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"द बंगाल फाइल्स" एक ऐतिहासिक फ़िल्म है जो 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे की भयावहता और उसके प्रभावों को दर्शाती है. ये फ़िल्म इतिहास के एक बड़े हिस्से को दिखाती है जिसे भुला दिया गया है. फिल्म को ने 4 की रेटिंग दी जाती है.
"द बंगाल फाइल्स" फ़िल्म में इतिहास और समकालीन कहानी कहने का बेहतरीन मिश्रण है, जो अतीत और वर्तमान को आपस में जोड़ती है. अनुपम खेर, राजेश खेरा, नमाशी चक्रवर्ती और दर्शन कुमार जैसे कलाकारों के शानदार अभिनय के साथ ये फ़िल्म इतिहास के उन कई अद्भुत और रोचक संघर्ष को समेटे हुए हैं जिसे लोग शायद भूल गए या जानते ही नहीं हैं.
'द बंगाल फाइल्स' फ़िल्म में निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री ने 1946 के डायरेक्ट एक्शन डे को गहराई से दिखाया है. यह फ़िल्म बंगाल के इतिहास के एक दुखद अध्याय और उसके प्रभावों की पड़ताल करती है. यह फ़िल्म इतिहास और समकालीन कहानी कहने के तरीके का एक बेहतरीन मिश्रण है. इसकी कहानी अलग-अलग समय में घूमती है, जो अतीत की भयावहता और वर्तमान के परिणामों को आपस में जोड़ती है, बिना किसी अनावश्यक नाटकीयता के.
गांधी और जिन्ना के किरदार में सटीक लगे ये किरदार
अनुपम खेर का गांधी और राजेश खेरा का जिन्ना जैसे किरदार फ़िल्म को ऐतिहासिक संदर्भ देते हैं, लेकिन वे मुख्य कहानी पर हावी नहीं होते. नमाशी चक्रवर्ती ने खलनायक की भयावहता को बहुत ही भरोसेमंद तरीके से दर्शाया है. शाश्वत चटर्जी, मोहन कपूर और प्रियांशु चटर्जी जैसे कलाकारों ने भी फ़िल्म की प्रामाणिकता को बनाए रखा है.
दर्शन कुमार ने एक पुलिस अधिकारी शिवा पंडित के रूप में ज़बरदस्त अभिनय किया है, जो एक जटिल जांच को सुलझाने की कोशिश करता है. सिमरत कौर ने भारती बनर्जी का किरदार बहुत ही सहजता से निभाया है, जबकि एकलव्य सूद का अमरजीत फ़िल्म की भावनात्मक परत को संतुलित करता है. पल्लवी जोशी ने बड़ी भारती के किरदार में गहराई और बारीक़ियाँ भरी हैं. वहीं, मिथुन चक्रवर्ती ने एक रहस्यमयी पागल आदमी के रूप में बहुत ही शांत लेकिन परेशान कर देने वाला प्रदर्शन दिया है, जो फ़िल्म में एक मनोवैज्ञानिक आयाम जोड़ता है.
क्यों मिला है 4 स्टार रेटिंग?
इस फिल्म को 4 रेटिंग दी जा रही है क्योंकि कई स्तरों पर इस फिल्म का रिव्यू किया गया है. फ़िल्म कुछ ऐसे दृश्य भी दिखाती है जो क्रूरता से भरे हैं, लेकिन उनका प्रस्तुतिकरण जानबूझकर और संयमित रखा गया है. ये दृश्य अपनी अतिरंजित प्रस्तुति की बजाय अपनी वास्तविकता और संदर्भ की वजह से ज़्यादा प्रभावशाली हैं.
कुल मिलाकर, 'द बंगाल फाइल्स' एक मजबूत ऐतिहासिक संदेश को एक आकर्षक कहानी के साथ सफलतापूर्वक मिलाती है. यह फ़िल्म इतिहास के एक बड़े हिस्से को दिखाती है जिसे भुला दिया गया है, अपने किरदारों को आवाज़ देती है और दर्शकों को इस पर सोचने के लिए प्रेरित करती है.
पल्लवी जोशी ने राष्ट्रपति से लगाई थी गुहार
पल्लवी ने लिखा है,
आदरणीय राष्ट्रपति महोदया,
मैं भारी मन से आपसे मदद नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए ये लेटर लिख रही हूं. द बंगाल फाइल्स, फाइल्स ट्रायॉलजी का आखिरी भाग, 5 सितंबर को रिलीज हो रही है. यह डायरेक्ट एक्शन डे के हिंदू नरसंहार, नोआखाली की भयावहता और पार्टिशन के आघात की लंबे समय से दबी हुई सच्चाई को बयां करती है. लेकिन पश्चिम बंगाल में सच्चाई खतरे में है. फिल्म पूरी होने से कई साल पहले ही मुख्यमंत्री ने फिल्म का मजाक उड़ाया था. तब से, बेबुनियाद FIR दर्ज की गई हैं, हमारे ट्रेलर को पुलिस ने रोक दिया था और यहां तक कि अखबार भी विज्ञापन देने से बचते हैं. मेरे परिवार को हर दिन राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं से धमकियां मिल रही हैं. अब थिएटर मालिकों ने हमें बताया है कि उन्हें धमकाया जा रहा है और वे रूलिंग पार्टी के कार्यकर्ताओं के हिंसा के डर से इसे दिखाने से इनकार कर रहे हैं. कोई ऑफिशियली बैन नहीं है, फिर भी लोगों के देखने से पहले ही एक अनऑफिशियल बैन है इस फिल्म पर.
लेजेंडरी एक्टर, पद्म भूषण विक्टर बनर्जी, भारत और विदेशों में कई बंगाली संगठनों के साथ, पहले ही आपसे अनुरोध कर चुके हैं. उनका ये सपोर्ट इस बात का सबूत है कि सत्य के साथ अभी भी लोग खड़े हैं. द बंगाल फाइल्स मां भारती की पुकार है, जख्मी पर अटूट, अस्तित्व और आशा की कहानी. एक महिला के रूप में, जो हाशिये से उठकर सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंची, केवल आप ही सही मायने में समझ सकती हैं कि इस तरह के दर्द को सहना और उसे उद्देश्य में बदलना क्या होता है.
ये सच्चाई का सिनेमा है. लेकिन सच्चाई को भी सुरक्षा की जरूरत होती है. राष्ट्रपति महोदया, मैं किसी फिल्म के लिए कोई एहसान नहीं, बल्कि कला के लिए, सच्चाई के लिए, मां भारती की आत्मा के लिए बिना किसी डर के बोलने की जगह चाहती हूं. आप मेरी आखिरी उम्मीद हैं. कृपया हमारे संवैधानिक अधिकार की रक्षा करें और द बंगाल फाइल्स को पश्चिम बंगाल में शांतिपूर्वक दिखाया जाए.