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सड़क पर चलते वक्त फोन का इस्तेमाल हो सकता है बेहद आत्मघाती

मोबाइल फोन के इस्तेमाल के कारण भारतीय सड़कों पर हर दिन औसतन 29 दुर्घटनाएं हुई जिनमें हर रोज करीब 13 लोगों ने अपनी जान गवाई.

सड़क पर चलते वक्त फोन का इस्तेमाल हो सकता है बेहद आत्मघाती
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डीएनए हिंदी: हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में भारत वासियों ने कुल 69 हजार करोड़ से ज्यादा घंटे मोबाइल फोन चलते हुए बिताए थे. वहीं सड़क परिवहन मंत्रालय द्वारा जारी एक अन्य रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2018 की तुलना में 2019 में मोबाइल फोन के कारण होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में 16 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है. 

इस रिपोर्ट में बताया गया कि 2019 में मोबाइल फोन के इस्तेमाल के कारण भारतीय सड़कों पर हर दिन औसतन 29 दुर्घटनाएं हुई जिनमें हर रोज करीब 13 लोगों ने अपनी जान गवाई. 

यानी सड़क पर चलते समय फोन का शौक कितना खतरनाक है, यह आंकड़े बताते हैं. देखा जाए तो यह आश्चर्य ही नहीं बल्कि चिंता का भी विषय है. आश्चर्य की बात है कि सड़क पर पैदल या वाहन पर जाते समय जब सबसे ज्यादा सावधानी बर्तने की जरूरत होती है तब फोन का इस्तेमाल ही ध्यान भंग करने की एक बड़ी वजह बन जाता है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि हर 3 में से 1 व्यक्ति का मानना था कि उनके शहर में यातायात की स्थिति बेहद खराब होती जा रही है. सर्वे में शामिल 97 फीसदी लोगों का मानना है कि मोबाइल फोन यूज करने से वाहन चलाते समय ध्यान भंग होता है.

एक अनुमान के मुताबिक, अगर आप 70 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से गाड़ी चला रहे हैं. इस दौरान आप अपने मोबाइल फोन पर एक Message पढ़ने के लिए सिर्फ 5 सेकेंड के लिए अपनी नजरें सड़क से हटाते हैं तो ऐसे में आपकी गाड़ी एक फुटबॉल स्टेडियम जितनी दूरी तय कर चुकी होती है. यानी इन 5 सेकेंड में गाड़ी पर आपका कोई नियंत्रण नहीं होता और अगर इस दौरान कोई दूसरी गाड़ी सामने आ जाए तो भीषण दुर्घटना हो सकती है.

WHO की मानें तो Distracted Driving के दौरान हमारा रिएक्शन टाइम ज्यादा हो जाता है. जैसे ब्रेक लगाने में एक व्यक्ति को औसतन 2 सेकेंड लगते हैं लेकिन जब वह इस दौरान मोबाइल फोन चला रहा होता है या कोई और काम करता है तो यह समय 4 से 6 सेकेंड भी हो सकता है. मतलब इसकी वजह से कोई व्यक्ति समय पर गाड़ी का ब्रेक नहीं लगा पाता और इसीलिए सड़क दुर्घटनाएं होती हैं.

हालांकि इसके बावजूद इस बात को नजरअंदाज किया जाता है. अपनी जान की फिक्र भला किसे नहीं होती? बावजूद इसके अगर लापरवाही बरती जाए तो इसका सीधा मतलब यही है कि संबंधित व्यक्ति अपने शौक को जान के खतरे से ऊपर मानता है. ऐसे में यह आत्महत्या करने जैसा ही है.

फोन पर बात करने का शौक लोगों के सिर इस कदर चढ़ चुका है कि छोटी-छोटी जगहों पर भी इसके कई शौकीन पैदल सड़क पार करते हुए बिना किसी हिचक के  फोन पर देखने को मिल जाते हैं. वहीं अगर गलती से भी इन लोगों को कोई टोक दे तो 'अरे कुछ नहीं होगा' जैसे वाक्य सुनने को मिल जाते हैं. संभव है कि अगले दिन अखबार में ऐसे व्यक्ति के सामने 'चल बसे' पढ़ने को मिल जाए.

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