सेहत
तंबाकू फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण है, विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं में अभी भी तंबाकू का सेवन एक गंभीर और बढ़ता हुआ स्वास्थ्य संकट बना हुआ है. आज भी कई महिलाएं धूम्रपान-तंबाकू का सेवन छिपाकर करती हैं, इससे न केवल कैंसर का खतरा बढ़ता है बल्कि इलाज कमजोर होता है.
Women Cancer- Tobacco And Cancer: धूम्रपान और तंबाकू फेफड़ों के कैंसर का मुख्य कारण है, विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग की महिलाओं में अभी भी तंबाकू का सेवन एक गंभीर और बढ़ता हुआ स्वास्थ्य संकट बना हुआ है. एक्सपर्ट के मुताबिक, महिलाओं के लिए तंबाकू का खतरा इससे कहीं बड़ा है. आज भी कई महिलाएं धूम्रपान या फिर तंबाकू का सेवन छिपाकर करती हैं, इससे न केवल कैंसर का खतरा बढ़ता है बल्कि बीमारी का पता भी अक्सर देर से चलता है. तंबाकू केवल फेफड़ों को ही नुकसान नहीं पहुंचाता, बल्कि मुंह, गले, भोजन नली, गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल कैंसर), स्तन और अंडाशय के कैंसर का खतरा भी बढ़ा सकता है. खासकर सर्वाइकल कैंसर में तंबाकू शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर देता है, जिससे एचपीवी (HPV) संक्रमण लंबे समय तक बना रहता है और कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है.
डॉ. ज्योति वाधवा (प्रिंसिपल लीड, मेडिकल एवं प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी, अपोलो एथेना वुमेन्स कैंसर सेंटर, दिल्ली) के मुताबिक, समाज में आज भी महिलाओं द्वारा धूम्रपान या तंबाकू सेवन को लेकर एक तरह का संकोच और डर मौजूद है. इसी कारण कई महिलाएं अपनी आदत और शुरुआती लक्षणों को छिपाती रहती हैं. लगातार खांसी, सांस फूलना, थकान या वजन कम होना जैसे लक्षणों को अक्सर सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है. वहीं जब तक इसकी जांच होती है, तब तक कई मामलों में कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है. इसलिए समय पर जांच और जागरूकता बेहद जरूरी है.
यह भी पढ़ें: Iceberg of Illness: HIV-AIDS या टीबी…, जब मरीज के लिए बीमारी से ज्यादा खतरनाक हो जाए सोशल स्टिग्मा
आमतौर पर कई लोग सोचते हैं कि कैंसर का इलाज शुरू होने के बाद सब ठीक हो जाएगा. लेकिन, अगर मरीज तंबाकू का सेवन जारी रखता है, तो इलाज की सफलता प्रभावित हो सकती है. तंबाकू रक्त वाहिकाओं को संकुचित कर देता है और शरीर के ऊतकों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर देता है. इससे सर्जरी के बाद घाव भरने में देरी होती है, संक्रमण का खतरा बढ़ता है और रिकवरी मुश्किल हो सकती है. इसके अलावा कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी के दौरान भी तंबाकू शरीर को कमजोर बनाता है और उपचार के प्रभाव को कम कर सकता है.
डॉ. ज्योति वाधवा ने बताया कि आधुनिक कैंसर उपचार में अब प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी एक नई उम्मीद बनकर सामने आई है. यानी हर मरीज को एक जैसा इलाज देने के बजाय उसके कैंसर की आनुवंशिक (जेनेटिक) विशेषताओं को समझकर उपचार तय किया जाए. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि मेरे पास 78 वर्ष की एक महिला मरीज आईं, जिन्हें फेफड़ों का उन्नत चरण का कैंसर था जो शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल चुका था. पहले ऐसे मामलों में इलाज के विकल्प सीमित होता थे, लेकिन हमने उनकी बीमारी को बेहतर समझने के लिए नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग (NGS) नामक एक विशेष जेनेटिक जांच करवाई.
जांच में पता चला कि उनके कैंसर में एक विशेष जेनेटिक बदलाव मौजूद था, जिसे EGFR Exon 19 Deletion कहा जाता है. इसके आधार पर उन्हें एक विशेष टार्गेटेड दवा, ओसिमर्टिनिब (Osimertinib) दी गई. इस दवा ने कैंसर को नियंत्रित करने में उल्लेखनीय सफलता दिखाई. मरीज लगभग 22 महीनों तक अच्छी गुणवत्ता वाला जीवन जी सकीं और उनके दैनिक कार्य सामान्य रूप से चलते रहे.
उन्होंने बताया कि जब बाद में बीमारी में बदलाव दिखाई दिया, तो दोबारा जांच की गई और एक नया जेनेटिक परिवर्तन मिला. इसके अनुसार इलाज को संशोधित किया गया और दूसरी लक्षित दवा जोड़ी गई. बाद में जब कैंसर मस्तिष्क तक पहुंचा, तो आधुनिक रेडियोसर्जरी की मदद से उसका सफल उपचार किया गया. बीमारी के अंतिम चरण में भी हमने इलाज को मरीज की स्थिति के अनुसार बदला ताकि उन्हें अधिक से अधिक आराम और परिवार के साथ बेहतर समय मिल सके.
आज आधुनिक चिकित्सा और प्रिसिजन ऑन्कोलॉजी की मदद से कैंसर के कठिन मामलों में भी बेहतर परिणाम संभव हैं. इसका मतलब यह नहीं कि हम तंबाकू के खतरे को नजरअंदाज कर सकते हैं. तंबाकू छोड़ना केवल एक अच्छी आदत नहीं, बल्कि कैंसर की रोकथाम और सफल उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है. डॉ. ज्योति वाधवा का कहना है कि नियमित जांच, समय पर पहचान, तंबाकू से दूरी और आधुनिक उपचार तकनीकों की मदद से महिलाओं को बेहतर और लंबा जीवन दिया जा सकता है.
अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें हमारे गूगल, फेसबुक, x, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.