Advertisement

फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' में दिखा डिमेंशिया का दर्द, क्या आप पहचानते हैं इसके शुरुआती संकेत? 

Dementia Care: इम्तियाज़ अली की फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' में दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल के किरदार में नजर आ रहे हैं, जो डिमेंशिया से जूझ रहे हैं. भले ही इस फिल्म में डिमेंशिया सिर्फ एक किरदार की कहानी हो. लेकिन, असल जिंदगी लाखों परिवार इस बीमारी का सामना कर रहे हैं.  

Latest News
फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' में दिखा डिमेंशिया का दर्द, क्या आप पहचानते हैं इसके शुरुआती संकेत? 

Dementia Care (AI Image)

Add DNA as a Preferred Source

Dementia Care: इम्तियाज़ अली की फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' सिनेमाघरों में आ चुकी है, पार्टीशन की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म में एक अनूठी प्रेम कहानी दिखती है. यह महज  एक प्रेम कहानी भर नहीं है, बल्कि यादों, रिश्तों और इंसानी जज़्बातों का एक किस्सा है. फिल्म में दिग्गज अभिनेता नसीरुद्दीन शाह 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल के किरदार में नजर आते हैं, जो डिमेंशिया से जूझ रहे हैं. बेहद संवेदनशील तरीके से इस फिल्म में डिमेंशिया की हकीकत को भी दिखाया गया है. फिल्म में ईशर सिंह अतीत और वर्तमान के बीच फंसे हुए नजर आते हैं. उन्हें कई साल पुरानी बातें साफ-साफ याद रहती हैं, लेकिन हाल की घटनाएं याद रखने में उन्हें मुश्किल होती है. स्ट्रोक के बाद होने वाली भ्रम की स्थिति (डिलीरियम) की झलक भी उनके व्यवहार में नजर आती है. भले ही इस फिल्म में डिमेंशिया सिर्फ एक किरदार की कहानी हो. लेकिन, असल जिंदगी में लाखों परिवार इस बीमारी का सामना कर रहे हैं.  

भारत में डिमेंशिया के मरीज 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया भर में 5.5 करोड़ से ज्यादा लोग डिमेंशिया से पीड़ित हैं, हर साल इसके करीब 1 करोड़ नए मामले सामने आते हैं. भारत में भी बढ़ती उम्र की आबादी के कारण यह समस्या तेजी से बढ़ रही है. अल्जाइमर्स एंड रिलेटेड डिसऑर्डर्स सोसाइटी ऑफ इंडिया (ARDSI) के अनुमान के मुताबिक, देश में करीब 88 लाख लोग डिमेंशिया के साथ जीवन जी रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक, बुजुर्ग आबादी बढ़ने के कारण 2050 तक दुनिया भर में डिमेंशिया के मरीजों की संख्या 13.9 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है. 

चिंता की बात यह है कि दुनिया भर में डिमेंशिया से पीड़ित तीन-चौथाई लोगों (करीब 75%) को इस बीमारी का कभी निदान ही नहीं मिल पाता है. लोग शुरुआती लक्षणों जैसे चीजें भूलना को बढ़ती उम्र का सामान्य हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन, इसके शुरुआती संकेतों के बारे में जान लेना बेहद जरूरी है.. 

क्या आप पहचानते हैं डिमेंशिया के शुरुआती संकेत?  

Healthpil.com के फाउंडर और जाने-माने न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. राहुल चावला बताते हैं कि

"Dementia कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि यह कई लक्षणों का समूह है. इसमें व्यक्ति की याददाश्त, सोचने की शक्ति, बोलने और फैसले लेने की क्षमता प्रभावित होती है. Old age के साथ याददाश्त कमजोर होना नॉर्मल माना जाता है लेकिन अगर भूलने की समस्या रोज कि जिंदगी को प्रभावित करने लगे, तो वो डिमेंशिया हो सकता है."

