डीएनए एक्सप्लेनर
India-US Trade Deal Protest: भारत और अमरीका के बीच होने वाले व्यापार समझौतों और कृषि नीतियों के खिलाफ किसान महापंचायतों के जरिए लगातार विरोध जता रहे हैं. सस्ते विदेशी उत्पादों के बाजार में आने से घरेलू खेती और डेयरी सेक्टर पर मंडराते खतरे के बीच, किसान अपनी आजीविका बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
सुबह की पहली किरण के साथ जब देश का किसान अपने खेतों की तरफ निकलता है, तो उसके मन में एक अनजाना डर और सिहरन होती है. क्या उसकी मेहनत की फसल का उसे इस बार भी सही दाम नहीं मिलेगा? क्या उसकी जमीन और परिवार की रोजी-रोटी पर कोई बड़ा संकट मंडरा रहा है? आज दिल्ली से लेकर देश के कई कोनों में किसानों की महापंचायतों का नीतिगत विरोध क्या है? चलिए सीए सुदेशना बसु से समझते हैं भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार समझौतों को लेकर अन्नदाताओं के दिलों में क्या डर बैठा है? और उन्हें एक बार फिर महापंचायत के जरिए सरकार के सामने खड़े होने पर मजबूर कर दिया है.
फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी: महापंचायतों में यह सबसे प्रमुख मांग रहती है कि सरकार सभी प्रमुख फसलों पर सी-2 लागत का डेढ़ गुना एमएसपी तय करे और इसे कानून का रूप दे, ताकि देश के हर किसान को उसकी उपज का तय और सुरक्षित दाम मिल सके.
US-India ट्रेड डील और आयात का विरोध: किसानों का मुख्य विरोध इस बात को लेकर है कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के तहत अमरीका या अन्य देशों से सस्ते कृषि और डेयरी उत्पाद भारत के बाजारों में न आने दिए जाएं, जिससे घरेलू बाजार और स्थानीय किसानों की आजीविका पर संकट न आए.
कर्ज मुक्ति और वित्तीय राहत: देश भर के किसानों पर बढ़ते कर्ज के बोझ को खत्म करने के लिए पूर्ण कर्ज माफी और आपदा या मौसम की मार से खराब हुई फसलों का उचित और समय पर मुआवजा दिए जाने की मांग की जाती है.
बिजली संशोधन विधेयक 2025 और बीज विधेयक का विरोध: कृषि क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा देने वाले बिजली संशोधन बिल और नए बीज विधेयकों का कड़ा विरोध किया जा रहा है, जिससे किसानों का मानना है कि खेती की लागत और बीज के दाम आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाएंगे.
डीजल, खाद और कृषि लागत में कमी: खेती में काम आने वाले डीजल, पेट्रोल, रासायनिक खादों (यूरिया-डीएपी) और कृषि उपकरणों पर मिलने वाली महंगाई से राहत देने तथा इनकी निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने की पुरजोर मांग उठाई जाती है.
अमेरीकी कृषि उत्पादों की एंट्री और घरेलू बाजार पर मंडराता खतरा
जब अमरीका जैसे विकसित देशों से भारी सब्सिडी और अत्याधुनिक तकनीक से तैयार कृषि उत्पाद भारत के बाजारों में उतरेंगे, तो हमारे छोटे किसानों के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी हो जाएगी. अमरीकी किसानों को वहां की सरकारों से मिलने वाली वित्तीय सुरक्षा और बड़े पैमाने पर खेती करने की ताकत उन्हें बहुत कम कीमत पर सामान बेचने की छूट देती है. इसके विपरीत, हमारे देश का किसान मौसम की मार और छोटे खेतों के सहारे अपनी फसल उगाता है. अगर बिना किसी रोक-टोक के बाहर का सामान देश में आने लगा, तो स्थानीय फसलों के दाम जमीन पर आ जाएंगे और किसान चाहकर भी अपनी लागत नहीं निकाल पाएगा. यह सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है, बल्कि यह उस थाली की कहानी है जो हमारे घरों तक पहुंचती है.

हमारे देश के गांवों में सुबह की शुरुआत दूध की बाल्टी और मवेशियों की देखभाल के साथ होती है. देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा पशुपालन और डेयरी उद्योग पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर करता है. महापंचायतों में किसानों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि अमरीकी डेयरी उत्पादों को भारतीय बाजार में खुली छूट मिल गई, तो गांवों की यह बुनियादी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी. दूध और उससे जुड़े उत्पादों के दाम गिरने से ग्रामीण इलाकों में रोजगार के वो रास्ते बंद हो जाएंगे जो पीढ़ियों से परिवारों को संभालते आए हैं. इस डर ने हर उस शख्स को झकझोर दिया है जो दूध बेचकर अपने बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च चलाता है.
किसानों के गुस्से की एक बड़ी वजह यह भी है कि बड़े व्यापारिक समझौतों के बनते वक्त जमीन स्तर पर काम करने वाले लोगों को भरोसे में नहीं लिया जाता. किसानों का साफ कहना है कि नीति बनाने वाले कमरों में बैठने वाले लोग यह नहीं जानते कि धूप में पसीना बहाने वाले एक किसान का जीवन कैसा होता है. समझौतों के मसौदे और उनके दूरगामी प्रभावों को लेकर स्पष्टता न होना इस शक को और गहरा कर देता है कि कहीं फैसले पीछे के दरवाजों से तो नहीं तय हो रहे. जब तक देश के अन्नदाता को यह भरोसा नहीं दिलाया जाता कि उसकी तरक्की इन नीतियों से जुड़ी है, तब तक अविश्वास का यह माहौल यूं ही बना रहेगा.
