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Opinion: अखिलेश यादव के सीएम बनते ही छपने लगी थीं प्रशंसा में किताबें, अब मीडिया से क्यों रहते हैं नाराज?

कभी अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस का माहौल देखिए, किसी पत्रकार ने बस एक तीखा सा सवाल क्या पूछ लिया, पल भर के भीतर उनका चेहरा बदल जाता है.

Opinion: अखिलेश यादव के सीएम बनते ही छपने लगी थीं प्रशंसा में किताबें, अब मीडिया से क्यों रहते हैं नाराज?

Akhilesh Yadav

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डॉ. शब्द प्रकाश

कभी अखिलेश यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस का माहौल देखिए, किसी पत्रकार ने बस एक तीखा सा सवाल क्या पूछ लिया, पल भर के भीतर उनका चेहरा बदल जाता है. अखिलेश तुरंत पत्रकार से उलटा सवाल पूछ लेते हैं कि आपका 'पूरा नाम' क्या है ? अखिलेश यादव का सीधा मतलब होता है कि 'आपकी जाति क्या है?' ये सवाल अब उनके जवाबों का स्थायी हिस्सा बन चुका है. अगर सवर्ण हुआ तो अखिलेश अपने समर्थकों के साथ ठहाके लगाते हैं. पत्रकार का मजाक उड़ाया जाता है और उसपर 'बिके हुए' का ठप्पा लगा दिया जाता है. ये कोई इक्का-दुक्का घटना नहीं, बल्कि अखिलेश यादव की पत्रकारों के साथ कई मुलाकातों का स्थायी पैटर्न है. एक तरफ उनके समर्थक पत्रकार और यूट्यूबर उनके कसीदे पढ़ते हैं, दूसरी तरफ जब कोई निष्पक्ष सवाल पूछा जाता है, तो अखिलेश का मूड बिगड़ जाता है. अब ये उनकी राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनता जा रहा है. सवाल ये है कि आखिर अखिलेश यादव मीडिया से इतने नाराज क्यों रहते हैं?

युवा चेहरा, विकास की बातें, लैपटॉप जैसी स्कीम्स

दरअसल, 2012 में जब अखिलेश यादव पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तब मीडिया उनके साथ काफी फ्रेंडली था. युवा चेहरा, विकास की बातें, लैपटॉप जैसी स्कीम्स. हालांकि उस वक्त भी विरोधी ही नहीं सपा के लोग भी कहा करते थे कि मुलायम सिंह यादव के घर में 'साढ़े चार मुख्यमंत्री' हैं और अखिलेश 'आधे' सीएम हैं. बावजूद इसके अखिलेश की छवि बनाने में तत्कालीन मीडिया ने खूब मदद की थी. उनकी तारीफ में किताबें लिखी गईं. 

सीएम बनते ही तारीफ में किताब

अखिलेश यादव जब साल 2012 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तब वरिष्ठ पत्रकार सुनीता एरॉन ने उनकी विस्तृत जीवनी लिखी थी, 'अखिलेश यादव: विंड्स ऑफ चेंज'. करीब 600 पन्नों की इस किताब में अखिलेश को यूपी की पुरानी, जर्जर और जातिवादी राजनीति में 'परिवर्तन की ताजी हवा' के रूप में पेश किया गया था. उनकी युवा छवि, आधुनिक सोच और संभावनाओं की भरपूर तारीफ की गई थी. यही नहीं उनके कई सॉफ्ट इंटरव्यू विभिन्न मीडिया चैनलों पर चला करते थे. ये वही दौर था जब अखिलेश मीडिया से 'खुश' रहा करते थे.

फिर 2017 आया और सत्ता चली गई. योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और अखिलेश सरकार के पांच सालों का ब्योरा खुलकर मीडिया में आने लगा. गुंडाराज, संगठित अपराध का नेटवर्क, जातिवाद की राजनीति, स्वजातीय अपराधियों को संरक्षण, हर जिले में बड़े-बड़े माफिया का फलना-फूलना, गोमती और वरुणा रिवरफ्रंट के साथ ही जेपीएनआईसी प्रोजेक्ट्स में घपले, सपा कार्यकर्ताओं की खुली गुंडागर्दी. ये सभी कारनामे खुलकर बाहर आने लगे थे.

जब मीडिया ने सवाल पूछना शुरू किया

मीडिया ने सवाल पूछना शुरू किया, जो मीडिया पहले अखिलेश की खूबियां गिनाता था, वही अब उनके कार्यकाल की कमियों पर बहस करने लगा. यहीं से अखिलेश का मीडिया के प्रति रवैया बदल गया. उन्होंने मीडिया को दो खेमों में बांट दिया, एक 'हमारा' और दूसरा वाला 'बिकाऊ'. जो उनके नैरेटिव को चलाता था, वो 'निष्पक्ष मीडिया' और जो सवाल पूछता था, वो 'दुश्मन या गोदी मीडिया'. 

