Advertisement

क्या है लिविंग विल? जानें क्यों 'Right to Die with Dignity' को लेकर छिड़ गई है बहस

हाल ही में कर्नाटक सरकार ने 'गरिमा से मृत्यु’ (Right to Die with Dignity) यानि 'गरिमा से मृत्यु का अधिकार' कानून अपने यहां लागू कर दिया है, जिसको लेकर बहस छिड़ गई है. आइए जानते हैं इसके बारे में...

Latest News
क्या है लिविंग विल? जानें क्यों 'Right to Die with Dignity' को लेकर छिड़ गई है बहस

What Is Living Will

Add DNA as a Preferred Source

कर्नाटका (Karnataka) सरकार ने हाल ही में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है, यहां सुप्रीम कोर्ट के 2023 के आदेश के तहत पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) को मंजूरी दे दी गई है. ऐसे में कर्नाटक देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जहां 'राइट टू डाई’ (Right to Die) यानि 'गरिमा से मृत्यु' का अधिकार कानून लागू किया गया है. हालांकि यह यूथेनेशिया या इच्छा मृत्यु नहीं है. इसके बाद से देश में Right To Die With Dignity को लेकर एक बार फिर से बहस  छिड़ गई है. 


क्यों छिड़ गई है बहस
लोगों के बीच अब इस बात को लेकर बहस छिड़ गई है कि देश के दूसरे राज्यों में इसकी व्यवस्था क्यों नहीं है? हालांकि इसपर लोगों का मत भी अलग-अलग है. कर्नाटका सरकार ने राज्य भर के अस्पतालों में मेडिकल बोर्ड स्थापित करने का आदेश दिया है, ताकि सम्मानपूर्वक मृत्यु के लिए अनुरोध स्वीकार किए जा सकें. 

यह भी पढ़ें: Diabetes Management: पैरों में दिखते हैं High Blood Sugar के ये संकेत, तुरंत दें ध्यान

बता दें कि ये सशर्त तौर पर उन लोगों पर लागू होगा, जो विशेष तौर पर गंभीर रूप से बीमार हों या किसी तरह की लाइलाज रोग से पीड़ित हो. ऐसी स्थिति में वग निर्णय ले सकते हैं कि वह अपनी जीवनरक्षक चिकित्सा को जारी रखना चाहते हैं या नहीं. इसमें ‘लिविंग विल’ की स्थितियां शामिल हैं. 

क्या होता है लिविंग विल?
लिविंग विल एक कानूनी दस्तावेज है, जो 18 साल से अधिक उम्र के किसी व्यक्ति को ये तय करने की अनुमति देता है कि अगर वो लाइलाज बीमारी या ऐसी स्थिति में चला जाए जहां ठीक होने की कोई संभावना न हो और वो खुद फैसले लेने में असमर्थ हो तो इस स्थिति में उसे किस तरह की मेडिकल केयर मिलनी चाहिए. 

इसपर साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल को संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देते हुए सख्त प्रक्रियागत शर्तें भी तय की थीं. ऐसे में अब कर्नाटक में कोई भी व्यक्ति अपनी लिविंग विल बना सकता है, जिसमें वह स्पष्ट कर सकता है कि वह गंभीर और लाइलाज बीमारी से ग्रस्त हो जाए तो उसे जीवनरक्षक उपचार दिया जाए या नहीं.

इस स्थिति में अस्पताल और डॉक्टर इस फैसले का सम्मान करने के लिए बाध्य होंगे. तब, जब यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के तय मानकों के अनुसार हो. बता दें कि यह मरीज की गरिमा के साथ मृत्यु सुनिश्चित करने पर केंद्रित है न कि जीवन समाप्त करने के लिए सक्रिय हस्तक्षेप पर.

कानूनी तौर पर  लिविंग विल बनाने पर ही ही पैसिव युथनेशिया यानि राइट टू डाई को सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त कानूनी मान्यता दी है, Active Euthanasia यानि इच्छा मृत्यु भारत में अवैध है और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराध माना जाता है.

समझें क्या है पैसिव युथनेशिया
पैसिव युथनेशिया का अर्थ है किसी व्यक्ति को उसके जीवन को समाप्त करने के लिए सक्रिय रूप से सहायता प्रदान करना, खासतौर से तब जब वह व्यक्ति गंभीर बीमारी या दर्द में हो और उसकी स्थिति में सुधार की कोई संभावना नजर न आ रही हो. यह इंजेक्शन आदि से दी जाने वाली इच्छामृत्यु नहीं है. 

यह अवधारणा उन परिस्थितियों से संबंधित है जहां मरीज की इच्छा का सम्मान करते हुए उसे एक सम्मानजनक तरीके से मृत्यु का हक दिया जाता है. इसमें जीवन रक्षक उपचार (जैसे वेंटिलेटर, दवाइयां) को हटा देना या रोक देना शामिल है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से अपना शरीर त्याग सके.

खबर की और जानकारी के लिए डाउनलोड करें DNA App, अपनी राय और अपने इलाके की खबर देने के लिए जुड़ें  हमारे गूगलफेसबुकxइंस्टाग्रामयूट्यूब और वॉट्सऐप कम्युनिटी से.

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement