एजुकेशन
मानव के शरीर में कई अंग होते हैं जो उनके दैनिक काम में मदद करते हैं. हर अंग एक निश्चित उम्र के बाद विकसित होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे शरीर का एक अंग ऐसा भी है जो हमारे मरने तक बढ़ता रहता है?
मानव शरीर एक चमत्कार है जो हमें हर दिन हैरान करता है. हमारे शरीर के अंग बचपन से लेकर वयस्कता तक विकसित होते रहते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ अंग ऐसे भी हैं जो मृत्यु तक बढ़ते रहते हैं? ये अंग न केवल उम्र के साथ बढ़ते हैं, बल्कि गुरुत्वाकर्षण के कारण बुढ़ापे में ढीले और लंबे भी दिखाई देते हैं.
यह सुनकर आपको हैरानी हो सकती है क्योंकि आमतौर पर हम यही सोचते हैं कि किशोरावस्था में शरीर का विकास पूरा हो जाता है. अंगों में मौजूद कार्टिलेज ऊतक उम्र के साथ बढ़ता रहता है. कार्टिलेज एक लचीला ऊतक होता है जो हड्डियों से भी ज़्यादा लंबा होने की क्षमता रखता है. इसके अलावा जैसे-जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, त्वचा का लचीलापन कम होता जाता है और हड्डियां कमजोर होने लगती हैं. इससे कुछ अंगों पर गुरुत्वाकर्षण का प्रभाव ज़्यादा पड़ता है और ये लटकने लगते हैं, लंबे दिखने लगते हैं.
कौन सा है यह अंग?
अब, ये अंग क्या हैं? कान और नाक. कई अध्ययनों से पता चला है कि चेहरे की बनावट उम्र के साथ बदलती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) के एक अध्ययन के अनुसार नाक की कार्टिलेज उम्र के साथ नरम और कमज़ोर हो जाती है जिससे उसका आकार बदल जाता है. यही कारण है कि बुज़ुर्गों की नाक अक्सर चौड़ी और लंबी दिखती है. इसी तरह उम्र के साथ कान भी लटकने लगते हैं. यह उन लोगों में ज़्यादा आम है जो भारी झुमके पहनते हैं.
कान और नाक की कार्टिलेज उम्र के साथ बढ़ती रहती है लेकिन यह वृद्धि बहुत धीमी होती है. औसतन कान और नाक की लंबाई हर दशक में 0.22 मिमी बढ़ सकती है. बुढ़ापे में त्वचा की लोच कम होने और गुरुत्वाकर्षण के कारण ये अंग लंबे और ढीले दिखते हैं. इसका मतलब है कि अगर आपकी उम्र 70 साल है तो आपके कान और नाक बचपन की तुलना में लगभग 1.5 से 2 सेंटीमीटर लंबे हो सकते हैं.
इंस्टाग्राम पर शेयर हुआ वीडियो
इस घटना का एक वीडियो इंस्टाग्राम अकाउंट @3djankari पर पोस्ट किया गया है. इसने सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींचा है और कई लोग इसे मज़ाकिया अंदाज़ में शेयर कर रहे हैं. एक यूज़र ने लिखा, 'अब मुझे समझ आया कि मेरे दादाजी के कान इतने बड़े क्यों हैं.' वहीं, कुछ लोगों ने उनका मज़ाक उड़ाते हुए कहा, 'कान और नाक की रेस कौन जीतेगा?' लेकिन इस मज़ाक के पीछे एक गंभीर वैज्ञानिक सच्चाई छिपी है. यह प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक है और हर इंसान में अलग-अलग स्तर पर होती है.