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समुद्र में 'मौत का गलियारा' जहां जाकर कभी वापस नहीं आती व्हेल, जानें इस रहस्यमयी जगह पर कैसे मरना भी है फायदे का सौदा

हिंद महासागर में डायमंटिना फ्रैक्चर जोन में वैज्ञानिकों को काफी दिलचस्पी है. यह इलाका व्हेल का कब्रिस्तान भी कहा जाता है. जानें यह भारत से कितना दूर है और यहां व्हेल का मरना बाकी जीवों के लिए कैसे फायदे का सौदा है...

Jaya Pandey | Jun 13, 2026, 11:51 AM IST

1.भारत से कितनी दूर है व्हेल की कब्रगाह?

भारत से कितनी दूर है व्हेल की कब्रगाह?
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हिंद महासागर की गहराइयों में डायमंटिना फ्रैक्चर जोन वैज्ञानिकों के लिए आकर्षक का केंद्र बना हुआ है. यह जोन भारत के दक्षिणी छोर से लगभग  5,500-6,000 किलोमीटर दूर है. इस जोन से सबसे नजदीक देश ऑस्ट्रेलिया है जिसके दक्षिण-पश्चिमी तट से यह 1,400 किलोमीटर दूर है.  दक्षिण-पूर्वी हिंद महासागर में फैला समुद्र तल का यह विशाल इलाका गहरी खाइयों, लंबी दरारों और ऊंची समुद्री लकीरों से बना है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह लगभग 1,200 किलोमीटर तक फैला हुआ है और कुछ जगहों पर यह समुद्र की सतह से करीब 7 किलोमीटर नीचे तक पहुंचता है. यहां के प्रेशर, घुप्प अंधेरे और कठिन परिस्थितियों की वजह से यह जगह लंबे समय तक साइंटिस्ट की पहुंच से बेहद दूर रही. 
(Image: AI)

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2.इसे क्यों कहा जा रहा है व्हेल का सबसे बड़ा कब्रिस्तान?

इसे क्यों कहा जा रहा है व्हेल का सबसे बड़ा कब्रिस्तान?
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हाल के साल में इस इलाके में काफी रिसर्च किए गए. साइंटिस्ट ने यहां बड़ी मात्रा में व्हेल के जीवाश्मों और उनकी हड्डियों को ढूंढ निकाला है और इसे दुनिया का अब तक ज्ञात सबसे बड़ा कब्रिस्तान कहा जा रहा है. रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों को यहां व्हेल के लाखों साल पुराने जीवाश्म मिले हैं. कुछ अवशेष तो खनिज से इतने भर चुके हैं कि वे इस इलाके में मौजूद चट्टानों का हिस्सा लगते हैं. 
(Image Credit: Canva)

3.नेचर पत्रिका में छपी है यह स्टडी

नेचर पत्रिका में छपी है यह स्टडी
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नेचर पत्रिका में 'अ 5.3 मिलियन ईयर ओल्ड डीप सी व्हेल नेक्रोपोलिस इन द डायमंटिना जोन' नाम से छपी स्टडी में बताया गया है कि वैज्ञानिकों को यहां ऐसे जीवाश्म भी मिले हैं जो विलुप्त व्हेल प्रजातियों से जुड़े हैं. इनमें चोंच वाली व्हेलों के अवशेष भी हैं जो समुद्री स्तनधारियों के विकास और इतिहास को समझने का सुराग देते हैं. कुछ साइंटिस्ट ने इस इलाके में मिली नई जीवाश्म प्रजातियों के बारे में भी बताया है जिनमें डायमंटिना के नाम पर रखी गईं प्रजाति Pterocetus diamantinae भी शामिल है. इन खोजों ने वैज्ञानिकों को लाखों साल के दौरान महासागरों में हुए जैविक और पर्यावरणीय के बदलावों की स्टडी करने का एक अनोखा मौका दिया है. 

4.क्यों व्हेल का मरना दूसरे जानवरों के लिए है फायदे का सौदा?

क्यों व्हेल का मरना दूसरे जानवरों के लिए है फायदे का सौदा?
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व्हेल के अवशेषों के आसपास पाया जाने वाला जीवन भी काफी दिलचस्प है. गहरे समुद्र में भोजन की कमी होती है इसलिए जब कोई विशाल व्हेल समुद्र तल तक पहुंचती है तो उसका शरीर कई साल तक अनेक जीवों के लिए भोजन बन जाता है. यहां कीड़ों, क्रस्टेशियन, माइक्रोब्स और दूसरे गहरे समुद्री प्रजातियों को हड्डियों और अवशेषों के आसपास पनपते देखा गया है. कुछ जीव ऐसे भी मिले हैं जिनके बारे में अभी साइंटिस्ट को कुछ पता ही नहीं है. 

5.इस डेथ जोन को पूरी तरह समझने में लगे हैं साइंटिस्ट

इस डेथ जोन को पूरी तरह समझने में लगे हैं साइंटिस्ट
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कैल्वर्ट मरीन म्यूजियम के जीवाश्म वैज्ञानिक स्टीफन जे. गॉडफ्रे ने इस रिसर्च को बेहद खास बताया. उनके अनुसार, इतने बड़े पैमाने पर व्हेल जीवाश्मों और अवशेषों का एक ही जगह पर मिलना गहरे समुद्री जीवाश्म विज्ञान के लिए एक दुर्लभ और अनोखी घटना है. हालांकि, कई शोध अभियानों और दर्जनों गोताखोर मिशनों के बावजूद डायमंटिना फ्रैक्चर जोन का बड़ा हिस्सा अब भी पूरी तरह से नहीं खोजा जा सका है. 

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