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क्या होता है विडो मेकर अटैक- जो मिनटों में छीन लेता है सांसे? जानिए कैसे 20 साल के युवक की डॉक्टरों ने बचाई जान

Lifestyle factors causing heart attack in youth: 20 वर्षीय युवक को दिल का दौरा पड़ने और समय पर इलाज मिलने से उसकी जान बच गई. एसएसबी अस्पताल फरीदाबाद के डॉक्टरों ने विडो मेकर ब्लॉकेज खोलकर युवाओं में बढ़ते हार्ट अटैक और खराब लाइफस्टाइल के खतरों पर गंभीर चेतावनी दी है.

क्या होता है विडो मेकर अटैक- जो मिनटों में छीन लेता है सांसे? जानिए कैसे 20 साल के युवक की डॉक्टरों ने बचाई जान

क्या है 'विडो मेकर' अटैक और कैसे डॉक्टरों ने चमत्कार कर बचाई जान (photo Social Media)

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  • फरीदाबाद में बीस वर्षीय युवक को अटैक
  • विडो मेकर धमनी में था पूरा ब्लॉकेज
  • एक घंटे में स्टेंट डालकर बचाई जान
  • युवाओं के लिए लाइफस्टाइल बनी बड़ा खतरा
  • एलपी ए जांच से समझें आनुवंशिक जोखिम

क्या आपको लगता है कि दिल का दौरा सिर्फ ढलती उम्र की बीमारी है? अगर हां, तो फरीदाबाद की यह खौफनाक घटना आपकी सोच पूरी तरह बदल देगी. महज 20 साल का एक नौजवान रात के अंधेरे में जब सीने के भयंकर दर्द से कराहता हुआ अस्पताल पहुंचा, तो डॉक्टर भी हैरान रह गए. उसके दिल की सबसे अहम धमनी पूरी तरह बंद हो चुकी थी, लेकिन वक्त रहते मिले इलाज ने उसे मौत के मुंह से खींच लिया.

आधी रात का सन्नाटा और मौत का अहसास

रात के करीब डेढ़ बजे फरीदाबाद के एसएसबी हार्ट एंड मल्टीस्पेशियलिटी अस्पताल में जब 20 साल के युवक को लाया गया, तब उसकी हालत बेहद नाजुक थी. सीने में तेज दर्द, धडंकन की बेकाबू रफ्तार और जिस्म से बहता ठंडा पसीना इस बात का गवाह था कि मामला जानलेवा है. डॉक्टरों ने तुरंत जांच की तो पता चला कि उसे एक्यूट एंटीरियर वॉल मायोकार्डियल इंफ्रार्क्शन हुआ है. आसान शब्दों में कहें तो यह हार्ट अटैक की सबसे खतरनाक किस्मों में से एक है. मरीज का दिल पंप करने की क्षमता घटकर केवल 40 फीसदी रह गई थी, जो यह बता रही थी कि मांसपेशियों को कितना गहरा नुकसान पहुंचा है.

जानिए क्या है विडो मेकर ब्लॉकेज?

'विडो मेकर' दिल के दौरे का सबसे खतरनाक रूप माना जाता है. यह स्थिति तब बनती है जब हृदय को ऑक्सीजन और खून सप्लाई करने वाली सबसे मुख्य नस, यानी लेफ्ट एंटीरियर डिसेंडिंग (LAD) आर्टरी पूरी तरह बंद या ब्लॉक हो जाती है.

यह धमनी दिल के बड़े हिस्से (लगभग 50% से अधिक मांसपेशियों) को खून पहुंचाती है. इसमें 100% ब्लॉकेज होते ही दिल की पंपिंग क्षमता तेजी से गिरने लगती है और मांसपेशियों को भारी नुकसान पहुंचता है. सही समय पर (गोल्डन आवर में) इलाज न मिलने पर यह ब्लॉकेज जानलेवा साबित होता है, इसलिए इसे यह भयावह नाम दिया गया है.

विडो मेकर का खौफ और 60 मिनट की जंग

इमर्जेंसी कोरोनरी एंजियोग्राफी के दौरान जो सच सामने आया, उसने हर किसी को सन्न कर दिया. दिल को खून पहुंचाने वाली सबसे प्रमुख नस, जिसे डॉक्टरी भाषा में विडो मेकर या लेफ्ट एंटीरियर डिसेंडिंग आर्टरी कहते हैं, 100 प्रतिशत ब्लॉक हो चुकी थी. अगर इसमें थोड़ी भी देर हो जाती, तो अनहोनी तय थी. एसएसबी अस्पताल की कार्डियक टीम ने बिना एक मिनट गंवाए मरीज को कैथलैब में लिया. प्राइमरी एंजियोप्लास्टी और स्टेंटिंग की आधुनिक तकनीक के जरिए एक खास दवा-युक्त स्टेंट लगाया गया. ठीक एक घंटे के भीतर ब्लॉक धमनी खुल गई और खून का बहाव फिर से सामान्य हो गया.

नौजवानों की लापरवाही और बदलती लाइफस्टाइल

एसएसबी हेल्थकेयर के चेयरमैन डॉ. एस. एस. बंसल का कहना है कि 20 साल के लड़के को इस तरह का अटैक आना पूरे समाज के लिए बहुत बड़ी चेतावनी है. आज की युवा पीढ़ी अक्सर मानती है कि दिल के रोग सिर्फ बुजुर्गों को होते हैं. इसी भ्रम में वे सीने में जलन, अचानक पसीना आना या सांस फूलने को एसिडिटी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं. धूम्रपान, वेपिंग, तंबाकू, जंक फूड, लगातार बना रहने वाला मानसिक तनाव और रात में पूरी नींद ना लेना आज के युवाओं के दिल को अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है.

छुपा हुआ अनुवंशिक खतरा और जरूरी जांच

अक्सर देखा जाता है कि जो लोग जिम जाते हैं और फिट दिखते हैं, उन्हें भी अटैक आ जाता है. डॉ. बंसल के मुताबिक, इसका कारण अनुवंशिक जोखिम हो सकता है. इसके लिए लिपोप्रोटीन (ए) यानी एलपी (ए) नाम की ब्लड टेस्ट काफी अहम भूमिका निभा सकती है. यह जांच शरीर में छुपे जेनेटिक खतरे को उजागर करती है, जो सामान्य कोलेस्ट्रोल टेस्ट में नहीं पकड़ में आता. इसके अलावा सिर्फ 15 मिनट में होने वाली सिटी कोरोनरी एंजियोग्राफी से धमनियों की सटीक स्थिति का पता लगाया जा सकता है.

हर बीतता मिनट तय करता है जिंदगी और मौत

इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सबक यह है कि दिल के मामले में वक्त ही सबसे बड़ा डॉक्टर है. अटैक के समय अगर सही वक्त पर मरीज को 24 घंटे चालू रहने वाली कैथ लैब और अनुभवी कार्डियक इमर्जेंसी वाले अस्पताल ले जाया जाए, तो जीवन सुरक्षित किया जा सकता है. एसएसबी अस्पताल में दिन-रात मिलने वाली इन सुविधाओं की वजह से ही उस युवक की जान बच सकी. यह मामला साफ संदेश देता है कि अपनी उम्र पर भरोसा करने के बजाय अपने शरीर के संकेतों पर ध्यान दें.

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