एजुकेशन
Jaya Pandey | Aug 14, 2026, 06:11 PM IST
1.एक टीचर के भरोसे ने बदल की प्रोफेसर हेमचंद्रन कराह की जिंदगी

हमारे जीवन में कई बार ऐसे लोग मिलते हैं जिनकी एक सही सलाह या भरोसा हमारी पूरी जिंदगी की दिशा ही बदल देता है. प्रोफेसर हेमचंद्रन कराह की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने अपने एजुकेशन और करियर की राह पर कभी समाज की धारणाओं को खुद पर हावी नहीं होने दिया. उनके इस सफर में एक टीचर के भरोसे ने अहम भूमिका निभाई.
2.ब्लाइंड स्कूल से यूं कैंब्रिज में पीएचडी करने पहुंचे हेमचंद्रन कराह

चेन्नई के लिटिल फ्लावर स्कूल फॉर द ब्लाइंड से शुरू हुआ उनका सफर आगे चलकर यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में पीएचडी और फिर आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर बनने तक पहुंचा. डॉ. हेमचंद्रन कराह आज आईआईटी मद्रास के ह्यूमेनिटीज एंड सोशल साइंस डिपार्टमेंट में असोसिएट प्रोफेसर हैं. उन्हें डिसेबिलिटी स्टडीज, एस्थेटिक्स, साहित्यिक आलोचना और ऑडियो डिस्क्रिप्शन में महारत हासिल है.
3.किसी फरिश्ते की तरह विंसेट सर ने दिखाई जिंदगी की राह

उनकी जिंदगी में उनके एक स्कूल टीचर विंसेंट सर का काफी प्रभाव रहा. दृष्टिबाधित होने की वजह से उनके सामने सामाजिक सीमाएं थीं लेकिन विंसेट सर ने उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रोत्साहित किया. इसका असर ये हुआ कि उन्होंने विदेश जाकर पढ़ाई करने का मन बनाया और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की. कई एकेडमिक जर्नल में उनके रिसर्च पेपर भी छप चुके हैं और वह रिव्यू ऑफ डिसेबिलिटी स्टडीज के ग्लोबल सेक्शन के को-एडिटर भी हैं.
4.आईआईटी मद्रास में ARC के हैं प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर

उन्हें इंडियन फाउंडेशन फॉर द आर्ट्स से फेलोशिप भी मिल चुकी है. इस फेलोशिप में उन्होंने तमिल धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में विकलांगता और एक्सेसिबिलिटी से जुड़े सवालों पर रिसर्च किया. इससे पहले वह ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के ग्लोबल कोविड-19 और मेंटल हेल्थ प्रोजेक्ट के रिसर्चर्स में भी शामिल रहे. वह आईआईटी मद्रास में एक्सेसिबिलटी रिसर्च सेंटर (ARC) के को-फाउंडर और प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर हैं. इस सेंटर का मकसद सिर्फ दिव्यांग लोगों के लिए अलग सुविधाएं बनाना नहीं बल्कि स्कूलों-यूनिवर्सिटी में शुरू से ही सीखने के माहौल को ज्यादा समावेशी बनाना है.
5.क्या है ब्लाइंड फोटोग्राफी का कॉन्सेप्ट?

उनके रिसर्च का एक दिलचस्प फील्ड ब्लाइंड फोटोग्राफी भी है. कोई दृष्टिबाधिक व्यक्ति कैसे फोटो खींच सकता है, यह इसी सोच को चुनौती देता है. फोटोग्राफी सिर्फ आंखों से देखने की प्रक्रिया नहीं है बल्कि इसमें आवाज, स्पर्श, तकनीक, बातचीत, सहयोग और व्यक्तिगत अनुभव की भी भूमिका होती है. इस तरह ब्लाइंड फोटोग्राफी यह सवाल उठाती है कि तस्वीर बनाने, देखने और उसकी व्याख्या करने का अधिकार आखिर किसके पास है. हाल के साल में ARC ने ब्लाइंड फोटोग्राफी को रचनात्मक और समावेशी माध्यम के तौर पर आगे बढ़ाने पर भी काम किया है.
6.क्या सिखाती है हेमचंद्रन कराह की कहानी?

हेमचंद्रन कराह की कहानी उस सोच को चुनौती देती है जिसमें किसी की विकलांगता तो उसकी क्षमता का पैमाना मान लिया जाता है. डॉ. हेमचंद्रन का मानना है कि असली चुनौती हमारी शारीरिक स्थिति नहीं बल्कि समाज की वह सोच होती है जो पहले ही तय कर देती है कि कोई शख्स क्या कर सकता है और क्या नहीं. उनकी सफलता की कहानी में यह साफ दिखाई देता है कि अगर एजुकेशन सिस्टम और समाज इंसान को सही मौका और सहयोग दे तो शारीरिक अक्षमता उसे कमजोर नहीं कर सकती.