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नेशनल अवॉर्ड जीतते ही कंगाल हो गए थे आशीष विद्यार्थी, बोले- पार्टी में सता रहा था बर्तन मांजने का डर

आशीष विद्यार्थी का जीवन संघर्षो से भरा रहा है. राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने के बाद भी उन्हें पैसे कमाने के लिए मजबूर होना पड़ा. उनकी जीनव की कुछ रोचक बातें जिनसे आप अनजान हैं.

नेशनल अवॉर्ड जीतते ही कंगाल हो गए थे आशीष विद्यार्थी, बोले- पार्टी में सता रहा था बर्तन मांजने का डर

आशीष विद्यार्थी

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बॉलीवुड में जितनी चकाचौंध हमें बाहर से दिखती है, अंदर की हकीकत उतनी ही अलग होती है. यहां कई ऐसे सितारे हैं जिन्होंने सफलता का स्वाद तो चखा, लेकिन उसके पीछे का उनका संघर्ष किसी को नजर नहीं आया. ऐसे ही एक कलाकार हैं आशीष विद्यार्थी, जिन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग से हमेशा दर्शकों का दिल जीता है. आज वो एक जाने-माने एक्टर, मोटिवेशनल स्पीकर और फूड व्लॉगर हैं, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब नेशनल अवॉर्ड जैसा बड़ा सम्मान पाने के बाद भी उनकी जेब बिल्कुल खाली थी.

डायरेक्टर ने कहा 'पार्टी दो', एक्टर की जेब थी खाली

आशीष विद्यार्थी ने अपने उस दौर को याद किया जब उन्हें फिल्म 'द्रोहकाल' (1995) के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला था. ये किसी भी एक्टर के लिए बहुत बड़ा पल होता है, लेकिन आशीष के लिए ये खुशी के साथ-साथ एक बड़ी चिंता भी लेकर आया. उन्होंने बताया कि अवॉर्ड मिलने के बाद फिल्म के डायरेक्टर गोविंद निहलानी ने उनसे एक शानदार पार्टी देने के लिए कहा. उन्होंने तो मुंबई के मशहूर रेस्टोरेंट 'मेनलैंड चाइना' का नाम भी सुझा दिया.

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पार्टी में नींबू पानी पी रहे थे आशीष, सता रहा था बिल का डर

आशीष बताते हैं कि उस वक्त वो मुंबई में किराए के एक छोटे से घर में रहते थे और अपने माता-पिता की देखभाल भी करते थे. उनकी आर्थिक हालत इतनी खराब थी कि घर का किराया देना भी मुश्किल हो रहा था. दोस्तों के जोर देने पर उन्होंने पार्टी तो रख ली, लेकिन पूरी शाम उनका दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कता रहा. वो बताते हैं, मैं पूरी पार्टी में हाथ में सिर्फ नींबू पानी का गिलास लेकर घूमता रहा, क्योंकि मैं बिल नहीं बढ़ाना चाहता था. मैं इतना डर गया था कि मैंने डायरेक्टर से पूछा, 'सर, अगर मैं बिल नहीं चुका पाया तो क्या होगा? क्या मुझे पूरी जिंदगी यहां बर्तन मांजने पड़ेंगे?

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उनकी ये हालत देखकर डायरेक्टर गोविंद निहलानी मुस्कुराए और उन्हें तसल्ली दी. उन्होंने आशीष से कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, पार्टी का पूरा बिल वो चुकाएंगे. ये सुनने के बाद ही आशीष की जान में जान आई और वो अपनी सफलता का जश्न मना सके.

अवॉर्ड के बाद भी करना पड़ा संघर्ष

आशीष ने यह भी बताया कि नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ था. परिवार की जिम्मेदारियों के चलते उन्हें जो भी काम मिलता, वो कर लेते थे, फिर चाहे वो बी-ग्रेड फिल्में ही क्यों न हों. आज आशीष विद्यार्थी एक सफल मुकाम पर हैं, लेकिन उनका ये किस्सा दिखाता है कि कामयाबी के शिखर पर पहुंचने का रास्ता कितना मुश्किलों भरा हो सकता है.

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