एजुकेशन
दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपने आंदोलन और अनशन को लेकर सोनम वांगचुक काफी चर्चा में हैं. ऐसे में जानिए उनका एजुकेशनल बैकग्राउंड कैसा रहा है और उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा कहां से हासिल की है...
सोनम वांगचुक इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपने आंदोलन और अनशन को लेकर चर्चा में हैं. शिक्षा सुधार, पर्यावरण संरक्षण और लद्दाख से जुड़े मुद्दों पर उनकी आवाज लगातार सुनी जाती रही है. साल 2009 में आई फिल्म 3 इडियट्स में आमिर खान का किरदार रैंचो भी उनकी जिंदगी से प्रेरित था. सोनम एक मैकेनिकल इंजीनियर, शिक्षा सुधारक, इनोवेटर और पर्यावरणविद् हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि उनका एजुकेशनल बैकग्राउंड कैसा रहा है और उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा कहां से हासिल की है.
सोनम वांगचुक का बचपन लद्दाख में बीता. उन्होंने कई इंटरव्यू में बताया है कि 9 साल की उम्र तक वह किसी स्कूल में नहीं गए. उनकी मां ने घर पर ही उनकी मातृभाषा में उनकी पढ़ाई कराई. बाद में उन्होंने दिल्ली के केंद्रीय विद्यालय में दाखिला लिया और आगे की स्कूली पढ़ाई की. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्होंने श्रीनगर के रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया जिसे अब एनआईटी श्रीनगर के नाम से जाना जाता है. उन्होंने यहां से साल 1987 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की.
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इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद सोनम वांगचुक ने कॉरपोरेट सेक्टर में मोटी सैलरी वाली नौकरी चुनने की जगह एजुकेशन सेक्टर में काम करने का फैसला किया. साल 1988 में उन्होंने स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की आधारशिला रखी जिसका मकसद लद्दाख के स्टूडेंट्स को क्वॉलिटी एजुकेशन उपलब्ध कराना था. SECMOL ने 10वीं फेल स्टूडेंट्स को दाखिला, स्टूडेंट्स का खुद कैंपस चलाना जैसे एजुकेशन सेक्टर में कई प्रयोग किए जिसकी सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब तारीफ हुई.
सोनम वांगचुक ने फ्रांस के मशहूर CRAterre स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर से अर्थर्न आर्किटेक्चर की पढ़ाई की. इसमें उन्हें मिट्टी से बनने वाली टिकाऊ और इकोफ्रेंडली आर्किटेक्चर के बारे में सिखाया गया जिसका इस्तेमाल उन्होंने लद्दाख की कठिन जलवायु के हिसाब से कम लागत वाली इमारतों को बनाने में किया. उन्हें अपने 'आइस स्तूप' प्रोजेक्ट की वजह से दुनियाभर में पहचान भी मिली. लद्दाख में पानी की कमी से निपटने में उनके प्रोजेक्ट ने काफी मदद की. इस प्रोजेक्ट में सर्दियों के समय पानी को कोन के आकार में जमाकर आइस स्तूप बनाया जाता है जिससे गर्मियों में यह पिघलकर पेयजल और खेती के लिए पानी उपलब्ध कराता है. एजुकेशन, इनोवेशन और सस्टेनेबल डेवलपमेंट के फील्ड में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें साल 2018 में एशिया के नोबेल पुरस्कार यानी रेमन मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित किया गया.