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प्लेन क्रैश के वक्त पायलट Mayday Mayday क्यों चिल्लाते हैं, जानें क्या है इसकी वजह है इसकी शुरुआत कबसे हुई...
एयर इंडिया का बोइंग 7878 (फ्लाइट AI 171) विमान अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ान भरने के पांच मिनट बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इस विमान में 242 लोग सवार थे. पायलट ने प्लेन क्रैश होने से ठीक पहले एटीसी को Mayday का सिग्नल भेजा था लेकिन कोई मदद मिल पाती उससे पहले ही विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया.
'मेडे' शब्द 1920 के दशक की शुरुआत में लंदन के क्रॉयडन एयरपोर्ट पर रेडियो अधिकारी फ्रेडरिक स्टेनली मॉकफोर्ड ने शुरू किया था. उन्होंने इसे फ्रांसीसी वाक्य m'aider (मेरी मदद करो) के रूप में चुना जिससे इसे क्रॉस-चैनल ट्रैफिक में आसानी से समझा जा सके. इसके बाद यह 1923 तक पायलटों और नाविकों के लिए इंटरनेशनल रेडियो कम्युनिकेशन का हिस्सा बन गया. इसे औपचारिक रूप से साल 1927 में Morse “SOS” के साथ अपनाया गया.
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जब कोई पायलट मेडे, मेडे, मेडे कहता है तो वह जीवन के लिए खतरा पैदा करने वाली आपात स्थिति की घोषणा कर रहा होता है जिसके लिए तत्काल मदद की जरूरत होती है. इसके बाद सभी गैर जरूरी रेडियो ट्रैफ़िक को बंद कर दिया जाता है और एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल (ATC) उस कॉल को प्राथमिकता देता है.
इसके बाद पायलट सभी जरूरी डिटेल्स जैसे कॉल साइन, लोकेशन, इमर्जेंसी की स्थिति, विमान में सवार लोगों की संख्या और दूसरे जरूरी रिक्वेस्ट उपलब्ध कराता है जिससे बचाव कार्य तेजी से काम कर सके.
एयर इंडिया AI171 के मामले में मेडे कॉल ने पुष्टि की कि चालक दल को उड़ान भरने के तुरंत बाद अचानक गंभीर घटना का सामना करना पड़ा जबकि एटीसी ने इसके बाद भी संपर्क बनाए रखा था. एक बार मेडे कॉल होने के बाद यह संकेत तुरन्त आपातकालीन प्रोटोकॉल को एक्टिव कर देता है और फायर ब्रिगेड, मेडिकल और सुरक्षा सेवाओं को घटनास्थल पर भेज देता है.
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