांहें खोल दीं. कहा गया कि बाला साहेब अब खुश होंगे कि दोनों भाई साथ आ गए हैं. ये मिलन सुखद तो है, पर क्या लगभग दो दशक बाद साथ आए राज और उद्धव के लिए राजनीति भी उतनी ही सुखद होगी?
राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने बीती को बिसार कर आगे की सुध लेने का फैसला किया है. दोनों भाइयों ने बरसों बाद मंच साझा किया. उनके बेटों ने भी एक-दूसरे के लिए अपनी बांहें खोल दीं. कहा गया कि बाला साहेब अब खुश होंगे कि दोनों भाई साथ आ गए हैं. ये मिलन सुखद तो है, पर क्या लगभग दो दशक बाद साथ आए राज और उद्धव के लिए राजनीति भी उतनी ही सुखद होगी?
एक लंबे समय तक राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे शिवसेना में बालासाहेब ठाकरे के दो मजबूत कंधे रहे. शुरुआती सालों में उद्धव के मुकाबले राज ज्यादा पॉपुलर नेता भी रहे. हालांकि, जब उत्तराधिकारी चुनने की बारी आई तो बालासाहेब ठाकरे ने अपने बेटे उद्धव को चुना और राज ठाकरे साइडलाइन कर दिए गए. नेतृत्व में बदलाव साल 2004 में हुआ और 2006 में राज ठाकरे ने अपनी अलग पार्टी शुरू कर दी. पार्टी का नाम रखा- महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना. इस शॉर्ट में मनसे या MNS भी कहते हैं.
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लगभग 19 साल बाद राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे साथ आए हैं. साथ आने की वजह है केंद्र सरकार की तीन भाषा नीति. महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार ने तीन भाषा नीति को लागू करने का फैसला किया था. इसके बाद फडणवीस सरकार पर राज्य में हिंदी थोपने के आरोप लगने लगे. फडणवीस ने फिलहाल के लिए तीन भाषा नीति को लागू करने पर रोक लगा दी है. हालांकि, इसे लेकर विवाद जारी है. इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे साथ आए हैं. बीते कुछ चुनावों के नतीज़ों से साफ है कि दोनों भाई पॉलिटिकल फ्रंट पर स्ट्रगल कर रहे हैं. ऐसे में ठाकरे नाम और उससे जुड़े मराठी मानुष की छवि को रिवाइव करने के लिए दोनों भाइयों ने हाथ मिलाया है.
19 साल में उद्धव ठाकरे की राजनीति काफी बदली है. शुरुआत में बाला साहेब ठाकरे की मराठी मानुष वाली राजनीति के बाद शिवसेना ने हिंदुत्व की राजनीति की तरफ शिफ्ट किया. इस दौरान शिवसेना ने बीजेपी के साथ गठबंधन भी किया. साल 2019 के चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे ने सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिलाया, तब उनकी राजनीति राइट विंग से सेंटर की तरफ शिफ्ट हुई. वहीं, राज ठाकरे की राजनीति अभी भी मराठी मानूष और कुछ हद तक हिंदुत्व तक सीमित है. ऐसे में दोनों के बीच वैचारिक मतभेद हो सकते हैं. मराठी हार्टलैंड में दोनों भाइयों के बीच वर्चस्व की लड़ाई एक बार फिर से देखने को मिल सकती है. दूसरा बड़ा टकराव राज ठाकरे के पॉलिटिकल स्टैंड और महाविकास अघाड़ी के स्टैंड के बीच हो सकता है. इन दोनों के बीच सामंजस्य पैदा करना उद्धव ठाकरे के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द होगा.
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