यह लड़ाई केवल एक अंतरराष्ट्रीय समझौते तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. डीजल, पेट्रोल, खाद और बिजली के लगातार बढ़ते दाम खेती की लागत को आसमान पर पहुंचा रहे हैं. दूसरी तरफ, फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की कानूनी गारंटी न मिलने से किसान हर फसल के बाद कर्ज के दलदल में धंसता चला जाता है. जब खेत में लागत ज्यादा और आमदनी कम होने लगती है, तो उसका सीधा असर बाजार में मिलने वाली सब्जियों और अनाज के दामों पर भी पड़ता है. आज महापंचायत में उठने वाली हर एक आवाज इस बात की गवाही देती है कि अगर किसान सुरक्षित नहीं है, तो देश की थाली भी सुरक्षित नहीं रह सकती.
सीए सुदेशन बसु कहती हैं कि ये बहस सिर्फ विरोध या समर्थन की नहीं है, बल्कि बैलेंस शीट, लागत (Cost) और मुनाफे के गणित की है. नफे-नुकसान के बीच ट्रेड डील के क्या मायने हैं, इसे इस तरह समझा जा सकता है:
सुदेशना कहती हैं कि एक वित्तीय विश्लेषक के रूप में देखें, तो किसानों की आशंकाओं को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि इसके पीछे ठोस आर्थिक कारण हैं:
सब्सिडी का भारी अंतर: अमरीका जैसे देशों में कृषि एक बड़े कॉर्पोरेट ढांचे की तरह चलती है, जहां किसानों को सरकारों की तरफ से भारी-भरकम वित्तीय सब्सिडी और बीमा सुरक्षा मिलती है. इसके मुकाबले, भारतीय कृषि मुख्य रूप से छोटे और सीमांत किसानों के कंधों पर टिकी है, जिन्हें वैसा वित्तीय सुरक्षा कवच नहीं मिलता.
लागत बनाम मूल्य (Cost vs Pricing): यदि बिना सोचे-समझे या बिना कड़े सुरक्षा चक्र के सस्ते विदेशी उत्पाद भारतीय बाजार में उतरते हैं, तो घरेलू किसानों के लिए अपनी उत्पादन लागत (Input Cost - जैसे खाद, बिजली, डीजल के दाम) निकालना असंभव हो जाएगा. बैलेंस शीट के लिहाज से यह भारतीय किसान के लिए सीधे तौर पर घाटे का सौदा साबित हो सकता है.
दूसरी ओर, देश की व्यापक अर्थव्यवस्था (Macro Economy) और ग्लोबल ट्रेड के लिहाज से इस तरह के समझौतों के अपने बड़े फायदे होते हैं:
निर्यात के नए रास्ते: हर ट्रेड डील वन-वे नहीं होती. इसके जरिए भारत के कई मैन्युफैक्चरिंग, आईटी, और लेबर-इंटेंसिव सेक्टर (जैसे टेक्सटाइल, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान और कुछ चुनिंदा कृषि व समुद्री उत्पाद) को अमेरिकी बाजार में जीरो-टारिफ या कम ड्यूटी पर एंट्री मिलती है, जिससे देश के कुल निर्यात (Exports) को बड़ा बढ़ावा मिलता है.
वैश्विक प्रतिस्पर्धा: दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार समझौते करने से देश के उद्योगों पर आधुनिक वैश्विक मानकों (Global Standards) को अपनाने का दबाव बनता है, जो लंबी अवधि में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है.
सरकार का पक्ष: आधिकारिक तौर पर सरकार का यह स्पष्ट रुख रहा है कि भारत के संवेदनशील क्षेत्रों विशेषकर डेयरी और मुख्य कृषि उत्पादों के हितों पर कोई आंच नहीं आने दी जाएगी और उन्हें इस तरह के समझौतों के दायरे से सुरक्षित रखा गया है.
पारदर्शिता का अभाव (Lack of Transparency): सुदेशना कहती हैं कि वित्तीय और व्यापारिक समझौतों में सबसे बड़ी कमी यह होती है कि मसौदे (Drafts) और डेटा समय पर सार्वजनिक नहीं किए जाते. जब तक स्टेकहोल्डर्स (किसानों और छोटे व्यापारियों) के सामने स्पष्ट आंकड़े नहीं रखे जाते, तब तक बाजार में डर और अफ़वाहों का माहौल बनना स्वाभाविक है.
एक सीए की नजर यह मुद्दा 'काले और सफेद' (सही या गलत) का नहीं, बल्कि रिस्क मैनेजमेंट (Risk Management) का है. सरकार को चाहिए कि वह व्यापक अर्थव्यवस्था के फायदे और देश के करोड़ों छोटे किसानों की आजीविका के बीच एक ऐसा वित्तीय संतुलन बनाए, जहां वैश्विक बाजार में देश की साख भी बढ़े और अन्नदाता की आय पर भी कोई आंच न आए.
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