एंटरटेनमेंट
स्टोरी के चलते दर्शकों का वो उत्साह ठंडा पड़ गया जो Amazon Prime Video पर प्रसारित हो रही वेब सीरीज Panchayat 4 को लेकर था. आइये नजर डालें उन तीन कारणों पर जो स्वतः इस बात की पुष्टि कर देंगे कि कैसे दाल में काला के चक्कर में मेकर्स ने पूरी डाल ही काली कर दी.
फैंस का इंतजार ख़त्म हुआ. अमेजन प्राइम पर पंचायत 4 रिलीज हो गई. चूंकि पंचायत एक ऐसी सीरीज है, जिससे दिल्ली, बेंगलुरु या फिर मुंबई और लखनऊ जैसे शहर में बैठा व्यक्ति अपने से खूब रिलेट करता और इसे देखते हुए अपने गांव की तरफ लौट जाता है. (तीसरे सीजन को छोड़ दें तो दो सीजन में ऐसा ही देखने को मिला) इसलिए जब हम पंचायत 4 को देखते हैं तो थोड़ी निराशा होती है. महसूस होता है कि चाहे वो इस सीरीज का कथ्य हो या फिर किरदार, दोनों की चाल ढाल पूर्व की अपेक्षा सुस्त है.
बात आगे बढ़े उससे पहले ये बता देना जरूरी है कि यहां हम पंचायत का रिव्यू नहीं कर रहे. हम बस उन कमियों पर बात करेंगे जिनको जानते समझते हुए स्वतः इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि कैसे पंचायत जैसी हिट सीरीज की दुर्गति किसी और ने नहीं बल्कि मेकर्स ने खुद की है.
जी हां. ये मेकर्स ही हैं जिन्होंने 'लंबा खींचने' के उद्देश्य से ऐसा बहुत कुछ कर दिया है, जिसने पंचायत जैसी एक सॉफ्ट कॉमेडी को वो रंग दे दिया जो भले ही कुछ भी हो. मगर अब आंखों को अच्छा नहीं लगता. और जब कोई इसे ज्यादा देर तक देखे तो आंखों में आंसू आते हैं. जो किसी सिचुएशन के न होकर पीढ़ा के होते हैं.
पंचायत 4 पर दर्शकों का रिस्पॉन्स कैसा है? उन्हें उन प्रतिक्रियाओं से भी समझ सकते हैं जो सोशल मीडिया पर आ रही हैं और जिनमें कहा जा रहा है कि पंचायत हमें सिर्फ समाज में बने रहने के लिए देखना चाहिए. किसी ने इससे ज्यादा की उम्मीद लगाई हो तो उसके साथ सिर्फ और सिर्फ निराश ही आएगी.
आइये नजर डालें उन तीन कारणों पर जो स्वतः इस बात की पुष्टि कर देंगे कि कैसे दाल में काला के चक्कर में मेकर्स ने पूरी डाल ही काली कर दी.
Too Much पॉलिटिक्स
इस बात को समझने के लिए हमें पंचायत के पहले सीजन का रुख करना पड़ेगा जिसकी स्क्रिप्ट आज भी इस पूरी सीरीज के लिए मील का पत्थर है. पहले या फिर दूसरे सीजन को देखें तो उसमें गांव था. गांव के लोग थे. नोंक झोंक थी. गांव के मुद्दे और हंसी मजाक था. राजनीति इस सीजन में थी लेकिन सिर्फ उतनी जितना दाल में नमक होता है जो उसे जायका देता है. पहले और दूसरे सीजन में जितने भी एपिसोड्स थे उन्हें आज भी लूप पर देखा जा सकता है और शायद ही कोई ऐसा हो जिसे इन्हें देखते हुए बोरियत का एहसास हो. तीसरे सीजन में पॉलिटिक्स की एंट्री हुई तो हिसाब किताब अलग हो गया. चूंकि पंचायत 3 का बेस पॉलिटिक्स था जिसे पंचायत 4 में कैरी फॉरवर्ड किया गया सारा मजा इसलिए भी किरकिरा हुआ क्योंकि हमें पंचायत के चुनाव तो दिखे लेकिन वो फुलेरा और वहां के लोग नहीं दिखे जिन्होंने हमें अपनी परफॉरमेंस से पहले और दूसरे सीजन में एंटरटेन किया था.
Series को Chewing-Gum समझना
आज सिनेमा और एंटरटेनमेंट का स्वरूप बदल चुका है. मैच्योर ऑडियंस को छोड़ कर अगर किसी बच्चे से भी पूछें तो वो यही कहेगा कि एपिसोड्स छोटे और एंटेरटेनिंग होने चाहिए. ऐसे में जब हम पंचायत 4 को देखते हैं तो मिलता है कि मेकर्स ने इन्हें बस बनाने के उद्देश्य से बनाया और सीरीज एंटेरटेनिंग न होकर च्युइंग गम की तरह हो गई है.जिक्र चौथे सीजन का हुआ है तो बता दें कि कंटेंट के नाम पर ऐसा कुछ नहीं है जिसपर समय खर्च किया जा सके. कह सकते हैं कि चौथे सीजन तक आते आते फुलेरा में गांव और उसका डेवलपमेंट कहीं खो गया और पूरी स्क्रिप्ट पर गांव और वहां की राजनीति कुछ ज़्यादा ही हावी हो गयी.
अब आगे और नहीं
पंचायत का सीजन वन, फिर टू, फिर थ्री, फोर और उसके बाद भी मेकर्स ये कह रहे हैं कि जल्द ही 5वें सीजन की शूटिंग शुरू की जाएगी. यानी सीधे सीधे मेकर्स द्वारा पंचायत को, उसके कंटेंट को खींचने की कोशिश हो रही.
कहने बताने को तो इस विषय पर काफी बात हो सकती है. लेकिन देखा जाए तो समस्या यही है.
मेकर्स को इसी से बचना था. चौथे सीजन में इसे ख़त्म कर देना था लेकिन अब जबकि उन्होंने इसे आगे शूट करने का फैसला किया है तो साफ़ है कि फिर किसी तिल को पकड़कर उसका ताड़ किया जाएगा जिससे सीधे सीधे कहानी ही प्रभावित होगी.
क्योंकि मेकर्स ने 5 वें सीजन को शूट करने की बात की है तो हम बस ये कहकर अपनी बात को विराम देंगे कि अब इसका अंत कर दें. ऐसा इसलिए क्योंकि अब दर्शकों को बोरियत के अलावा कोई दूसरी चीज नहीं मिल रही.