सेहत
IIT बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने नए अध्ययन में पाया कि PCOS केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी असर डालता है. इससे महिलाओं की ध्यान केंद्रित करने और सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर हो सकती है..
पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (PCOS) एक आम बीमारी है, जो प्रजनन आयु की महिलाओं के हार्मोन को प्रभावित करती है. यह आमतौर पर किशोरावस्था के दौरान शुरू होता है, जिसके लक्षण समय के साथ बदल सकते हैं. हेल्थ एक्सपर्ट्स बताते हैं कि पीसीओएस एक पुरानी बीमारी है, जिसका इलाज संभव नहीं है. लेकिन, जीवनशैली में बदलाव, दवाइयों और प्रजनन उपचारों के जरिए इसके कुछ लक्षणों में सुधार किया जा सकता है.
हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, IIT बॉम्बे के वैज्ञानिकों ने नए अध्ययन में पाया कि पीसीओएस केवल शरीर पर ही नहीं, बल्कि दिमाग पर भी असर डालता है. इससे महिलाओं की ध्यान केंद्रित करने और सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर हो सकती है..
पहले हुए कुछ स्टडी में यह पाया गया था कि पीसीओएस महिलाओं में तनाव का एक कारण बनता है. नई स्टडी में पाया गया है कि PCOS से जूझ रही महिलाएं ध्यान केंद्रित करने में काफी संघर्ष करती हैं. ऐसे में ध्यान की कमी से सोचने, समझने और किसी भी जानकारी को याद रखने की क्षमता पर असर पड़ सकता है.
एक्सपर्ट्स के मुताबिक जब ध्यान एक साथ कई कामों पर ठीक से नहीं लग पाता, तो इस स्थिति में हमारी याददाश्त कमजोर हो जाती है और अगर यह कमजोर हो जाए, तो इसके कारण रोजमर्रा के काम मुश्किल हो जाते हैं.
IIT Bombay के साइकोफिजियोलॉजी प्रयोगशाला में काम करने वाली मैत्रेयी रेडकर और प्रोफेसर अजीज़ुद्दीन खान ने महिलाओं के दो समूहों का अध्ययन किया, जिसमें PCOS से पीड़ित 101 महिलाएं और पूरी तरह से स्वस्थ 72 महिलाएं शामिल थीं. स्टडी से पहले दोनों समूहों की महिलाओं के हार्मोन की जांच की और इसके बाद उन्होंने सभी महिलाओं से 'ध्यान केंद्रित करने से जुड़ी कुछ गतिविधियां' करवाईं, जिसमें पाया गया कि PCOS पीड़ित महिलाएं स्वस्थ महिलाओं की तुलना में देर से रिएक्ट कर रही थीं और उनका ध्यान जल्दी भटक जाता था.
ऐसी स्थिति में जब PCOS से पीड़ित महिलाओं को ध्यान केंद्रित करने वाला टेस्ट दिया गया तो उन्होंने जवाब देने में 50 प्रतिशत ज्यादा समय लिया, वहीं करीब 10 प्रतिशत महिलाएं ने ज्यादा गलतियां कीं. अध्ययन का नेतृत्व कर रहे प्रोफेसर खान ने कहा कि यह प्रयोग ऐसे टेस्ट पर आधारित है, जो बहुत ही छोटे-छोटे समय यानी मिलिसेकंड्स को भी मापते हैं.
इससे पता चलता है कि कोई व्यक्ति किसी खास संकेत पर कैसे और कितनी जल्दी प्रतिक्रिया देता है. उन्होंने कहा कि ये छोटे-छोटे फर्क हैं, जिन्हें हम आमतौर पर नोटिस नहीं कर पाते पर बड़ी कमी को दिखाते हैं. यह कमी हमारे रोजाना के काम करने की क्षमता पर भी असर डाल सकती है.
(Disclaimer: यह खबर सामान्य जानकारी पर आधारित है. इस पर अमल करने से पहले विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें.)
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