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कौन थे सी. शंकर नायर, जिनका जिक्र करके ब्रिटिश सांसद ने अपनी सरकार से की जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए माफी मांगने की मांग

अमृतसर के जलियांवाला बाग में भारत को गुलाम बनाकर रखने के दौरान ब्रिटेन ने ऐसा नरसंहार किया था, जिस तरह की नृशंस घटना इतिहास में बेहद कम हुई हैं. ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन ने इसी कारण अपनी सरकार को उसके लिए माफी मांगने को कहा है.

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कौन थे सी. शंकर नायर, जिनका जिक्र करके ब्रिटिश सांसद ने अपनी सरकार से की जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए माफी मांगने की मांग

British MP Bob Blackman ने ब्रिटिश संसद में जलियांवाला बाग नरसंहार पर माफी की मांग करते हुए सी. शंकरन नायर का भी जिक्र किया है.

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Who Was C. Shankaran Nair: ब्रिटेन ने भारत को गुलाम रखने के दौरान ऐसे तमाम काम किए थे, जिन्हें मानवाधिकार की नजर में नृशंसता कहा जा सकता है. इन सभी में जलियांवाला बाग (Jallianwala Bagh) को सबसे ऊपर माना जाता है, जहां एक मैदान में मौजूद आंदोलनकारियों की भीड़ को घेरकर उन पर इतनी गोलियां बरसाई गई थीं कि इस नरसंहार को इतिहास में आज भी सबसे भयानक घटनाओं में गिना जाता है. ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन ने ब्रिटिश संसद में एक अहम घटनाक्रम में अपनी सरकार से जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए औपचारिक रूप से माफी मांगने की अपील की है. ब्रिटिश सांसद ने अपनी सरकार को उस नृशंस घटना के लिए जिम्मेदारी लेने को कहा है, जिसने उपनिवेशवाद के इतिहास पर अमिट काला धब्बा छोड़ा था. ब्लैकमैन ने इस दौरान सर सी. शंकरन नायर का भी जिक्र किया, जिन्होंने इस नरसंहार के बाद न्याय के लिए अथक संघर्ष किया. इसके बावजूद उनके योगदान को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे.

ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने वाले व्यक्ति थे शंकरन
सी. शंकरन नायर का जन्म 11 जुलाई 1857 को मालाबार (वर्तमान केरल) में हुआ था. शंकरन नायर देश के प्रख्यात वकील बने, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने भारत में अपने वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में जगह दी. इस परिषद में रहते हुए नायर ने ब्रिटिश शासन की नीतियों को करीब से देखा, जिसने उनके अंदर प्रखर राष्ट्रवादी को जगह दी. उन्होंने परिषद में रहकर भारतीयों के अधिकारों की वकालत करना शुरू कर दिया. होम रूल के समर्थन में एनी बेसेंट के साथ उनके प्रयास और 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों में उनकी अहम भूमिका थी. इससे भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देने की राह खुली, जो स्वतंत्रता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थे.

जलियांवाला बाग नरसंहार से बदली असली सोच
नायर की सोच और दिशा को असली बदलाव 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार से मिला. जनरल डायर के आदेश पर सैकड़ों निहत्थे भारतीयों को निर्ममता से गोलियों से भून दिया गया, तो नायर ने चुप रहने के बजाय इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया और ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी.

ब्रिटेन की क्रूरता दुनिया के सामने लाए
नायर ने जलियांवाला बाग नरसंहार के विरोधी में वायसराय परिषद से इस्तीफा दे दिया, जो ब्रिटिश प्रशासन के प्रति उनके असंतोष और विरोध का ऐतिहासिक प्रमाण था. लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका. उन्होंने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को दुनिया के सामने लाने के लिए गांधी एंड एनार्की नामक एक पुस्तक लिखी. इसमें उन्होंने न केवल ब्रिटिश नीतियों की कठोर आलोचना की, बल्कि उनकी बर्बरता को भी उजागर किया. उनके इस निर्भीक कदम के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनके खिलाफ लंदन में मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसे नायर ने पूरी ताकत और साहस के साथ लड़ा.

इतिहास में नहीं मिली जगह
भले ही शंकरन नायर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बेहद अहम भूमिका निभाई हो, लेकिन उनकी विरासत को इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थे. जहां महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को भरपूर सम्मान दिया गया, वहीं नायर की निडरता और ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके सशक्त संघर्ष को उतनी प्रमुखता नहीं मिली. जब दुनिया भर में औपनिवेशिक अत्याचारों पर माफी की मांग तेज हो रही है, तो भारत को भी अपने नायकों को उचित सम्मान देने पर आत्ममंथन करना चाहिए. सी. शंकरन नायर जैसे भूले-बिसरे नायकों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने, उनके नाम पर स्मारक बनाने और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए.

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