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72nd National Film Awards: 'श्रीकांत' और 'आर्टिकल 370' को ही क्यों मिला बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड, धुरंधर को क्यों नहीं? जानें दोनों फिल्मों की कहानी

72वें नेशनल अवॉर्ड्स में 'श्रीकांत' और 'आर्टिकल 370' ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब क्यों जीता? इन फिल्मों की कहानी और इसकी खासियत क्या है, आइए हम आपको बताते है.

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72nd National Film Awards: 'श्रीकांत' और 'आर्टिकल 370' को ही क्यों मिला बेस्ट फिल्म का अवॉर्ड, धुरंधर को क्यों नहीं? जानें दोनों फिल्मों की कहानी

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72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने एक बार फिर भारतीय सिनेमा के उस पहलू को रेखांकित किया है जहां 'कंटेंट' ही राजा है. इस बार फीचर फिल्म श्रेणी में 'श्रीकांत' और 'आर्टिकल 370' को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के पुरस्कार से नवाजा गया है. कई दर्शकों के मन में सवाल है कि बड़ी बजट वाली फिल्मों के मुकाबले इन फिल्मों को ही क्यों चुना गया? और तो और बॉक्स ऑफिस पर राज करने वाले रणवीर सिंह की धुरंधर कैसे पीछे रह गई. तो चलिए हम आपको यहां बताते हैं कि 'श्रीकांत' और 'आर्टिकल 370' को ही क्यों इस राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया. 

'श्रीकांत' और 'आर्टिकल 370' को क्यों मिला सम्मान? 

फिल्मों को पुरस्कार जूरी (निर्णायक मंडल) के सदस्यों की पसंद, कहानी के विषय, स्क्रिप्ट, निर्देशन और एक्टिंग के आधार पर मिलते हैं. 'आर्टिकल 370' और 'श्रीकांत' को उनकी दमदार कहानी और सामाजिक संदेश के कारण राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. 'श्रीकांत' ने मानवीय संवेदनाओं को छुआ, तो 'आर्टिकल 370' ने समकालीन राजनीति को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया. इन फिल्मों की कहानियां ऐसी थीं जो भारतीय दर्शकों के जहन में लंबे समय तक रहने वाली हैं

फिल्म 'श्रीकांत' की क्या है कहानी?

तुषार हीरानंदानी द्वारा निर्देशित 'श्रीकांत' एक वास्तविक जीवन पर आधारित बायोपिक है। राजकुमार राव ने श्रीकांत बोल्ला के किरदार को जिस जीवंतता के साथ निभाया है, उसने इसे एक साधारण फिल्म से ऊपर उठाकर एक 'प्रेरणा' बना दिया है.
यह कहानी आंध्र प्रदेश के एक ऐसे बालक की है जो जन्म से ही दृष्टिहीन है। समाज और यहाँ तक कि परिवार का एक हिस्सा भी उसके प्रति संवेदनहीन था, लेकिन श्रीकांत की इच्छाशक्ति अदम्य थी। फिल्म दिखाती है कि कैसे उसने बाधाओं को लांघते हुए स्कूल में टॉप किया और फिर आईआईटी में दाखिला न मिलने पर हार नहीं मानी, बल्कि अमेरिका के प्रतिष्ठित एमआईटी विश्वविद्यालय तक का सफर तय किया। अपनी अध्यापिका के सहयोग से शिक्षित होकर, उसने वापस भारत आकर अपने जैसे दिव्यांगों को रोजगार देने वाली कंपनी की नींव रखी। यह फिल्म महज एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि समावेशी समाज (Inclusive Society) के निर्माण का संदेश है, जिसने जजों का दिल जीत लिया.

क्या है 'आर्टिकल 370' की कहानी?

आदित्य सुहास जंभाले के निर्देशन में बनी 'आर्टिकल 370' एक राजनीतिक ड्रामा है, जो 2019 में जम्मू-कश्मीर से विशेष राज्य का दर्जा हटाने की ऐतिहासिक घटना पर आधारित है.
कहानी की शुरुआत जूनी हक्सर (यामी गौतम) नामक एक खुफिया अधिकारी से होती है। फिल्म को छह अध्यायों में बड़ी कुशलता से बुना गया है। इसमें बुरहान वानी के खात्मे से लेकर पुलवामा हमले तक की घटनाओं को एक कड़ी के रूप में दिखाया गया है। फिल्म का मुख्य फोकस इस बात पर है कि कैसे पीएमओ सचिव राजेश्वरी स्वामीनाथन और उनकी टीम ने कश्मीर में शांति लाने और अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के लिए रणनीतिक ऑपरेशन चलाए। फिल्म में स्थानीय भ्रष्ट नेताओं और उग्रवाद की चुनौतियों को बेहद बारीकी से दिखाया गया है। यह फिल्म राजनीतिक जटिलताओं को जिस तरह से पर्दे पर उतारती है, वह दर्शकों और समीक्षकों दोनों को प्रभावित करने में सफल रही है.

'धुरंधर' और अन्य बड़ी फिल्में क्यों पिछड़ गईं?

अक्सर दर्शक सोचते हैं कि बड़े बजट और बड़े सितारों वाली फिल्में (जैसे 'धुरंधर') क्यों पीछे रह गईं? राष्ट्रीय पुरस्कारों की जूरी केवल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन या बजट नहीं देखती, बल्कि 'सिनेमाई उत्कृष्टता', 'सामाजिक प्रासंगिकता', 'विषय का चयन' और 'निर्देशन की नवीनता' को प्राथमिकता देती है.
'श्रीकांत' ने मानवीय संवेदनाओं को छुआ, तो 'आर्टिकल 370' ने समकालीन राजनीति को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया. इन फिल्मों की कहानियां ऐसी थीं जो भारतीय दर्शकों के जहन में लंबे समय तक रहने वाली हैं, जबकि 'धुरंधर' जैसी फिल्मों में शायद वह गहराई या 'इंपैक्टफुल नैरेटिव' नहीं बन पाया जिसकी अपेक्षा राष्ट्रीय मंच करता है. संक्षेप में, इन पुरस्कारों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय सिनेमा अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रभाव छोड़ने वाली कहानियों की ओर बढ़ रहा है.

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