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कोलकाता का भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय देश की सबसे पुरानी लाइब्रेरी है. जानें इसके बारे में सारी डिटेल्स...
भारत में शिक्षा और ज्ञान का समृद्ध इतिहास है. प्राचीन पुस्तकालयों ने इसकी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को संरक्षित करने में अहम भूमिका निभाई है. इन पुस्तकालयों ने सदियों से अमूल्य पांडुलिपियों और पुस्तकों को सुरक्षित रखा है जो साहित्य, विज्ञान और कला जैसे विभिन्न विषयों के ज्ञान का भंडार हैं. देश की सबसे पुरानी लाइब्रेरी भी इसी परंपरा की प्रतीक है जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए ज्ञान को संरक्षित करने के लिए किए गए प्रयासों को दिखाता है.
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भारत की सबसे पुरानी लाइब्रेरी
कोलकाता का भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय देश की सबसे पुरानी लाइब्रेरी है. साल 1891 में इंपीरियल लाइब्रेरी के रूप में इसकी स्थापना की गई थी और आजादी के बाद इसका नाम बदल दिया गया. इस लाइब्रेरी में 2.5 मिलियन से ज्यादा किताबें, दुर्लभ पांडुलिपियां और नक्शे हैं जो इसे भारत की साक्षरता और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं. किताबों की संख्या और सार्वजनिक अभिलेखों को संरक्षित करने में अपनी भूमिका के हिसाब से यह भारत की सबसे पुरानी लाइब्रेरी भी है. इस लाइब्रेरी को संस्कृति मंत्रालय प्रबंधित करता है.
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भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय का इतिहास
इस लाइब्रेरी में पहले कई छोटी लाइब्रेरियां शामिल थीं. इनमें होम डिपार्टमेंट लाइब्रेरी भी शामिल थी जिसमें ईस्ट इंडिया कंपनी की दुर्लभ पुस्तकें रखी गई थीं. शुरुआत में लाइब्रेरी में केवल ऊंचे पदों पर बैठे ब्रिटिश अधिकारी ही जा सकते थे. इस लाइब्रेरी के विकास में सर आशुतोष मुखर्जी ने काफी योगदान दिया. साल 1910 में उन्होंने अपने निजी संग्रह से 80,000 किताबें दान कीं. इन किताबों को एक अलग खंड में व्यवस्थित किया गया जिससे पुस्तकालय का महत्व बढ़ गया.
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कब-कब बदला नाम
भारत को आजादी मिलने के बाद 1948 में इंपीरियल लाइब्रेरी का नाम बदलकर नेशनल लाइब्रेरी कर दिया गया. 1 फरवरी 1953 को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने आधिकारिक तौर पर नेशनल लाइब्रेरी को आम जनता के लिए खोल दिया. बाद में भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय अधिनियम 1976 के तहत इसका नाम बदलकर भारतीय राष्ट्रीय पुस्तकालय कर दिया गया. इस लाइब्रेरी में लगभग सभी भारतीय भाषाओं की किताबें, पत्रिकाएं और अभिलेख संरक्षित हैं.
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