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दुनियाभर के नेता फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस शहर में जी-7 समिट के लिए इकट्ठा हुए हैं. ऐसे में जानें जी-7 समिट क्या है और इसके मेंबर्स कौन-कौन से देश हैं. समझें जब भारत इसका स्थायी सदस्य नहीं है तो क्यों इस मंच पर हमारी आवाज सुनी जाती है...
दुनियाभर के नेता फ्रांस के एवियन-लेस-बैंस शहर में जी-7 समिट के लिए इकट्ठा हुए हैं. इस समिट में सबसे ज्यादा फोकस रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-ईरान के शुरुआती शांति समझौते के बाद मिडिल ईस्ट में उभरी स्थिति पर रहने की उम्मीद है. इस साल शिखर सम्मेलन में इस ग्रुप के सदस्य देश तो भाग ले ही रहे हैं, साथ ही इसमें कतर, संयुक्त अरब अमीरात और मिस्र के नेताओं के साथ वार्ता भी शामिल है. भारत, ब्राजील, केन्या और दक्षिण कोरिया सहित कई देश इस सम्मेलन के चुनिंदा सेशन में हिस्सा ले रहे हैं. साल 2026 में जी7 समिट की अध्यक्षता फ्रांस कर रहा है और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के निमंत्रण पर पीएम नरेंद्र मोदी भी इसमें शामिल हुए हैं.
G7 का पूरा नाम ग्रुप ऑफ सेवन है. इसमें दुनिया की सात बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. जी-7 देशों में कनाडा, जर्मनी, फ्रांस, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स शामिल हैं. इन देशों के अलावा यूरोपियन यूनियन भी स्थायी तौर पर इस मंच की बैठकों में भाग लेता है. जी-7 ग्रुप की शुरुआत साल 1975 में हुई थी. उस वक्त आर्थिक मंदी और तेल संकट से निपटने के लिए 6 देशों फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान और इटली ने पहला शिखर सम्मेलन किया था. एक साल के बाद 1976 में कनाडा भी इस ग्रुप का हिस्सा बना और इसे जी-7 कहा जाने लगा. समय के साथ इस सम्मेलन का दायरा आर्थिक मुद्दों से बढ़कर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स और सिक्योरिटी तक पहुंच गया.
हर साल इस समिट में दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और लोकतांत्रिक देशों के नेताओं का जमावड़ा लगता है. ऐसे में इस शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर रहती है. यह मंच सिर्फ आर्थिक मुद्दों की चर्चा तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां वैश्विक सुरक्षा, भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संकट, तकनीकी विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे विषयों पर भी स्ट्रैटजी बनती है और कई बड़े फैसले लिए जाते हैं. इस वजह से जी-7 देशों के नेताओं की बैठकों और उनसे निकलने वाले संदेशों का असर दुनिया के हर सेक्टर पर पड़ता है.
G7 शिखर सम्मेलन का मकसद दुनिया के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों पर मिलकर रणनीति तैयार करना है. इसके सदस्य देश वैश्विक आर्थिक विकास, महंगाई, व्यापार, निवेश, आपूर्ति श्रृंखलाओं, ऊर्जा सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता जैसे विषयों पर चर्चा करते हैं. इसके साथ ही युद्ध, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा, परमाणु खतरे और किसी देश के अंदर के संघर्षों जैसे सुरक्षा संबंधी मुद्दों पर भी विचार-विमर्श किया जाता है. हाल के साल में रूस-यूक्रेन वॉर, पश्चिम एशिया की स्थिति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा जैसे विषय G7 बैठकों के प्रमुख एजेंडे में शामिल रहे हैं.
जी-7 को दुनियाभर में इसलिए प्रभावशाली माना जाता है क्योंकि इसके सदस्य देश ग्लोबल इकोनॉमी में बड़ी हिस्सेदारी रखते हैं. दुनिया के कुल जीडीपी, निवेश और इंटरनेशनल ट्रेड का बड़ा हिस्सा इन्हीं देशों से जुड़ा हुआ है. जब ये देश मिलकर किसी आर्थिक नीति, प्रतिबंध, व्यापारिक नियम या निवेश ढांचे पर सहमति बनाते हैं तो उसका असल पूरी दुनिया की इकोनॉमी और मार्केट पर पड़ता है.
इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में भी यह मंच अहम भूमिका निभाता है. कई बार दुनिया के बड़े संकटों पर नेताओं के बीच सीधी बातचीत इसी मंच पर होती है. रूस-यूक्रेन वॉर, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री सुरक्षा जैसे मुद्दों पर जी-7 देशों का रिएक्शन ग्लोबल डिप्लोमेसी की दिशा तय करता है.
भारत G7 का स्थायी सदस्य नहीं है, लेकिन यह दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है. इस वजह से भारत को इस मंच में शामिल होने के लिए अक्सर आमंत्रित किया जाता है. भारत की बढ़ती आर्थिक और रणनीतिक भूमिका की वजह से जी-7 के देशों ने हमारे साथ सहयोग बढ़ाने पर ध्यान दिया है. इस मंच पर भारत के पीएम की भागीदारी से हमें एक ग्लोबल मंच पर विकासशील देशों की चिंताओं, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, आतंकवाद, आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाने का मौका मिलता है.
भारत की तरह चीन भी जी-7 ग्रुप का सदस्य नहीं है. फिर भी इस सम्मेलन में इसे 'अक्सर एलिफेंट इन द रूम' माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि चीन की आर्थिक और सैन्य गतिविधियां सीधे तौर पर इस ग्रुप की इकोनॉमी और सिक्योरिटी पर असर डालता है. चीन का भले ही इस सम्मेलन से जुड़ाव हो लेकिन वह कभी भी इसका सदस्य नहीं बन सकता क्योंकि मेंबर बनने के लिए लोकतांत्रिक देश होना सबसे बड़ी शर्त है. चीन कम्युनिस्ट पार्टी के तहत एक सत्तावादी देश है इसलिए वह इस ग्रुप की सदस्यता के नियम को पूरा नहीं करता. चीन की इकोनॉमी इस ग्रुप के लिए खतरे की घंटी है. चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका को छोड़कर इस ग्रुप के बाकी सभी सदस्यों से कहीं बड़ी है. ऐसे में चीन की भारी-भरकम आर्थिक ताकत G7 की एकजुटता को तोड़ सकती है.