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Gomoh Railway Station का भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस से खास कनेक्शन है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस आखिरी बार इसी रेलवे स्टेशन पर नजर आए थे.
डीएनए हिंदी: भारतीय रेल (Indian Railway) को देश की जीवन रेखा कहा जाता है. आजादी से पहले से भारत में हजारों किलोमीटर लंबा रेल नेटवर्क है और इस नेटवर्क पर बहुत बड़ी संख्या में रेलवे स्टेशन मौजूद हैं, जिनके जरिए लाखों यात्री हर दिन रेल का सफर करते हैं. इन रेलवे स्टेशनों में से कुछ रेलवे स्टेशन भारत के वीर स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर भी हैं. इन्ही रेलवे स्टेशनों में से एक रेलवे स्टेशन है झारखंड का गोमो रेलवे स्टेशन. वर्तमान समय में यह रेलवे स्टेशन नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन गोमो के नाम से पहचाना जाता है. इस स्टेशन का स्वतंत्रता अभियान से खास कनेक्शन है, जिस वजह से इस रेलवे स्टेशन को नेताजी के नाम से पहचान दी गई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जुलाई महीने के अंत में 'मन की बात' कार्यक्रम में भी इस रेलवे स्टेशन का जिक्र किया था. पीएम ने 'मन की बात' कार्यक्रम में बताया था कि इसी रेलवे स्टेशन पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेस कालका मेल में सवार होकर अंग्रेज अफसरों को चकमा देने में सफल रहे थे.इसी वजह से जनवरी 2009 में तत्कालीन रेलवे मंत्री लालू प्रसाद यादव ने इस रेलवे स्टेशन का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस रेलवे स्टेशन कर दिया था.
क्या है पूरी कहानी
नेताजी को जुलाई 1940 में अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार कर प्रेसिडेंसी जेल भेज दिया था. वहां अनशन की वजह से तबीयत खराब होने पर अंग्रेजों ने उन्हें रिहा तो किया लेकिन यह भी शर्त रख दी कि उनकी तबीयत सही होने पर उन्हें फिर से गिरफ्तार किया जाएगा. इतना ही नहीं अंग्रेजों ने नेताजी पर नजर रखने के लिए उनके आवास पर कड़ा पहरा लगा दिया. 27 जनवरी 1941 को नेताजी को सजा होने थी,इससे पहले ही नेताजी को यह जानकारी मिल गई और वो अंग्रेजों की आखों में धूल झोंककर बंगाल की सीमा से भाग निकले.
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इसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आखिरी बार गोमो रेलवे स्टेशन (Gomoh Railway Station) पर देखा गया था. वह 17-18 जनवरी 191 की रात कालका-हावड़ा मेल में बैठकर पेशावर के लिए रवाना हुए थे. इसके बाद नेताजी कहां गए यह किसी को भी नहीं पता. कहा जाता है कि नेताजी पेशावर से रंगून गए थे. हर साल 18 जनवरी को गोमो में नेताजी की याद में महानिष्क्रमण दिवस मनाया जाता है. नेताजी सुभाष चंद्र कभी अंग्रेजी हुकूमत की पकड़ में नहीं आए. नेताजी कहां गए यह आज तक चर्चा का विषय है.
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