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बचपन से आंखों में नहीं थी रोशनी पर हौसलों ने रच दिया इतिहास, दृष्टिहीन शिक्षक ने यूं पास की ओडिशा सिविल सेवा परीक्षा

आज हम आपको ओडिशा के उस दृष्टिहीन शिक्षक से मिलवाने जा रहे हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में कभी हार नहीं मानी और आज ओडिशा पब्लिक सर्विस कमीशन की सिविल सेवा परीक्षा पास कर अपने परिवार और गांव का नाम रोशन किया है...

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बचपन से आंखों में नहीं थी रोशनी पर हौसलों ने रच दिया इतिहास, दृष्टिहीन शिक्षक ने यूं पास की ओडिशा सिविल सेवा परीक्षा

Mahesh Panda

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ओडिशा के जाजपुर जिले के दृष्टिहीन शिक्षक महेश पांडा ने ओडिशा सिविल सेवा परीक्षा 2023 में सफलता हासिल की है. इस परीक्षा के नतीजे शुक्रवार को जारी किए गए. उन्हें इस परीक्षा में 300वीं रैंक हासिल हुई है और यह उनका तीसरा प्रयास था. महेश साल 2016 से कटक जिले के अथागढ़ के कुलेइलो स्थित आदर्श विद्यालय में उड़िया शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं.

जाजपुर जिले के कोरेई प्रखंड के बड़ा बिरुहान गांव के निवासी महेश पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं. उन्हें बचपन से ही दिखाई नहीं देता था. उनके पिता लक्ष्मी नारायण खेती करके अपने सात परिवार के सदस्यों का पालन-पोषण करते थे, लेकिन बेटे के अंधेपन ने उन्हें चिंतित कर दिया था. बेहतरीन इलाज और राज्य के कई नेत्र अस्पतालों में इलाज के बावजूद डॉक्टर महेश की दृष्टि वापस नहीं ला पाए.

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पिता की बीमारी के बाद देवदूत बन इन लोगों ने संवारी महेश की जिंदगी

हालांकि महेश ने हार नहीं मानी. उन्होंने 2009 में कटक के नुआपाड़ा स्थित दृष्टिहीन विद्यालय से ब्रेल लिपि प्रणाली से हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की. उन्होंने रावेनशॉ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुशेन और कोरापुट के केंद्रीय यूनिवर्सिटी से बी.एड की डिग्री हासिल की. ​​इसके बाद उन्होंने उत्कल यूनिवर्सिटी से उड़िया भाषा में पोस्ट ग्रेजुएशन किया.

महेश ने बताया कि दसवीं तक पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं आई क्योंकि शिक्षा और आवास मुफ़्त था. उन्होंने कहा कि हाई स्कूल पास करने के बाद आगे की पढ़ाई चुनौती बन गई क्योंकि उनके पिता बीमार पड़ गए जो परिवार के इकलौते समाने वाले सदस्य थे. फिर गांव के ही दो नेकदिल लोग उनकी मदद के लिए आगे आए. कटक स्थित युग निर्माण विद्या परिषद और गायत्री मिशन ने भी उनकी शिक्षा का खर्च उठाया.

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महेश उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, 'उन लोगों की मदद के बिना यहां तक पहुंचना मुश्किल हो जाता.' महेश को पढ़ाने और ओसीएस परीक्षा की तैयारी के बीच संतुलन बनाना पड़ा. 32 वर्षीय महेश ने बताया, 'दिन स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए और रातें खुद तैयारी के लिए होती थीं.' उन्होंने आगे कहा कि इस तरीके ने उनकी कहानी आसान बना दी. उन्होंने भगवान जगन्नाथ, अपने परिवार और दोस्तों का भी धन्यवाद किया जिन्होंने उन्हें यह सफलता दिलाने में मदद की.

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