डीएनए एक्सप्लेनर
Hunger strikes that changed India: भारत में भूख हड़ताल केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दबाव बनाने का एक ऐतिहासिक तरीका रही है. अलग-अलग आंदोलनों में इसकी अवधि, उद्देश्य और परिणाम अलग रहे. आइए समझते हैं कि सबसे लंबे अनशन किन परिस्थितियों में हुए और उनसे क्या बदलाव आए.
Longest hunger strikes in Indian history: इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता की चौखट पर न्याय की आवाजें अनसुनी की गईं, तब-तब अहिंसा के सबसे अचूक हथियार-'भूख हड़ताल' ने व्यवस्था की नींव को हिलाकर रख दिया. गांधी जी के आत्मशुद्धि के उपवासों से लेकर आधुनिक भारत में लद्दाख की बर्फीली वादियों में चल रहे सोनम वांगचुक के आंदोलन तक, भूखे पेट रहने की यह जिद्द सिर्फ शरीर को सुखाने की प्रक्रिया नहीं है. यह नैतिक बल का वह चरम प्रदर्शन है, जिसने इतिहास के पन्ने बदले हैं और नए कानूनों को जन्म दिया है. आइए समझते हैं कि आखिर क्यों हफ्तों और महीनों तक अन्न-जल त्यागने वाले इन सेनानियों का यह मौन संघर्ष आज भी भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बना हुआ है.
हाल ही में लद्दाख की बर्फीली वादियों में शून्य से नीचे के तापमान के बीच पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक द्वारा अपनी 21 दिनों की भूख हड़ताल (हालांकि 18 जुलाई की सुबह 7 बजे सोमन वांगचुक को पुलिस अस्पताल में भर्ती कर दी है) पूरी करने के बाद देश में एक बार फिर इस प्राचीन और नैतिक प्रतिरोध पर बहस छिड़ गई है. यह केवल एक व्यक्ति का अनशन नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि कैसे 2026 के इस आधुनिक और डिजिटल युग में भी एक नागरिक अपने अधिकारों, पर्यावरण और भविष्य की रक्षा के लिए अपने शरीर को तपाने के लिए तैयार है.
डिजिटल युग में जहां नैरेटिव पल-भर में बदलते हैं, वहां ‘सत्याग्रह’ (भूख हड़ताल) एक ऐसा अकाट्य नैतिक हथियार है जिसे कोई भी एल्गोरिदम या प्रोपेगैंडा दबा नहीं सकता. जब कोई व्यक्ति व्यवस्था के खिलाफ अपनी सांसों को दांव पर लगाता है, तो वह डिजिटल शोर (Noise) को भेदकर सीधे समाज की अंतरात्मा पर चोट करता है. यह कोई शारीरिक कमजोरी नहीं, बल्कि अहिंसक नागरिक जिद्द की पराकाष्ठा है. पोट्टी श्रीरामुलु से लेकर सोनम वांगचुक तक, यह माध्यम साबित करता है कि जब सत्ता संवाद के सारे रास्ते बंद कर देती है, तब आत्म-पीड़ा और नैतिक बल के सामने बड़ी से बड़ी हुकूमतों को भी झुकना पड़ता है.
भारत में अनशन का इतिहास केवल दिनों की गिनती नहीं है; यह इस बात का प्रमाण है कि नैतिक बल के सामने बड़ी से बड़ी हुकूमतों को भी झुकना पड़ा. यहाँ देश की आठ सबसे महत्वपूर्ण भूख हड़तालों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत है:

मणिपुर की 'आयरन लेडी' कही जाने वाली इरोम चानू शर्मिला ने साल 2000 में मालोम में हुए एक नरसंहार के बाद सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम यानी AFSPA को हटाने की मांग को लेकर अपना ऐतिहासिक अनशन शुरू किया था. यह दुनिया के इतिहास की सबसे लंबी भूख हड़ताल मानी जाती है, जो लगभग 16 वर्षों तक चली. इस दौरान सरकार ने उन्हें हिरासत में रखकर नाक की नली (राइस ट्यूब) के माध्यम से जबरन लिक्विड डाइट देकर जीवित रखा. हालांकि, अगस्त 2016 में उन्होंने राजनीतिक रास्ते से अपनी लड़ाई लड़ने के लिए अनशन समाप्त किया. यह अनशन पूरी तरह से 'बेकार' नहीं गया; इसने पूर्वोत्तर में मानवाधिकारों के हनन और AFSPA की विसंगतियों पर न केवल राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक मंचों पर एक ऐसी व्यापक बहस खड़ी की, जिसके दबाव में बाद के वर्षों में सरकार को कई इलाकों से आंशिक रूप से AFSPA हटाने के फैसले लेने पड़े.
