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Back pain treatment: घंटों कुर्सी पर बैठकर लैपटॉप चलाने की आदत कमर, गर्दन और मांसपेशियों पर असर डाल सकती है. WHO के मुताबिक लोअर बैक पेन दुनिया में विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है. जानिए फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. पंकज शर्मा के नजरिए से फिजियोथेरेपी, दवा और सर्जरी कब जरूरी हो सकती है.
घंटों कुर्सी पर बैठकर लैपटॉप चलाने की आदत कमर, गर्दन और मांसपेशियों पर असर डाल सकती है. डब्ल्यूएचओ के मुताबिक लोअर बैक पेन दुनिया में विकलांगता का सबसे बड़ा कारण है. जानिए डॉ. पंकज शर्मा के नजरिए से फिजियोथेरेपी, दवा और सर्जरी कब जरूरी हो सकती है.
सुबह काम शुरू करते समय कमर बिल्कुल ठीक रहती है, लेकिन शाम तक कुर्सी से उठते ही अकड़न, दर्द या पैरों में खिंचाव महसूस होने लगता है. कई लोगों के लिए यह रोज का अनुभव बन चुका है. सवाल यह है कि क्या सिर्फ बैठना ही इसकी वजह है या बैठने का तरीका और पूरे दिन की निष्क्रियता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
2025 में प्रकाशित एक स्कोपिंग रिव्यू में ऑफिस वर्कर्स से जुड़े 22 अध्ययनों और 7,814 प्रतिभागियों को देखा गया. इसमें लंबे समय तक बैठना, खराब सिटिंग पोस्चर, कम ब्रेक्स और ज्यादा स्टैटिक सिटिंग का लोअर बैक पेन से संबंध पाया गया. हालांकि हर अध्ययन ने सिर्फ बैठने के समय और कमर दर्द के बीच सीधा संबंध नहीं दिखाया. यानी समस्या को केवल कुर्सी पर बिताए घंटों से जोड़ना सही नहीं होगा; बैठने का व्यवहार, पोस्चर और मूवमेंट भी मायने रखते हैं.
फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. पंकज शर्मा से इस विषय पर बात करते हुए एक अहम सवाल यही बनता है कि लगातार 8 से 10 घंटे काम करने वाले व्यक्ति की बैक हेल्थ में आखिर क्या बदलाव आते हैं और किस बिंदु पर सामान्य थकान को समस्या समझना चाहिए.
लंबे समय तक एक ही पोजिशन में बैठना सिर्फ लोअर बैक तक सीमित नहीं रहता. लैपटॉप को बहुत नीचे रखकर काम करने पर सिर आगे की तरफ झुक सकता है, कंधों पर तनाव बढ़ सकता है और नेक तथा अपर बैक स्टिफनेस महसूस हो सकती है.
इसी तरह कमर को पर्याप्त सपोर्ट न देना, लगातार एक ही पोस्चर में बैठे रहना और बीच-बीच में उठकर न चलना शरीर की मूवमेंट को सीमित कर देता है. लंबे समय तक फिजिकल एक्टिविटी कम रहने पर मांसपेशियों की ताकत और शरीर की फंक्शनल कैपेसिटी भी प्रभावित हो सकती है.
डब्ल्यूएचओ के अनुसार लोअर बैक पेन दुनिया भर में डिसेबिलिटी का सबसे बड़ा कारण है. 2020 में करीब 619 मिलियन लोग इससे प्रभावित थे और डब्ल्यूएचओ का अनुमान है कि 2050 तक यह संख्या 843 मिलियन तक पहुंच सकती है. डब्ल्यूएचओ यह भी कहता है कि लगभग 90 प्रतिशत लोअर बैक पेन केसेज नॉन-स्पेसिफिक होते हैं, यानी किसी एक बीमारी या स्पष्ट स्ट्रक्चरल कारण से उन्हें समझाया नहीं जा सकता. इसलिए हर कमर दर्द को स्लिप डिस्क या किसी गंभीर बीमारी का नाम दे देना भी सही नहीं है.
कमर दर्द होते ही कुछ लोग पेनकिलर लेना शुरू कर देते हैं, जबकि कुछ लोग सीधे एमआरआई या सर्जरी की तरफ चले जाते हैं. असल में ट्रीटमेंट का चुनाव दर्द के कारण, उसकी अवधि, सिम्पटम्स और व्यक्ति की फिजिकल कंडीशन के हिसाब से होना चाहिए.
डॉ. पंकज शर्मा से इस स्टोरी में यह सवाल अहम है कि मैकेनिकल या नॉन-स्पेसिफिक बैक पेन के किन मामलों में स्ट्रक्चर्ड फिजियोथेरेपी और एक्सरसाइज थेरेपी उपयोगी रहती है और मरीज को इम्प्रूवमेंट के लिए कितना समय देना चाहिए.
