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सिर्फ मर्डर मिस्ट्री नहीं, भरोसे और भय की कहानी भी है ‘द नर्मदा स्टोरी’, आखिर क्यों बंधे रहते हैं दर्शक आखिरी सीन तक?

The Narmada Story Review: यदि आप यथार्थवादी कहानियों, मजबूत अभिनय और सस्पेंस से भरपूर क्राइम-थ्रिलर पसंद करते हैं, तो ‘द नर्मदा स्टोरी’ इस सप्ताह सिनेमाघरों में देख सकते हैं.

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सिर्फ मर्डर मिस्ट्री नहीं, भरोसे और भय की कहानी भी है ‘द नर्मदा स्टोरी’, आखिर क्यों बंधे रहते हैं दर्शक आखिरी सीन तक?

Image Credit: AI, IMDb

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फ़िल्म समीक्षा: ‘द नर्मदा स्टोरी’
कलाकार: रघुबीर यादव, मुकेश तिवारी, अश्विनी कालसेकर, सिमाला प्रसाद, अंजलि पाटिल, ज़रीना वहाब, इश्तियाक़ ख़ान, आलोक चटर्जी, सदानंद पाटिल, शरद सिंह, हसन पीरजादा
निर्देशक: ज़ैग़म इमाम
निर्माता: एबी इन्फोसॉफ्ट क्रिएशन, गोल्डेन रेशियो फिल्म्स
जॉनर: क्राइम / थ्रिलर
अवधि: 2 घंटे 01 मिनट
*भाषा: हिंदी
*सेंसर: U/A
रिलीज़ की तारीख: 12 जून 2026
रेटिंग: ★★★★☆

इस सप्ताह सिनेमाघरों में रिलीज़ हो रही ‘द नर्मदा स्टोरी’ उन चुनिंदा फिल्मों में से है जो वास्तविक घटनाओं से प्रेरित होने के बावजूद सिर्फ तथ्यों का ब्योरा नहीं बनती, बल्कि एक प्रभावशाली सिनेमाई अनुभव भी रचती है. निर्देशक ज़ैग़म इमाम ने कहानी को पूरी तरह ज़मीन से जुड़ा रखा है और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है. वह फिल्म को रियलिस्टिक बनाए रखते हुए सस्पेंस की पकड़ भी ढीली नहीं होने देते. नतीजा यह है कि दर्शक शुरुआत से लेकर आख़िरी दृश्य तक कहानी के साथ जुड़े रहते हैं.

डर और संघर्ष का मिश्रण

कहानी नर्मदा अंचल में घटित होने वाली रहस्यमयी घटनाओं और उनके पीछे छिपे सच के इर्द-गिर्द घूमती है. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, कहानी नई परतें खोलती जाती है. पुलिस और आम जनता के बीच विश्वास, डर और संघर्ष का जो ताना-बाना फिल्म में बुना गया है, वह इसे एक साधारण क्राइम-थ्रिलर से अलग पहचान देता है. फिल्म कई जगह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर सच और अफवाह के बीच की रेखा कितनी पतली होती है.

द नर्मदा स्टोरी कास्ट

अभिनय फिल्म का मजबूत पक्ष है. रघुबीर यादव और मुकेश तिवारी अपने अनुभव का पूरा असर छोड़ते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं सिमाला प्रसाद. एक पुलिस अधिकारी के किरदार में उनका आत्मविश्वास, संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस कहानी को मजबूती प्रदान करते हैं. सिमाला कई महत्वपूर्ण दृश्यों में फिल्म की धुरी बनकर उभरती हैं और साबित करती हैं कि वह सिर्फ खूबसूरत चेहरा नहीं बल्कि एक सशक्त अभिनेत्री भी हैं.

फिल्म का सबसे चौंकाने वाला पहलू इश्तियाक़ ख़ान और सदानंद पाटिल का किन्नर अवतार है. दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों में ऐसी जीवंतता भरी है कि वे लंबे समय तक याद रहते हैं. खासतौर पर इश्तियाक़ ख़ान को किन्नर ‘निशा’ के रूप में देखना कई दृश्यों में डर और बेचैनी पैदा करता है. उनका मेकअप, बॉडी लैंग्वेज और आंखों के भाव किरदार को बेहद प्रभावी बनाते हैं. 

अश्विनी कालसेकर, अंजलि पाटिल और ज़रीना वहाब अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करती हैं. शरद सिंह और हसन पीरजादा भी सीमित स्क्रीन स्पेस में प्रभाव छोड़ने में सफल रहते हैं. दोनों कलाकार कहानी के महत्वपूर्ण हिस्सों को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं और फिल्म के यथार्थवादी माहौल को मजबूत बनाते हैं.

लोकेशन का रखा गया ख्याल

तकनीकी रूप से भी फिल्म प्रभावित करती है. नर्मदा क्षेत्र की वास्तविक लोकेशंस कहानी को प्रामाणिकता देती हैं. सिनेमैटोग्राफी वातावरण में मौजूद रहस्य और तनाव को खूबसूरती से उभारती है, जबकि बैकग्राउंड म्यूजिक कई दृश्यों को और प्रभावशाली बना देता है. संपादन भी कसा हुआ है, जिससे फिल्म अपनी गति बनाए रखती है.

ज़ैग़म इमाम की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने बिना किसी अनावश्यक ड्रामे या मसालेबाज़ी के एक ऐसी क्राइम-थ्रिलर बनाई है जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज और कानून व्यवस्था से जुड़े कई सवाल भी उठाती है. फिल्म का क्लाइमैक्स रोंगटे खड़े कर देने वाला है और दर्शकों को अंत तक अनुमान लगाने पर मजबूर रखता है.

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