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माचिस-सिगरेट के डिब्बे पर लिखे धुन, 65Yr पहले ऐसे तैयार हुआ था 4 Min 41 Sec का ये गाना, आज है हर महफिल की जान

देव आनंद की फिल्म 'काला बाजार' का एक सदाबहार गीत ऐसा भी है, जो एक माचिस की डिब्बी पर लिखा गया था. आर.डी. बर्मन और शैलेंद्र की जुहू बीच पर हुई इस मुलाकात ने बॉलीवुड जगत में इतिहास रच दिया था. चलिए यह किस्सा जान लेते हैं.

Pragya Bharti | Mar 14, 2026, 02:19 PM IST

1.Bollywood Old Song History

Bollywood Old Song History
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हिंदी सिनेमा और संगीत का रिश्ता रूह और शरीर जैसा है. कुछ गाने केवल मनोरंजन के लिए बनते हैं, लेकिन कुछ धुनें वक्त की सीमाओं को लांघकर अमर हो जाती हैं. साल 1960 में आई फिल्म 'काला बाजार' का एक जादुई गीत ऐसी ही कृति है, जो बेहद यूनिक तरीके से बनी थी. आज के डिजिटल युग में यह यकीन करना मुश्किल है कि इस ब्लॉकबस्टर गाने का जन्म एक माचिस की तीली और डिब्बी के जरिए हुआ था.

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2.पिता का आदेश और आर.डी. बर्मन की मेहनत

पिता का आदेश और आर.डी. बर्मन की मेहनत
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इस गाने की धुन महान संगीतकार एस.डी. बर्मन (सचिन देव बर्मन) ने तैयार की थी. फिल्म के निर्माता देव आनंद थे और गीत लिखने की जिम्मेदारी शैलेंद्र को दी गई थी. शैलेंद्र उन दिनों काफी व्यस्त थे, जिससे काम में देरी हो रही थी. तब एस.डी. बर्मन ने अपने बेटे आर.डी. बर्मन (पंचम दा) को काम सौंपा कि वे शैलेंद्र के पास जाएं और गाना लिखवाकर ही लौटें.

3.जुहू बीच की वो यादगार रात

जुहू बीच की वो यादगार रात
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पंचम दा शैलेंद्र के पास पहुंचे और उन्हें लेकर मुंबई के जुहू बीच पर चले गए. रात के 11 बज रहे थे, समंदर की लहरें शोर कर रही थीं और शैलेंद्र गहरी सोच में डूबे लगातार सिगरेट फूंके जा रहे थे. उन्हें गाने के शुरुआती शब्द नहीं मिल रहे थे. आर.डी. बर्मन भी थोड़े चिंतित थे क्योंकि उन्हें खाली हाथ घर नहीं लौटना था.

4.सिगरेट जलाने वक्त मिली गाने की धुन

सिगरेट जलाने वक्त मिली गाने की धुन
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तभी एक दिलचस्प मोड़ आया. शैलेंद्र की माचिस खत्म हो गई और उन्होंने पंचम दा से सिगरेट जलाने के लिए माचिस मांगी. माचिस लेते वक्त शैलेंद्र ने कहा- "दादा, जरा धुन तो सुनाओ." पंचम दा ने उसी माचिस के डिब्बे पर ताल देते हुए धुन गुनगुनाना शुरू किया. उस समय आसमान में पूनम का चांद अपनी पूरी चमक बिखेर रहा था. उस माहौल और धुन के जादू ने शैलेंद्र के भीतर के कवि को जगा दिया.

5.नहीं थे कागज कलम तो माचिस की डिब्बी पर ही लिख डाला

नहीं थे कागज कलम तो माचिस की डिब्बी पर ही लिख डाला
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उन्होंने अचानक आसमान की ओर देखा और बोल फूट पड़े. उस वक्त पास में न कागज था न कलम, पंचम दा ने तुरंत उसी माचिस की डिब्बी पर उन अल्फाजों को खुरचकर या लिख लिया और घर लौट आए.

6.सिगरेट के पैकेट और माचिस बॉक्स पर कौन सा गाना तैयार हुआ?

सिगरेट के पैकेट और माचिस बॉक्स पर कौन सा गाना तैयार हुआ?
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दरअसल, जिस गाने की हम बात कर रहे हैं. वह है- 'खोया-खोया चांद, खुला आसमान'. इस गाने में देव आनंद और वहीदा रहमान हैं. 65 साल पुराना होने के बाद भी लोग आज भी इस गाने को खूब पसंद करते हैं. 

7.मोहम्मद रफी ने दी आवाज

मोहम्मद रफी ने दी आवाज
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अगली सुबह जब यह धुन और बोल तैयार हुए, तो इसे मोहम्मद रफी ने अपनी मखमली आवाज दी. पर्दे पर देव आनंद का मस्तमौला अंदाज और वहीदा रहमान की सादगी ने इस गाने को सिनेमाई इतिहास का हिस्सा बना दिया. आज भी जब यह गाना बजता है, तो वही रूहानी सुकून मिलता है जो दशकों पहले मिला था.
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