डब्ल्यूएचओ के मुताबिक लोअर बैक पेन के मैनेजमेंट में फिजिकल थेरेपीज, मसल स्ट्रेंथ और मूवमेंट सुधारने वाली एक्सरसाइज तथा रिहैबिलिटेशन की महत्वपूर्ण भूमिका है. डब्ल्यूएचओ क्रॉनिक प्राइमरी लोअर बैक पेन में एजुकेशन, सेल्फ केयर, एक्सरसाइज और कुछ फिजिकल थेरेपीज को नॉन-सर्जिकल ऑप्शंस के तौर पर शामिल करता है.
नाइस गाइडलाइन भी लोअर बैक पेन और साइटिका में व्यक्ति की जरूरत और क्षमता के अनुसार एक्सरसाइज प्रोग्राम पर विचार करने की सलाह देती है. मैनुअल थेरेपी को भी एक्सरसाइज के साथ ट्रीटमेंट पैकेज का हिस्सा माना जा सकता है. इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि हर मरीज को एक जैसी फिजियोथेरेपी करनी चाहिए. सही डायग्नोसिस और इंडिविजुअल असेसमेंट यहां सबसे जरूरी हिस्सा है.
कमर में दर्द होने पर दवा से जल्दी राहत मिल सकती है. लेकिन पेन रिलीफ और समस्या के कारण को ठीक करना एक ही बात नहीं है. यही वजह है कि दवा और रिहैबिलिटेशन को आमने-सामने खड़ा करने के बजाय मरीज की स्थिति के हिसाब से दोनों की भूमिका समझना जरूरी है.
नाइस के अनुसार लोअर बैक पेन में कुछ मामलों में एनएसएआईडीज पर विचार किया जा सकता है, लेकिन इन्हें व्यक्ति के रिस्क फैक्टर्स को ध्यान में रखते हुए सबसे कम प्रभावी डोज और कम से कम समय के लिए इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है. साइटिका में एनएसएआईडीज के लाभ के प्रमाण सीमित हैं और संभावित नुकसान को भी ध्यान में रखना चाहिए.
यानी खुद से लंबे समय तक पेनकिलर लेते रहना बैक पेन का स्थायी हल नहीं माना जा सकता. डॉ. पंकज शर्मा से यह भी पूछा जाना चाहिए कि दवा से टेम्परेरी रिलीफ मिलने के बाद रिहैबिलिटेशन को नजरअंदाज करने पर क्या समस्या दोबारा लौट सकती है.
कमर दर्द और एमआरआई में डिस्क प्रॉब्लम का नाम सुनते ही कई लोगों को लगता है कि अब सर्जरी ही एकमात्र रास्ता है. लेकिन क्लिनिकल गाइडलाइंस तस्वीर को इससे कहीं ज्यादा जटिल बताती हैं. नाइस के अनुसार साइटिका में स्पाइनल डीकंप्रेशन पर तब विचार किया जा सकता है जब नॉन-सर्जिकल ट्रीटमेंट से पेन या फंक्शन में सुधार नहीं हुआ हो और इमेजिंग फाइंडिंग्स भी व्यक्ति के साइटिक सिम्पटम्स से मेल खाती हों. यानी सिर्फ एमआरआई में कोई बदलाव दिखना अपने आप में सर्जरी का फैसला नहीं है.
डॉ. पंकज शर्मा कहते हैं कि जांच के बाद ये स्पष्ट होगा कि किन मरीजों में कंजरवेटिव ट्रीटमेंट यानी एक्सरसाइज, फिजियोथेरेपी और अन्य नॉन-सर्जिकल अप्रोचेज पर्याप्त हो सकती हैं और किन परिस्थितियों में स्पेशलिस्ट या सर्जन की राय जरूरी हो जाती है. खासकर लगातार बढ़ती कमजोरी, गंभीर नर्व सिम्पटम्स या दूसरे रेड फ्लैग्स को सामान्य बैक पेन समझकर टालना ठीक नहीं है.
कमर दर्द के साथ अगर दोनों पैरों में कमजोरी या सुन्नपन, जेनिटल या एनस के आसपास सेंसेशन कम होना, पेशाब करने में परेशानी या ब्लैडर और बॉवेल पर कंट्रोल में बदलाव हो तो इसे सामान्य डेस्क-जॉब पेन मानकर इंतजार नहीं करना चाहिए. एनएचएस ऐसे सिम्पटम्स को इमरजेंसी असेसमेंट की जरूरत वाले संकेतों में रखता है. अचानक बहुत तेज दर्द, तेजी से बिगड़ता दर्द या बुखार और अस्वस्थ महसूस होने जैसी स्थितियों में भी अर्जेंट मेडिकल असेसमेंट जरूरी हो सकता है.
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि फिजियोथेरेपी शुरू करने से पहले यह तय होना चाहिए कि कहीं कोई ऐसी अंडरलाइंग प्रॉब्लम तो नहीं है जिसमें दूसरे मेडिकल इंटरवेंशन की जरूरत हो.