समय के साथ-साथ अखिलेश का व्यवहार और अधिक कटु होने लगा और सत्ता से बाहर हुए तकरीबन 9 साल के बाद अब मीडिया को लेकर उनकी कटुता और धारदार हो चुकी है. दुखद ये है कि अब अखिलेश यादव सवालों का जवाब देने की बजाय सवाल पूछने वाले पर सीधे हमला बोल देते हैं. मीडियाकर्मी की जाति पूछना, उसे 'मनुवादी' बताना, उसके अखबार, चैनल और मालिकों को 'बिकाऊ' करार देना, ये उनकी स्टैंडर्ड रणनीति बन गई है. वो ये अच्छी तरह जानते हैं कि जाति का जिक्र करते ही उनका कोर वोट बैंक यादव और मुस्लिम और उनके जमीनी कार्यकर्ता उत्तेजित हो जाते हैं. ये केवल नाराजगी मात्र नहीं है, बल्कि एक सोचा-समझा संदेश है कि देखो 'मीडिया हमारे खिलाफ है.'

अखिलेश अक्सर मीडिया को कटघरे में खड़ा करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछने की आजादी की बात करते हैं. ठीक है, लोकतंत्र में ये आजादी होनी चाहिए. लेकिन जब उसी मीडिया से उनके अपने कार्यकाल, परिवार की विरासत, या पार्टी कार्यकर्ताओं के बयानों पर सवाल आता है, तो वो नाराज हो जाते हैं. वो मीडिया को 'सत्यकारिता' करने की सीख जरूर देते हैं, लेकिन जब वही 'सत्यकारिता' का स्तंभ उनके और उनकी पार्टी के कारनामों पर रोशनी डालता या प्रश्न पूछता है तो वो उसे 'बिकाऊ' कह देते हैं. 

ये सच है कि अखिलेश यादव ने विरासत में सियासत पाई है. यादव वोट बैंक, मुस्लिम समीकरण, जाति की राजनीति, ये सब उन्हें विरासत में मिला है. उनके पिता, चाचाओं और समाजवादी पार्टी के तमाम पुराने दिग्गजों ने शहर, गांव-तहसील घूम-घूमकर पार्टी को स्थापित किया. लेकिन अखिलेश ने क्या किया? उन्होंने जनता से ज्यादा प्रेस कॉन्फ्रेंस और ट्वीट (एक्स) से राजनीति करने में रुचि दिखाई. हालांकि ये भी सच है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने बीजेपी पर 'आरक्षण समाप्त कर देने' का मनगढ़ंत आरोप लगाकर समाज के विभिन्न वर्गों का अच्छा-खासा वोट भी बटोर लिया. लोकसभा के भीतर देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. अखिलेश भी जानते हैं कि 'काठ की हांडी' बार-बार नहीं चढ़ती. 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अब भी वो उसी पुरानी शैली में हैं, एसी कमरे से प्रेस कॉन्फ्रेंस, सवालों से बचना और प्रश्न पूछने वाले पत्रकारों पर पलटकर हमला करना.

अखिलेश को सवाल स्वीकार नहीं!

निष्पक्ष मीडिया का काम है सत्ता और विपक्ष दोनों से सवाल पूछना. अखिलेश को ये स्वीकार नहीं. वो चाहते हैं कि मीडिया उनकी हां में हां मिलाए. जब नहीं मिलाती, तो नाराजगी चरम पर पहुंच जाती है. उनके करीबी कहते हैं कि वो जमीनी संपर्क कम कर चुके हैं. शायद यही वजह है कि सवालों का सामना करने की बजाय वो सवाल पूछने वाले को छोटा करके खुद को बड़ा समझने लगे हैं.

मीडिया को भी आत्मचिंतन करना चाहिए. कुछ चैनल और यूट्यूबर अखिलेश का गुणगान इसलिए करते हैं क्योंकि उनका अपना राजनीतिक एजेंडा है. लेकिन जो मीडिया निष्पक्ष तरीके से सवाल पूछ रहा है, उसे 'बिकाऊ' कहकर खारिज करना लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं. अखिलेश को याद रखना चाहिए कि 2012 में जिस मीडिया ने उन्हें युवा और प्रगतिशील बताया था, वही मीडिया 2017 के बाद उनके कार्यकाल के दौरान हुए कार्यों की जांच करता है, या वर्तमान में उनके नेताओं के आचरण पर सवाल उठाता है, तो इसमें गलत क्या है. क्या ये पत्रकारिता नहीं है.

अगर सच में अखिलेश यादव 2027 में फिर से सत्ता की उम्मीद लगाए बैठे हैं, तो उन्हें एसी कमरे में होने वाली पीसी की राजनीति से बाहर निकलकर पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना करना होगा, जवाब देना होगा. सबसे जरूरी बात कि उन्हें आलोचना सहना सीखना होगा. बिना जवाबदेही के सिर्फ नाराजगी से राजनीति नहीं चलती. बेशक मीडिया से नाराज रहने का हक उन्हें है, लेकिन उस नाराजगी को सवालों से बचने का बहाना नहीं बनाना चाहिए. लोकतंत्र में नेता जनता और मीडिया दोनों के प्रति जवाबदेह होते हैं. अखिलेश को ये सच्चाई स्वीकार करनी होगी, वरना ये नाराजगी उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बनती जाएगी.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

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