डॉ. चावला के मुताबिक डिमेंशिया आमतौर पर 65 साल के बाद देखा जाता है, लेकिन कुछ मामलों में यह 40-65 साल की उम्र में भी शुरू हो सकता है, जिसे Young-Onset या Early-Onset Dementia कहते हैं. इसके शुरुआती संकेतों में सबसे आम है बार-बार चीज़ें भूलना, जैसे Appointments या हाल ही में हुई बातचीत, रोज़ के काम करने में Confusion जैसे खाना बनाने के Steps भूल जाना या रास्ता ढूंढने में दिक्कत होना. कुछ लोगों में स्वभाव और मूड में बदलाव साफ नज़र आता है जैसे गुस्सा या चिड़चिड़ापन बढ़ना, लोगों से दूरी बनाना या फैसले लेने की क्षमता कमजोर होना. ऐसे लक्षण दिखने पर एक Neurologist से Evaluation ज़रूर करवानी चाहिए. 

यह भी पढ़ें: युवाओं में यंग-ऑनसेट पार्किंसंस का खतरा! न्यूरोलॉजिस्ट से जानें कम उम्र के लोगों में क्यों बढ़ रही है ये बीमारी 

डिमेंशिया की सही पहचान क्यों है जरूरी? 

कई बार डिमेंशिया जैसे लक्षण किसी दूसरी वजह से भी हो सकते हैं, जैसे थायरॉयड की समस्या, विटामिन बी12 की कमी, संक्रमण या मस्तिष्क से जुड़ी ऐसी बीमारी, जिसका इलाज संभव है. सही जांच और समय पर उपचार मिलने पर ऐसे मरीज पूरी तरह ठीक हो सकते हैं. इसे Reversible Dementia कहा जाता है. एक और स्थिति होती है, जिसे 'Pseudo-Dementia' कहा जाता है. इसमें व्यक्ति को वास्तव में डिमेंशिया नहीं होता, बल्कि गहरे अवसाद की वजह से उसकी याददाश्त और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता इतनी प्रभावित हो जाती है कि लक्षण डिमेंशिया जैसे दिखाई देने लगते हैं. सही पहचान और इलाज से इस स्थिति में भी सुधार संभव है.

कैसा होना चाहिए डिमेंशिया के मरीजों के लिए घर का माहौल?

घर का माहौल मरीज की सुरक्षा और Emotional Stability में बड़ी भूमिका निभाता है. सबसे पहले एक Predictable Routine बनाना जरूरी है जैसे सुबह उठने, खाने और सोने का समय लगभग एक ही रखना. घर में सामान अस्त-व्यस्त ना रखें और नोकिली चीज़ें हटा दें, क्योंकि मरीज में balance भी प्रभावित हो सकता है. घर में रोशनी अच्छी होनी चाहिए, खासकर शाम के समय, क्योंकि कुछ मरीजों में शाम के समय भ्रम बढ़ जाती है, जिसे Sundowning कहा जाता है.

बातचीत करते समय आवाज़ शांत रखें, एक बार में एक ही हिदायत दें और जल्दी न करें. पुरानी फोटोज या पर्सनल चीज़ें आसपास रखना मरीज को आश्वासन देता है. मरीज को अकेलापन या उदासी महसूस न हो, इसके लिए परिवार का सहारा और इमोशनल सपोर्ट बहुत जरूरी है. दिमाग को सक्रिय रखने के लिए cognitive exercises जैसे puzzles, याददाश्त वाले Games या पुरानी यादों पर बातचीत करना भी फायदेमंद होता है. डॉ. चावला कहते हैं Safety, Routine और Emotional Security- यह तीन चीजें डिमेंशिया के लिए बहुत जरूरी हैं.

डिस्क्लेमर: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है. किसी भी तरह के लक्षण होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के इलाज शुरू न करें. सही जांच और डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है. 

Read More
Advertisement
Advertisement
Advertisement