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सैलरी से बड़ा था देशसेवा का जुनून, जानें बीटेक की पढ़ाई के बाद आर्मी में लेफ्टिनेंट बनने वाली शिवानी झा की कहानी

आज हम आपको उस लड़की से मिलवाने जा रहे हैं जिन्होंने इंजीनियरिंग करके इंफोसिस और चेकमार्क्स जैसी बड़ी कंपनियों ने मोटी सैलरी वाले पैकेज पर काम किया, लेकिन कारपोरेट का आकर्षण उन्हें अपने सपने साकार करने से रोक नहीं पाया...

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सैलरी से बड़ा था देशसेवा का जुनून, जानें बीटेक की पढ़ाई के बाद आर्मी में लेफ्टिनेंट बनने वाली शिवानी झा की कहानी

Shivani Jha

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बिहार के समस्तीपुर ज़िले के मुजौना गांव की रहने वाली शिवानी झा ने यूपीएससी की सीडीएस परीक्षा पास की है और भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर चयनित हुई हैं. अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वह इंडियन आर्मी में लेफ्टिनेंट के पद पर कार्यरत होंगी.

शिवानी ने अपनी स्कूलिंग मध्य प्रदेश के सतना से की है. बारहवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह ग्वालियर चली गईं और वहां उन्होंने इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री हासिल की. ​​इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद उन्होंने इंफोसिस और चेकमार्क्स जैसी एमएनसी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया. कॉरपोरेट जगत के आकर्षण के बावजूद उनका जीवन भर का सपना भारतीय सेना में शामिल होना था और इसी जुनून ने उन्हें लेफ्टिनेंट के पद तक पहुंचाया.

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बचपन से था वर्दी पहनने का जुनून

शिवानी झा बचपन से ही वर्दी पहनने का सपना देखती थीं. इस सपने को साकार करने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की, खुद को लगातार निखारा और सीडीएस परीक्षा की कड़ी तैयारी की. इतनी चुनौतीपूर्ण परीक्षा में सफलता के लिए मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक दृढ़ता की आवश्यकता होती है और शिवानी झा ने इन तीनों ही पहलुओं में शानदार प्रदर्शन किया. उनके परिवार, शिक्षकों और दोस्तों ने उनकी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिसमें उनकी मां प्रतिभा झा का सबसे बड़ा योगदान रहा.

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शिवानी संजीव कुमार झा की बेटी और स्वर्गीय रामकृपाल झा की पोती हैं. वह अपनी उपलब्धि का श्रेय अपनी मां को देती हैं और कहती हैं कि उनकी मां ने न केवल हर मुश्किल में उनका साथ दिया बल्कि चुनौतियों से भी उनका साथ दिया और उनकी असली ताकत बनीं. शिवानी कहती हैं, 'मेरी मां ने मुझे कभी हार मानना ​​नहीं सिखाया.' उनकी मां के संघर्ष, अपनी बेटी पर विश्वास और अटूट समर्थन ने शिवानी झा के सपनों को साकार करने की नींव रखी.

शिवानी की सफलता सिर्फ़ एक व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है बल्कि यह समस्तीपुर और बिहार की हर उस बेटी के लिए प्रेरणा है जो अपने सपनों को साकार करना चाहती है. वह युवाओं खासकर उन लड़कियों के लिए एक आदर्श बन गई हैं जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखती हैं.

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