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खराब इंग्लिश बोलने वाले कैंडिडेट को हायर करना मुंबई फाउंडर के लिए कैसे बन गया फायदे का सौदा? बोले- 'वो मेरा बेस्ट डिसीजन था'

मुंबई के उद्यमी कनन बहल ने एक खराब इंग्लिश बोलने वाले शख्स को जॉब दी और अब वह इसे अपनी जिंदगी के सबसे बेहतरीन फैसलों में से एक मानते हैं, जानें क्या है पूरी कहानी...

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खराब इंग्लिश बोलने वाले कैंडिडेट को हायर करना मुंबई फाउंडर के लिए कैसे बन गया फायदे का सौदा? बोले- 'वो मेरा बेस्ट डिसीजन था'

मुंबई के उद्यमी ने दिया खराब इंग्लिश वाले को जॉब. (Image: AI)

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आज के कॉरपोरेट कल्चर में अक्सर अंग्रेजी बोलने की क्षमता को ही किसी उम्मीदवार की योग्यता और बुद्धिमानी का पैमाना मान लिया जाता है. इस सोच को मुंबई के एक उद्यमी ने तोड़ने की ठानी. उन्होंने जब एक टीयर-2 सिटी में एक कैंडिडेट का इंटरव्यू लिया तो पाया कि वह इंग्लिश में बातचीत करने में बेहद असहज था. लेकिन जब उसके टेक्निकल नॉलेज की बात आई तो उसने अपने सैंपल टास्क में शानदार काम करके दिल जीत लिया. 

शुरुआत में बंदे को हायर करने को लेकर मन में आया डाउट

इस बात को कनन बहल नाम के मुंबई फाउंडर ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर शेयर किया है. उन्होंने बताया कि उनके सामने सबसे बड़ी दुविधा यह थी कि जिस पोस्ट के लिए यह हायरिंग हो रही थी, उसमें सीधे क्लाइंट्स से बातचीत करनी थी. जहां ऐसे जॉब रोल के लिए कंपनियां फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने वालों को ही तवज्जो देती हैं. वहीं, कनन ने इंग्लिश बोलने में कमजोर कैंडिडेट को हायर करने का मन बनाया. 

कनन ने माना कि वे पहले सिर्फ अच्छी अंग्रेजी बोलने वाले उम्मीदवारों को चुनकर थक चुके थे. इस चक्कर में कई बार असली हुनरमंद और टेक्निकली मजबूत लोग पीछे छूट जाती थे. इस बार उन्होंने टैलेंट को भाषा की भेंट चढ़ाने के बजाय उस उम्मीदवार पर भरोसा जताने का फैसला किया. हालांकि, उनके मन में कहीं न कहीं एक संशय भी जरूर था कि वह शख्स आखिर अपना काम कैसे कर पाएगा.

Kanan Bahl Hiring Story

बॉस के हौसले से आज बढ़िया काम कर रहा शख्स

कैंडिडेट को हायर करने के बाद उन्होंने उसका हौसला भी बढ़ाया. उन्होंने उसे बिना किसी झिझक के पूरे आत्मविश्वास के साथ क्लाइंट्स से हिंदी में ही बात करने के लिए प्रोत्साहित किया. अपने इस फैसले का तर्क देते हुए उन्होंने उदाहरण दिया कि कुमार विश्वास जैसे लोकप्रिय वक्ता अपनी मातृभाषा हिंदी के दम पर ही बड़ी ऑडियंस को लुभाते हैं. जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लोग भी अपनी नेटिव लैंग्वेज में ही पूरा बिजनेस संभालते हैं और उन्हें अंग्रेजी न आने से कोई फर्क नहीं पड़ता.

कनन बहल का यह फैसला उनकी कंपनी के लिए मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ और वह उम्मीदवार आज उनके सबसे सफल और भरोसेमंद कर्मचारियों में से एक है. वह उसे अपना बेस्ट हायर मानते हैं. उस कर्मचारी ने उनके सोचने का नजरिया ही बदल दिया है. अब उनका मानना है कि अच्छी अंग्रेजी बोलना एक जरूरी कौशल जरूर हो सकता है, लेकिन यह किसी व्यक्ति की बुद्धिमानी और काबिलियत का पैमाना कतई नहीं होता.

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