लंबे समय तक बैठना अकेली समस्या नहीं है. लगातार एक ही पोजिशन में रहना, लैपटॉप को बहुत नीचे रखकर गर्दन झुकाना, कमर को सपोर्ट न देना और घंटों बिना ब्रेक काम करना समस्या को बढ़ा सकते हैं.
वहीं काम के बाद भी अगर व्यक्ति पूरा समय सोफे या बिस्तर पर ही बिताता है तो दिन की कुल फिजिकल एक्टिविटी और कम हो जाती है. डब्ल्यूएचओ लोअर बैक पेन में एक्टिव रहने, वर्कप्लेस एर्गोनॉमिक्स सुधारने, हेल्दी बॉडी वेट और पर्याप्त स्लीप जैसी सेल्फ केयर स्ट्रैटेजीज पर जोर देता है.
आईसीएमआर-एनआईएन की 2024 डायटरी गाइडलाइंस में भी 19 से 60 वर्ष के एडल्ट्स के लिए रोजाना 30 से 60 मिनट मॉडरेट-इंटेंसिटी एरोबिक फिजिकल एक्टिविटी कम से कम पांच दिन प्रति सप्ताह करने तथा मसल-स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज कम से कम दो दिन प्रति सप्ताह करने की सलाह दी गई है. यानी सिर्फ ऑफिस की कुर्सी बदल लेना काफी नहीं है. पूरे दिन के मूवमेंट पैटर्न को बदलना ज्यादा जरूरी हो सकता है.
डेस्क जॉब करने वालों के लिए सबसे प्रैक्टिकल बदलाव यह हो सकता है कि लगातार कई घंटे बैठने के बजाय काम के बीच छोटे मूवमेंट ब्रेक्स लिए जाएं. कुछ मिनट चलना, पोस्चर बदलना और अपनी क्षमता के अनुसार हल्की मूवमेंट करना शरीर को लंबे समय तक स्टैटिक पोजिशन में रहने से बचाता है.
यहां भी एक बात याद रखना जरूरी है कि सीवियर पेन, नर्व सिम्पटम्स या किसी डायग्नोस्ड स्पाइनल कंडीशन में अपनी तरफ से कोई एक्सरसाइज शुरू करने के बजाय फिजियोथेरेपिस्ट या डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
2024 की एक सिस्टमैटिक रिव्यू और मेटा-एनालिसिस ने ऑफिस वर्कर्स में सेडेंटरी बिहेवियर कम करने के लिए अलग-अलग इंटरवेंशंस का अध्ययन किया. ऐसे इंटरवेंशंस का मकसद वर्कप्लेस सिटिंग को कम करना और मूवमेंट बढ़ाना रहा है. इसलिए बैक हेल्थ का असली फॉर्मूला केवल दर्द आने के बाद ट्रीटमेंट लेना नहीं, बल्कि काम करने के तरीके में छोटे-छोटे बदलाव करना भी है.
कमर दर्द में सबसे बड़ी गलती शायद यही है कि हर व्यक्ति एक ही इलाज को सही मान ले. किसी को एक्सरसाइज और फिजियोथेरेपी से फायदा हो सकता है, किसी को शॉर्ट-टर्म मेडिकेशन की जरूरत हो सकती है और कुछ मामलों में स्पेशलिस्ट इवैल्यूएशन या सर्जरी भी जरूरी हो सकती है.
डब्ल्यूएचओ के अनुसार लोअर बैक पेन में रिहैबिलिटेशन महत्वपूर्ण है और ट्रीटमेंट उसके स्पेसिफिक या नॉन-स्पेसिफिक नेचर पर निर्भर करता है. नाइस भी असेसमेंट, सेल्फ मैनेजमेंट, एक्टिविटी और जरूरत के अनुसार एक्सरसाइज बेस्ड केयर को ट्रीटमेंट पाथवे का हिस्सा मानता है.
इसलिए डेस्क जॉब करने वालों के लिए सबसे अहम सबक यह है कि कमर दर्द को तब तक नजरअंदाज न करें जब तक वह रोजमर्रा के काम को प्रभावित करने लगे. वहीं हर दर्द को गंभीर बीमारी समझकर घबराने की भी जरूरत नहीं है.
डॉ. पंकज शर्मा से इस स्टोरी में एक्सपर्ट ओपिनियन लेते समय सबसे उपयोगी निष्कर्ष यही होना चाहिए कि मरीज पहले यह समझे कि उसका दर्द किस तरह का है, फिर उसी के अनुसार फिजियोथेरेपी, एक्सरसाइज, मेडिसिन या स्पेशलिस्ट ट्रीटमेंट का रास्ता चुने.
डिसक्लेमर: यह लेख सामान्य हेल्थ इन्फॉर्मेशन के लिए है. लगातार, गंभीर या नए सिम्पटम्स होने पर व्यक्तिगत मेडिकल असेसमेंट जरूरी है.
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