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क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे पहले किसी विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की स्थापना कहां हुई थी. जानें कौन था भारत के पहले हिंदी विभाग का पहला प्रोफेसर...
हर साल 14 सितंबर को देश में हिंदी दिवस मनाया जाता है. यह दिन हिंदी के इतिहास में बेहद खास है, क्योंकि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने देवनागरी लिपि में हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था. इसके बाद इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत साल 1953 से हुई थी. संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार देवनागरी लिपि में हिंदी संघ की राजभाषा है.
क्या आप जानते हैं कि भारत में सबसे पहले किसी विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की स्थापना कहां हुई थी. कई लोग यह दावा करते हैं कि बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में सबसे पहले हिंदी विभाग शुरू किया किया था लेकिन कलकत्ता विश्वविद्यालय के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार हिंदी विभाग की स्थापना सबसे पहले वहां साल 1918 में हुई थी. यूनिवर्सिटी ने इसे अपनी वेबसाइट पर भारत में उच्च शिक्षा के इतिहास में हिंदी विभाग की पहली स्थापना के रूप में दर्ज किया है. वहीं बीएचयू में साल 1920 और 1924 में हिंदी भाषा और साहित्य के लिए कक्षाएं शुरू की गई थीं.
कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के इतिहास के मुताबिक, साल 1918 में तत्कालीन कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी की पहल पर हिंदी विभाग की शुरुआत हुई. इस दौरान हिंदी में एमए का पाठ्यक्रम भी शुरू किया गया. विश्वविद्यालय का कहना है कि उच्च शिक्षा के इतिहास में पहली बार हिंदी को एमए स्तर पर शामिल करने का गौरव भी कलकत्ता विश्वविद्यालय को मिला हुआ है.
कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पहले प्रोफेसर आचार्य सकल नारायण शर्मा थे. उन्होंने साल 1918 में विभाग की जिम्मेदारी संभाली. वह हिंदी के विद्वान होने के साथ-साथ 'शिक्षा' नाम की पत्रिका के संपादक भी रहे और करीब 21 वर्षों तक इसके संपादन से जुड़े रहे. हिंदी विभाग के शुरुआती दौर में पाठ्यक्रम तैयार करने में लाला सीताराम की भी बेहद खास भूमिका रही. उन्होंने कुलपति सर आशुतोष मुखर्जी के अनुरोध पर हिंदी विभाग का सिलेबस तैयार किया था.
आचार्य ललिता प्रसाद शुक्ल साल 1933 में विभाग से जुड़े और उन्होंने तीन दशकों से ज्यादा समय तक हिंदी भाषा और साहित्य को छात्रों को पढ़ाया. इसके बाद आचार्य कल्याणमल लोढ़ा, आचार्य विष्णुकांत शास्त्री, डॉ. प्रबोधनारायण सिंह, डॉ. दयानंद श्रीवास्तव और डॉ. रामप्रीत उपाध्याय जैसे विद्वानों ने विभाग के शैक्षणिक और साहित्यिक विकास में योगदान दिया. आगे चलकर डॉ. शंभूनाथ, डॉ. चंद्रकला पांडे, डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी और डॉ. अमरनाथ जैसे शिक्षकों ने भी विभाग को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई.
आज कलकत्ता विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग हिंदी के उच्च अध्ययन और शोध की अपनी पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है. विभाग में एमए और पीएचडी जैसे उच्च शिक्षा कार्यक्रमों के साथ शोध और अकादमिक गतिविधियां जारी हैं. विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर एमए, एमफिल और पीएचडी कार्यक्रमों का भी उल्लेख किया गया है. विभाग के शिक्षक और शोधार्थी हिंदी साहित्य के पारंपरिक विषयों के साथ नए सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई मुद्दों पर भी काम कर रहे हैं.