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चीन सीमा पर एडवांस्ड सेंसर्स का नेटवर्क बना रहा है भारत, कैसे लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक चप्पे-चप्पे पर रहेगी नजर?

चीन से लगती विशाल सीमा पर 24 घंटे निगरानी रखना आसान काम नहीं है. भारत अब स्वदेशी रडारों और AI आधारित प्रणालियों के तालमेल से ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में एक अभेद्य डिजिटल दीवार खड़ी कर रहा है.

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चीन सीमा पर एडवांस्ड सेंसर्स का नेटवर्क बना रहा है भारत, कैसे लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक चप्पे-चप्पे पर रहेगी नजर?

एडवांस्ड सेंसर्स का एक बड़ा जाल बिछा रहा है भारत. (AI इमेज)

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  • वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत बढ़ा रहा है निगरानी.
  • एडवांस्ड सेंसर्स का एक बड़ा जाल बिछा रहा है भारत.
  • भारत 'सेंसर डोमिनेंस' की रणनीति पर काम कर रहा है.

Line of Actual Control: लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन को गड़बड़ी न कर सके इसके लिए भारतीय सेना एक खास उपाय कर रही है. ये कदम सैनिकों की तैनाती, लड़ाकू विमानों और एयर डिफेंस नेटवर्क के विस्तार से अलग है. भारतीय सेना हिमालय के मुश्किल इलाकों में चीनी सेना की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने के लिए तेजी से  एडवांस्ड सेंसर्स का एक बड़ा और आपस में जुड़ा हुआ नेटवर्क बना रही है. भारतीय रक्षा बल वास्तविक नियंत्रण रेखा पर ऐसे सुरक्षा उपाय कर रहे हैं जिससे चीन की घुसपैठ या हवाई खतरों का तुरंत पता चल जाएगा. 

गलवान घाटी संघर्ष के बाद तेज हुई तैयारी

2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद, चीन ने तिब्बत और शिनजियांग में नए एयरबेस, ड्रोन हब और सैन्य ठिकाने बनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है. भारत भी इसके जवाब में सिर्फ गश्त पर निर्भर रहने के बजाय 'सेंसर डोमिनेंस' की रणनीति पर काम कर रहा है. 

डिफेंस डॉट इन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल पर एक विशाल और बहु-स्तरीय सेंसर नेटवर्क तैयार कर रहा है. भारत के इस कदम का उद्देश्य हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक चुनौतियों को मात देना है. दरअसल, लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैले ऊंचे पहाड़ों और गहरी घाटियों के कारण पारंपरिक रडार प्रणालियों के लिए कुछ 'ब्लाइंड स्पॉट्स' बन जाते हैं. दुश्मन के लड़ाकू विमान या ड्रोन इन घाटियों के पीछे छिपकर भारतीय हवाई क्षेत्र के बेहद करीब आ सकते हैं.

इस भौगोलिक चुनौती से निपटने के लिए भारत एक बहु-स्तरीय सेंसर नेटवर्क बना रहा है. इसमें एक उपकरण की कमी को दूसरा उपकरण पूरा करता है. ये सभी सेंसर आपस में जुड़े हुए होंगे. इस योजना के तहत भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और DRDO द्वारा विकसित उन्नत स्वदेशी माउंटेन रडारों को विशेष रूप से कश्मीर के गुलमर्ग से लेकर नागालैंड के फुत्सेरो जैसी ऊंचाइयों पर तैनात किया जा रहा है. ये खास रडार पहाड़ों की आड़ लेकर आने वाले कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन को आसानी से पकड़ सकते हैं.

एंटी-स्टील्थ रडार की तैनाती

चीन के J-20 और J-35 जैसे स्टील्थ लड़ाकू विमानों का मुकाबला करने के लिए भारत सीमा पर अत्याधुनिक Surya और रूसी मूल के Nebo-UM रडार तैनात कर रहा है. भारत देश में ही बने अरुध्र और अश्विनी रडार रडार की तैनाती भी कर रहा है. ये मीडियम-रेंज और लो-लेवल लाइटवेट रडार हैं. ये रडार चौबीसों घंटे बिना किसी रुकावट के हवाई खतरों को ट्रैक करने की क्षमता रखते हैं. 

अंतरिक्ष से लेकर जमीन तक की निगरानी

चीन की करतूतों पर नजर रखने के लिए भारत किसी एक साधन पर निर्भर नहीं है. भारत के सैन्य निगरानी उपग्रह अंतरिक्ष से चीनी एयरबेस और मूवमेंट पर लगातार नजर रखते हैं. लंबी दूरी तक निगरानी रखने वाले रडार और इजरायली मूल के Heron जैसे MALE ड्रोन लगातार सीमा पार की टोह लेते हैं. बहुत कम ऊंचाई पर आने वाले खतरों के लिए क्लोज-इन सेंसर तैनात किए गए हैं. इसके अलावा लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक सेना की तैनाती भी है जो लगातार पेट्रोलिंग करती है.

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