हरिद्वार में गंगा नदी के अस्तित्व को बचाने, उसमें हो रहे अवैध खनन और स्टोन क्रशरों के खिलाफ मातृ सदन के संत स्वामी निगमानंद ने 19 फरवरी 2011 को अपना अनशन शुरू किया था. लगभग 115 दिनों तक बिना अन्न के संघर्ष करने के बाद, 13 जून 2011 को चिकित्सालय में उनका रहस्यमयी परिस्थितियों में निधन हो गया. उनके इस सर्वोच्च बलिदान ने देशभर के पर्यावरणविदों और आम नागरिकों को झकझोर कर रख दिया. हालांकि तात्कालिक रूप से प्रशासन ने अवैध खनन पर रोक लगाने के खोखले वादे किए, लेकिन पूर्ण रूप से इस पर अमल नहीं हुआ. इसे पूरी तरह निष्फल नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसने धार्मिक और सामाजिक चेतना में पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे को मजबूती से स्थापित किया.
आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य रहे जाने-माने वैज्ञानिक डॉ. जी. डी. अग्रवाल ने गंगा नदी की अविरलता और निर्मलता को सुनिश्चित करने के लिए 'गंगा संरक्षण अधिनियम' लागू कराने की मांग को लेकर 22 जून 2018 को अनशन शुरू किया था. 111 दिनों के कठोर उपवास के बाद 11 अक्टूबर 2018 को ऋषिकेश में उनका निधन हो गया. एक उच्च शिक्षित वैज्ञानिक द्वारा पर्यावरण के लिए अपने प्राणों की आहुति देने की इस घटना ने विकास के नाम पर प्रकृति के विनाश की नीतियों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा किया. इस आंदोलन ने नीतिगत स्तर पर सरकारों को गंगा परियोजनाओं की समीक्षा करने के लिए मजबूर किया.
साल 1929 में लाहौर सेंट्रल जेल के भीतर स्वतंत्रता सेनानी जतिन दास, भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक ऐतिहासिक मोर्चा खोला. यह अनशन किसी व्यक्तिगत राजनीतिक मांग के लिए नहीं, बल्कि जेल में बंद भारतीय कैदियों के साथ हो रहे नस्लीय भेदभाव, अमानवीय व्यवहार और खराब भोजन के विरोध में था. 63 दिनों तक बिना अन्न-जल के रहने के बाद, 13 सितंबर 1929 को जतिन दास ने हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए. उनके इस बलिदान ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक अभूतपूर्व लहर पैदा की. ब्रिटिश सरकार को अंततः भारतीय कैदियों को राजनीतिक कैदी का दर्जा देने और जेल नियमों में व्यापक सुधार करने के लिए मजबूर होना पड़ा.
स्वतंत्र भारत के इतिहास में राज्यों के पुनर्गठन की सबसे बड़ी घटना पोट्टी श्रीरामुलु के नाम से जुड़ी है. उन्होंने मद्रास प्रेसिडेंसी से अलग तेलुगु भाषी लोगों के लिए एक पृथक 'आंध्र प्रदेश' राज्य के गठन की मांग को लेकर 1952 में आमरण अनशन शुरू किया था. 58 दिनों की भूख हड़ताल के बाद 15 दिसंबर 1952 को उनका निधन हो गया. उनके निधन के बाद पूरे क्षेत्र में व्यापक जन-आक्रोश फैल गया और हिंसक प्रदर्शन हुए. स्थिति को नियंत्रित करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को अंततः भाषाई आधार पर आंध्र प्रदेश के गठन की आधिकारिक घोषणा करनी पड़ी, जिसने आगे चलकर 1956 में राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवनकाल में 17 बार बड़े उपवास किए, जिनमें सबसे प्रमुख साल 1933 में छुआछूत और अछूतोद्धार आंदोलन के समर्थन में किया गया 21 दिनों का आत्मशुद्धि उपवास था. गांधी जी के लिए भूख हड़ताल केवल एक राजनीतिक दबाव का जरिया नहीं थी, बल्कि यह आत्म-निरीक्षण, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ अंतरात्मा की आवाज और अहिंसा का उच्चतम रूप थी. उनके उपवासों ने समाज के भीतर गहरी बैठी जातिवादी संकीर्णता को चोट पहुंचाई और स्वतंत्रता संग्राम में समाज के हर वर्ग को एकजुट करने का अभूतपूर्व काम किया. उनकी लगभग सभी नैतिक मांगें समाज और कांग्रेस संगठन द्वारा स्वीकार की गईं.
