एजुकेशन
आज हम मध्य प्रदेश के रहने वाले जनक अग्रवाल के बारे में बात करेंगे जिन्होंने JEE एडवांस्ड 2015 में दूसरी रैंक हासिल की थी. उन्होंने आईआईटी बॉम्बे के बाद एमआईटी से पढ़ाई की है, जानें आजकल क्या कर रहे हैं...
IIT JEE को दुनिया की सबसे कठिन परीक्षाओं में से एक माना जाता है. इस परीक्षा को पास करके अच्छे इंस्टीट्यूट में दाखिला पाने के लिए कई स्टूडेंट्स 10वीं के बाद से ही इसकी तैयारी शुरू कर देते हैं. IIT JEE परीक्षा में अच्छे मार्क्स लाने वाले उम्मीदवार देश के प्रतिष्ठित इंस्टीट्यूट आईआईटी में दाखिला पाने में सफल रहते हैं और फिर मल्टी नेशनल कंपनियां उन्हें मोटी सैलरी पैकेज पर हायर कर लेती हैं. IIT से ग्रेजुएट होने के लिए कई त्याग, समर्पण, कड़ी मेहनत और अनुशासन की जरूरत होती है. आज हम मध्य प्रदेश के रहने वाले जनक अग्रवाल के बारे में बात करेंगे जिन्होंने JEE एडवांस्ड 2015 में दूसरी रैंक हासिल की थी.
जनक अग्रवाल मध्य प्रदेश के इंदौर के रहने वाले हैं. उन्होंने अपनी बारहवीं की शिक्षा इंदौर के ILVA हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की, जहां उन्हें बोर्ड परीक्षाओं में 91% अंक मिले और JEE एडवांस्ड 2015 में भी उन्होंने दूसरी रैंक हासिल की. जनक ने BITSAT और KVPY जैसे दूसरे कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स में भी बढ़िया प्रदर्शन किया.
जनक ने दो साल तक इंदौर की एक कोचिंग इंस्टीट्यूट जॉइन करके रोजाना छह से आठ घंटे अकेले पढ़ाई करके जेईई की तैयारी की. बाद में उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की. उनके लिंक्डइन पेज के अनुसार उन्होंने बाद में मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) से बैचलर ऑफ साइंस (बीएस) और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और कंप्यूटर साइंस में मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग (एमईएनजी) की डिग्री हासिल की.
आज जनक कैलिफ़ोर्निया के सैन फ्रांसिस्को में आउटस्पीड के को-फाउंडर हैं. इससे पहले उन्होंने पियरक्स एस24 और क्लाइमेट चेंज एआई जैसी कई संस्थाओं के साथ काम किया है. 22 साल की उम्र में जनक के साहसिक फैसले से कई लोग हैरान थे. उन्होंने आंद्रेज कारपथी और टेस्ला ऑटोपायलट का जॉब ऑफर ठुकराने का कठिन फैसला किया था.
उन्होंने लिंक्डइन पर एक पोस्ट शेयर की जिसमें लिखा था, '22 साल की उम्र में मैंने वो किया जो मैं सोच भी नहीं सकता था. मैंने आंद्रेज कारपथी और टेस्ला की ऑटोपायलट टीम का प्रस्ताव ठुकरा दिया. यह साहसिक कदम था या सिर्फ़ पागलपन? आप ही तय करें. जून 2020 की बात है. कोविड अपने चरम पर था हर कंपनी पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से लोगों की छंटनी कर रही थी. स्टार्टअप ब्रेक रूम में मुफ़्त डोनट्स की तरह गायब हो रहे थे. उस समय मुझे दो ऑफर मिले एक टेस्ला से और दूसरा एक कम चर्चित स्टार्टअप ऑटोग्रिड से. कोई भी समझदार व्यक्ति यह एक आसान फैसला ले सकता था. लेकिन मैं खुद को टेस्ला की तेजतर्रार मशीन का एक और पुर्ज़ा नहीं मान सकता था इसलिए स्वाभाविक रूप से मैंने ऑटोग्रिड में अपनी किस्मत आज़माई.'
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