एजुकेशन
Jaya Pandey | Mar 13, 2026, 04:46 PM IST
1.भारत में कहां है लिटिल ईरान?

भारत और फारस यानी आज के ईरान के बीच संबंध बहुत पुराने समय से रहे हैं. प्राचीन काल से ही दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापारिक और सांस्कृतिक संपर्क मौजूद थे. अरब सागर के समुद्री मार्गों और मध्य एशिया से होकर गुजरने वाले स्थलीय रास्तों के जरिए व्यापारी दोनों क्षेत्रों के बीच यात्रा करते थे. इन रास्तों से कपड़े, मसाले, कीमती धातुएं, मोती और कई अन्य वस्तुओं का व्यापार होता था.
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2.व्यापार के साथ भारत में बढ़ा था फारसियों का आवागमन

व्यापार के साथ-साथ लोगों का आवागमन भी बढ़ा और कई फारसी व्यापारी, कारीगर और यात्री भारत के अलग-अलग हिस्सों में आकर बस गए. मुगल काल में फारसी संस्कृति का भारत पर गहरा प्रभाव पड़ा और फारसी भाषा लंबे समय तक प्रशासन और साहित्य की भाषा भी रही.
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3.किशनगंज है पूरब का छोटा ईरान

इसी ऐतिहासिक संपर्क की एक दिलचस्प झलक बिहार के किशनगंज जिले में देखने को मिलती है. यहां एक छोटा लेकिन विशिष्ट समुदाय रहता है जिसे स्थानीय लोग कभी-कभी लिटिल ईरान के नाम से भी जानते हैं. किशनगंज में रहने वाले इस समुदाय की जड़ें फारस से जुड़ी मानी जाती हैं. समय के साथ फारस से आए कुछ परिवार भारत में बस गए और धीरे-धीरे उन्होंने यहां अपनी छोटी-छोटी बस्तियां बना लीं. किशनगंज के मोतीबाग और कर्बला इलाके में इस समुदाय के कई परिवार रहते हैं और इन्हें स्थानीय स्तर पर ईरानी बस्ती के नाम से जाना जाता है. इस समुदाय के अधिकांश लोग शिया मुस्लिम हैं.
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4.क्या था भारत में बसे ईरानी समुदाय का व्यवसाय?

कहा जाता है कि इस समुदाय के कई परिवार पहले उत्तर बिहार के पूर्णिया क्षेत्र में रहते थे और बाद में धीरे-धीरे किशनगंज आकर बस गए. शुरुआती समय में इनका जीवन काफी घुमंतू था. ये लोग कारवां या छोटे काफिलों में यात्रा करते थे और अलग-अलग जगहों पर तंबू लगाकर रहते थे. उस दौर में इनका मुख्य पेशा घोड़ों का व्यापार था. वे मेलों, त्योहारों और बड़े जमींदारों को घोड़े बेचते थे. समय के साथ जीवन शैली बदली और उन्होंने छोटे-मोटे सामान जैसे चाकू, कांच के फ्रेम और घरेलू इस्तेमाल की चीजों का व्यापार शुरू कर दिया. बाद के वर्षों में कुछ परिवार रत्न और कीमती पत्थरों के व्यापार से भी जुड़ गए जिनके लिए वे कोलकाता और जयपुर जैसे शहरों से सामान मंगवाते हैं.
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5.किस भाषा में बात करता है यह समुदाय?

संख्या में कम होने के बावजूद इस समुदाय ने स्थानीय समाज के साथ घुल-मिलकर रहते हुए अपनी पारंपरिक संस्कृति के कई पहलुओं को आज तक संभालकर रखा है. वे आपस में बातचीत के लिए फारसी से प्रभावित एक विशेष बोली का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें हिंदी और उर्दू के कई शब्द भी शामिल हो गए हैं. समय के साथ यह बोली एक तरह की मिश्रित स्थानीय भाषा बन गई है, जिसे समुदाय के लोग अपनी पहचान के रूप में देखते हैं.
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6.आज भी फारसी प्रभाव दिखाते हैं शादी-विवाह से जुड़े रीति-रिवाज

समुदाय के भीतर विवाह और सामाजिक परंपराओं को भी खास महत्व दिया जाता है. शादी-विवाह से जुड़े कई रीति-रिवाज आज भी पुराने फारसी प्रभाव को दर्शाते हैं. सामाजिक और सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखने के लिए अक्सर विवाह समुदाय के भीतर ही तय किए जाते हैं. धार्मिक समारोह, सामुदायिक बैठकें और पारंपरिक उत्सव इस छोटे समुदाय को एकजुट बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
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7.कैसा है इनका खान-पान?

खान-पान की बात करें तो यहां की भोजन शैली में बिहारी और फारसी दोनों परंपराओं की झलक दिखाई देती है. मांसाहार यहां आम है और कई व्यंजन ऐसे मसालों और तरीकों से तैयार किए जाते हैं जिन पर फारसी खानपान का प्रभाव माना जाता है. सुगंधित मसालों का इस्तेमाल और मांस आधारित पकवान इस मिश्रित सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं.
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8.SIR में इस समुदाय को आईं कानूनी दिक्कतें

पिछले साल किशनगंज के ईरानी समुदाय को गंभीर कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत समुदाय के लगभग 30 लोगों को सरकारी नोटिस मिला और उनसे अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा गया. कई परिवार जिनके पूर्वज दशकों से मतदाता सूची में थे, वह इससे हैरान रह गए.
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