एजुकेशन
रोशन आनंद के संघर्ष की कहानी कम दिलचस्प नहीं है. उनका जीवन संघर्ष, असफलताओं और आर्थिक तंगी से भरा हुआ है. उनकी हालात से लड़ने की क्षमता ने उन्हें बिहार के मशहूर शिक्षकों की लिस्ट में शामिल कर दिया. जानें उनकी सक्सेस स्टोरी...
पटना की कोचिंग के व्यस्त बाजार में इन दिनों दो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं. एक तो घर-घर में मशहूर खान सर हैं. दूसरे ज्ञान बिंदु कोचिंग के फाउंडर रोशन आनंद हैं. अपने प्रतिद्वंद्वी कोचिंग इंस्टीट्यूट पर हमले के आरोपों के बाद हुई पुलिस कार्रवाई ने रोशन आनंद को मुश्किलों में डाल दिया है. हालांकि, उनके संघर्ष की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. उनका जीवन संघर्ष, असफलताओं और आर्थिक तंगी से भरा हुआ है. उनकी हालात से लड़ने की क्षमता ने उन्हें बिहार के मशहूर शिक्षकों की लिस्ट में शामिल कर दिया.
रोशन आनंद बिहार के सहरसा जिले के एक गांव से आते हैं. उनका बचपन सीमित संसाधनों और आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता. परिवार की आय का साधन खेती और मेहनत-मजदूरी था. गांव के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई करते हुए उन्होंने बचपन से ही यह समझ लिया था कि शिक्षा ही वह रास्ता है जो उनके जीवन की दिशा बदल सकती है. संसाधनों की कमी के बावजूद पढ़ाई के प्रति उनका लगाव लगातार बना रहा और वे अपने फ्यूचर को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करते रहे.
किशोरावस्था में ही उन्होंने गांव से बाहर निकलकर बड़े सपने देखने शुरू कर दिए. आगे की पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए वे पटना पहुंचे. बाद में उन्होंने इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम की तैयारी की और बेहतर अवसरों की तलाश में 15 साल की उम्र में कोचिंग हब कोटा का रुख किया. उन्होंने इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम AIEEE में सफलता पाई और BIT मेसरा इंजीनियरिंग कॉलेज में उन्हें दाखिला भी मिल गया लेकिन आर्थिक दिक्कतों की वजह से उनके लिए अपनी पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं रहा. कॉलेज की फीस, रहने और दूसरे खर्चों का बोझ परिवार के लिए चुनौती बन गया. ऐसे में उनके सपने बीच रास्ते में ही टूट गए.
निराशा के इस दौर में उन्होंने हार मानने की बजाय नया रास्ता तलाशने का फैसला किया. इंजीनियरिंग की पढ़ाई बीच में छूट गई लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरियों के लिए तैयारी करनी शुरू कर दी. बिहार पुलिस, बीपीएससी और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उन्होंने कई साल तक मेहनत की. इस दौरान उन्हें कई बार सफलता के करीब पहुंचकर भी उन्हें नाकामी का सामना करना पड़ा. कुछ में तो वह सारे चरण पार करने के बाद फाइनल सिलेक्शन से चूक गए. लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने अपनी कोशिशें जारी रखीं.
संघर्ष के इस दौर में उन्होंने दूसरे स्टूडेंट्स को पढ़ाना शुरू किया. शुरुआत काफी छोटे स्तर से हुई. उन्होंने कभी दोस्तों तो कभी पड़ोस के बच्चों को बढ़ाया. लेकिन कई बार उन्हें समय से ट्यूशन की फीस भी नहीं मिली. लेकिन धीरे-धीरे उन्हें एहसास हुआ कि पढ़ाना उनकी सबसे बड़ी ताकत है. कठिन विषयों को आसान भाषा में समझाने की उनकी क्षमता स्टूडेंट्स को पसंद आने लगी और यही उनकी नई पहचान बनने लगी.
उन्होंने अपनी टीचिंग को व्यवस्थित रूप देने के लिए 1 सितंबर 2017 को ज्ञान बिंदु जीएस एकेडमी की शुरुआत की. पहले तो स्टूडेंट्स की संख्या बेहद कम रही लेकिन वह हर स्टूडेंट पर व्यक्तिगत तौर से ध्यान देते थे. धीरे-धीरे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ने लगी. बिहार पुलिस, रेलवे, एसएससी, बैंकिंग और दूसरी सरकारी नौकरियों की तैयारी करने वाले हजारों स्टूडेंट्स उनके कोचिंग इंस्टीट्यूट में आने शुरू हुए. समय के साथ उनका इंस्टीट्यूट पटना के मशहूर कोचिंग सेंटर में से एक बन गया. आज उनकी प्रेरक कहानी लाखों युवाओं को भविष्य में कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देती है.
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