साल 2011 में नई दिल्ली के रामलीला मैदान में एक बुजुर्ग सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे की जिद्द ने पूरे देश के युवाओं और मध्यम वर्ग को सड़कों पर ला खड़ा किया. उन्होंने देश में फैले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक सशक्त 'जन लोकपाल कानून' की मांग को लेकर 12 दिनों का ऐतिहासिक अनशन किया. इस आंदोलन की ताकत इतनी व्यापक थी कि सरकार को संसद में इसके लिए विशेष प्रस्ताव पारित करना पड़ा. हालांकि बाद में लागू हुए लोकपाल कानून के स्वरूप को लेकर कई आलोचनाएं हुईं, लेकिन इस अनशन ने स्वतंत्र भारत में नागरिकों को भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट होने की एक नई वैचारिक शक्ति दी.
वर्तमान परिदृश्य में, लद्दाख के संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र (Ecosystem), वहां के ग्लेशियरों की सुरक्षा और स्थानीय आबादी को लोकतांत्रिक अधिकार देने के लिए संविधान की 'छठी अनुसूची' (Sixth Schedule) के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर सोनम वांगचुक का आंदोलन एक नया मील का पत्थर साबित हुआ था. हालांकि ताजा घटनाक्रम में सोनम वांगचुक का यह आमरण अनशन/भूख हड़ताल मुख्य रूप से प्रतियोगी परीक्षाओं (विशेषकर NEET-UG) में हुई कथित धांधली और पेपर लीक के मामलों के खिलाफ है. वह इन अनियमितताओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और युवाओं को न्याय दिलाने की मांग कर रहे हैं. यह आंदोलन 'कॉकरोच जनता पार्टी' द्वारा शुरू किया गया था, जिसमें 28 जून से सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर शामिल हुए थे. लंबे समय तक अन्न-जल त्यागने के कारण उनका स्वास्थ्य काफी बिगड़ चुका है. इस अनशन को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की गई है ताकि उनके स्वास्थ्य की उचित निगरानी और बचाव सुनिश्चित हो सके. हालांकि केंद्र सरकार के साथ बातचीत के दौर अभी जारी हैं और अंतिम नीतिगत निर्णय आना बाकी है.
जब कोई बड़ा आंदोलन लंबा चलता है, तो उसका प्रभाव केवल आंदोलनकारी तक सीमित नहीं रहता. सरकार पर नीतिगत दबाव बनता है. मीडिया का ध्यान महत्वपूर्ण मुद्दों की ओर जाता है. अदालतों में जनहित याचिकाएं बढ़ सकती हैं. संसद और विधानसभाओं में चर्चा होती है. समाज में जागरूकता बढ़ती है.
भारतीय संविधान शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है. यदि किसी आंदोलन से सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा या कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है, तो प्रशासन हस्तक्षेप कर सकता है. कई मामलों में स्वास्थ्य बिगड़ने पर प्रशासन चिकित्सा हस्तक्षेप भी करता है.
नहीं. आयरलैंड, ब्रिटेन, अमेरिका, तुर्की और कई अन्य देशों में भी कैदियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक संगठनों ने समय-समय पर भूख हड़ताल का सहारा लिया है.
इतिहास बताता है कि केवल लंबा अनशन ही किसी आंदोलन की सफलता तय नहीं करता. कई छोटे लेकिन प्रभावशाली आंदोलनों ने बड़े बदलाव किए, जबकि कुछ बहुत लंबे आंदोलनों के बावजूद सीमित परिणाम मिले. किसी भी आंदोलन की वास्तविक ताकत उसके उद्देश्य, जनसमर्थन, संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया में होती है.
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