सेहत
नेशनल डॉक्टर्स डे के मौके पर हमने एवी अस्पताल, वैशाली (गाजियाबाद) में एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर विभाग के मेडिकल एडवाइजर और लीड कंसल्टेंट डॉ. (प्रो.) ए.के. सेठी से बातचीत की. उन्होंने डॉक्टरों की जिंदगी, मरीजों की जिम्मेदारियों और स्वास्थ्य से जुड़े कई अहम सवालों के आसान भाषा में जवाब दिए...
भारत में हर साल 1 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है. यह दिन डॉक्टरों की मेहनत, समर्पण और सेवा भावना को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है. डॉक्टर न सिर्फ मरीजों का इलाज करते हैं, बल्कि कई बार अपनी निजी जिंदगी, परिवार और आराम की परवाह किए बिना लोगों की जान बचाने में जुटे रहते हैं. डॉक्टरों को अक्सर 'धरती का भगवान' कहा जाता है, लेकिन उनके जीवन का दूसरा पहलू बहुत कम लोग जानते हैं. इस मौके पर हमने Dr. Arora AVee हॉस्पिटल, वैशाली (गाजियाबाद) में एनेस्थीसिया एवं क्रिटिकल केयर विभाग के मेडिकल एडवाइजर और लीड कंसल्टेंट डॉ. (प्रो.) ए.के. सेठी से बातचीत की. उन्होंने डॉक्टरों की जिंदगी, मरीजों की जिम्मेदारियों और स्वास्थ्य से जुड़े कई अहम सवालों के आसान भाषा में जवाब दिए.
डॉक्टर बनने के बाद सबसे बड़ा बदलाव क्या आता है, इस सवाल पर डॉ. सेठी कहते हैं कि सबसे बड़ी कमी समय की होती है. डॉक्टरों की जिंदगी सामान्य नौकरी की तरह तय समय पर नहीं चलती. त्योहार, छुट्टियां, परिवार के साथ समय बिताने की योजना और कई निजी अवसर अक्सर अस्पताल की ड्यूटी और इमरजेंसी के कारण छूट जाते हैं. कई बार रात के बीच में भी अस्पताल जाना पड़ता है क्योंकि किसी मरीज की जान बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है. हालांकि जब कोई गंभीर मरीज ठीक होकर अपने घर लौटता है तो वही डॉक्टर के लिए सबसे बड़ी खुशी और संतोष का कारण बनता है. उनके मुताबिक, ऐसे पल महसूस कराते हैं कि डॉक्टर ने जिंदगी में कुछ खोया नहीं, बल्कि बहुत कुछ पाया है.
परिवार और निजी जिंदगी के बारे में पूछने पर डॉ. सेठी बताते हैं कि डॉक्टर की जिंदगी में इमरजेंसी कभी भी आ सकती है इसलिए उनका रोजमर्रा का जीवन घड़ी देखकर नहीं चलता. इस वजह से परिवार को भी डॉक्टर के पेशे की प्रकृति को समझना पड़ता है. समय भले ही कम मिलता हो, लेकिन जो भी समय मिलता है, उसे परिवार, जीवनसाथी और बच्चों के साथ बिताने की पूरी कोशिश की जाती है. उनका मानना है कि डॉक्टर के सफल पारिवारिक जीवन के लिए परिवार का सहयोग और समझदारी बेहद जरूरी है.
क्या डॉक्टर अपना और अपने परिवार का इलाज खुद करते हैं, इस सवाल पर डॉ. सेठी का कहना है कि सामान्य और छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज डॉक्टर अक्सर खुद कर लेते हैं. लेकिन जब मामला गंभीर या विशेषज्ञता से जुड़ा हो तो दूसरे एक्सपर्ट डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर होता है. उन्होंने कहा कि मेडिकल फील्ड में निष्पक्ष राय बेहद जरूरी होता है. खासकर परिवार के सदस्य के इलाज में भावनात्मक जुड़ाव डॉक्टर के फैसलों पर असर डाल सकता है, इसलिए ऐसे मामले में दूसरे एक्सपर्ट डॉक्टर की सलाह लेना समझदारी होती है.
डॉक्टरों की लिखावट को लेकर अक्सर सवाल उठते हैं और कई बार उनकी हैंडराइटिंग ऐसी होती है जिसे आम आदमी को पढ़ पाना मुश्किल होता है. इस पर डॉ. सेठी बताते हैं कि नेशनल मेडिकल काउंसिल (NMC) की गाइडलाइन के अनुसार प्रिस्क्रिप्शन साफ और पढ़ने योग्य होना चाहिए. दवा का नाम, खुराक, दवा कितने दिन लेनी है और किस समय लेनी है, यह स्पष्ट लिखा जाना जरूरी है. आजकल अधिकतर बड़े अस्पतालों में कंप्यूटर आधारित या डिजिटल प्रिस्क्रिप्शन दिए जाते हैं जिससे हैंडराइटिंग की समस्या काफी कम हो गई है. फिर भी डॉक्टरों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मरीज उनके लिखे निर्देश आसानी से समझ सकें.
हर दिन कई मरीजों के संपर्क में रहने के बावजूद डॉक्टर खुद को कैसे सुरक्षित रखते हैं, इस पर डॉ. सेठी कहते हैं कि डॉक्टर भी आम लोगों की तरह इंसान ही होते हैं और उन्हें भी बीमारियां हो सकती हैं. संक्रमण से बचने के लिए हाथों की नियमित सफाई, जरूरत पड़ने पर मास्क का इस्तेमाल, संक्रमण नियंत्रण के नियमों का पालन और स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बहुत जरूरी है. इसके अलावा डॉक्टर समय-समय पर अपना स्वास्थ्य परीक्षण भी कराते रहते हैं ताकि किसी बीमारी का समय रहते पता चल सके.