डीएनए एक्सप्लेनर
BRICS 140 point declaration explained: ब्रिक्स की नई दिल्ली घोषणा में 140 बिंदुओं के जरिए व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान, टैरिफ, एआई, स्टार्टअप, ऊर्जा, एमएसएमई और वैश्विक संस्थाओं में सुधार पर साझा दिशा तय की गई है. इसका असर आगे कारोबार, भुगतान लागत और नए बाजारों पर पड़ सकता है.
What exactly is the New Delhi Declaration? ब्रिक्स की 18वीं शिखर बैठक में 12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली घोषणा को सर्वसम्मति से अपनाया गया. यह 140 बिंदुओं वाला दस्तावेज है, जिसमें सदस्य देशों ने आर्थिक और वित्तीय सहयोग से लेकर व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, कृषि, स्वास्थ्य, वैश्विक शासन और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी साझा प्राथमिकताएं रखी हैं. आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में हुआ और भारत की अध्यक्षता का मुख्य विषय लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता था.
सीधे शब्दों में समझें तो नई दिल्ली घोषणा कोई ऐसा कानून नहीं है जो अगले दिन से बाजार या आम आदमी के नियम बदल दे. यह ब्रिक्स देशों की साझा दिशा और आगे होने वाले सहयोग का रोडमैप है. असली असर इस बात पर निर्भर करेगा कि इन फैसलों और प्रस्तावों को आगे किस तरह लागू किया जाता है.
ब्रिक्स में 11 देश हैं और भारत सरकार के अनुसार ये देश मिलकर दुनिया की करीब 49.5 फीसदी आबादी, करीब 40 फीसदी वैश्विक जीडीपी और करीब 26 फीसदी वैश्विक व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसलिए इसमें तय होने वाली आर्थिक दिशा का असर सिर्फ सदस्य देशों तक सीमित नहीं रह सकता.
नई दिल्ली घोषणा का एक अहम आर्थिक पहलू सीमा-पार भुगतान है. दस्तावेज में ब्रिक्स पेमेंट टास्क फोर्स के काम का जिक्र करते हुए सदस्य देशों की भुगतान और मैसेजिंग प्रणालियों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया गया है. साथ ही ब्रिक्स की स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और निवेश के निपटान पर चर्चा आगे बढ़ाने की बात कही गई है. लक्ष्य भुगतान को ज्यादा तेज, कम खर्चीला, सुलभ, सुरक्षित और कुशल बनाना है.
यहीं एक बड़ी गलतफहमी से बचना जरूरी है. नई दिल्ली घोषणा में न तो नई साझा ब्रिक्स करेंसी लॉन्च करने का फैसला है और न ही डॉलर को तुरंत हटाने का ऐलान. फोकस यह है कि ब्रिक्स देशों के बीच कारोबार में स्थानीय मुद्राओं और बेहतर सीमा-पार भुगतान व्यवस्था का इस्तेमाल बढ़ाने की संभावनाओं पर काम किया जाए.
आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या है. अगर भविष्य में अलग-अलग देशों के बीच भुगतान व्यवस्था ज्यादा आसान और कम खर्चीली होती है तो आयातकों, निर्यातकों और अंतरराष्ट्रीय कारोबार करने वाली कंपनियों की लेन-देन लागत घट सकती है. इसका फायदा आगे चलकर उत्पादों की कीमत, कारोबार और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में दिखाई दे सकता है. हालांकि इसका असर तुरंत रुपये या डॉलर की कीमत पर पड़ना तय नहीं है.
नई दिल्ली घोषणा में एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपायों को लेकर चिंता जताई गई है. ब्रिक्स ने नियम आधारित और गैर-भेदभावपूर्ण व्यापार व्यवस्था तथा विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया है.
इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि टैरिफ सिर्फ सरकारों के बीच की कहानी नहीं है. किसी देश में आयात पर ज्यादा शुल्क लगता है तो कंपनियों की लागत बढ़ सकती है. कंपनियां इस अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा आगे ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं. यानी टैरिफ का असर सामान की कीमत, सप्लाई चेन और निर्यात के कारोबार तक पहुंच सकता है.
घोषणा में विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र को मजबूत करने और वैश्विक व्यापार व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर भी जोर दिया गया है. ब्रिक्स ने यह भी कहा है कि व्यापार में अचानक आने वाली बाधाएं सप्लाई चेन और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकती हैं.
नई दिल्ली घोषणा का एक दिलचस्प कारोबारी पहलू पर्यावरण से जुड़े व्यापारिक उपाय हैं. ब्रिक्स ने यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर टैक्स जैसे उपायों को लेकर चिंता जताई है. घोषणा में यह भी कहा गया है कि जीवाश्म ईंधन विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की ऊर्जा जरूरतों में अभी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहेंगे.
इसका मतलब यह है कि ब्रिक्स देशों के लिए ऊर्जा बदलाव केवल तेजी से जीवाश्म ईंधन छोड़ने का मुद्दा नहीं है. ऊर्जा सुरक्षा, सस्ती ऊर्जा, विकास की जरूरत और कार्बन उत्सर्जन में कमी को साथ लेकर चलने की बात कही गई है.
भारतीय कंपनियों के लिए इसका मतलब यह हो सकता है कि ऊर्जा, नवीकरणीय ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, बैटरी, बिजली नेटवर्क और ऊर्जा तकनीक जैसे क्षेत्रों में आने वाले वर्षों में सहयोग और निवेश के नए अवसर बनें.
नई दिल्ली घोषणा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई को भी महत्वपूर्ण स्थान मिला है. ब्रिक्स ने ऐसी एआई व्यवस्था पर जोर दिया है जो भरोसेमंद, समावेशी और ऊर्जा की दृष्टि से ज्यादा कुशल हो तथा ग्लोबल साउथ की जरूरतों के अनुकूल हो.
इसका सीधा संबंध कंपनियों और नौकरियों से है. आने वाले समय में एआई का इस्तेमाल बैंकिंग, स्वास्थ्य, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, शिक्षा, ग्राहक सेवा और सरकारी सेवाओं तक बढ़ने वाला है. इसलिए एआई के लिए नियम, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा और कौशल पर देशों के बीच सहयोग बढ़ना कंपनियों के लिए बड़ा कारोबारी मुद्दा बन सकता है.
भारत की अध्यक्षता के दौरान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी पहल, डिजिटल स्किलिंग और उद्योग 4.0 जैसे क्षेत्रों में सहयोग को भी आगे बढ़ाया गया है.
स्टार्टअप के लिहाज से भी घोषणा महत्वपूर्ण है. इसमें ब्रिक्स इनक्यूबेटर नेटवर्क की स्थापना का स्वागत किया गया है. इसका मकसद सदस्य देशों के राष्ट्रीय नोडल संस्थानों, चयनित इनक्यूबेटरों और स्टार्टअप को जोड़ना है, ताकि योग्य स्टार्टअप को दूसरे ब्रिक्स देशों के इनक्यूबेटर से जोड़ा जा सके.
इसके साथ ब्रिक्स स्टार्टअप इनोवेशन फंड पर आगे विचार करने की बात कही गई है. इसलिए इसे अभी से ऐसा फंड बताना सही नहीं होगा जिसमें स्टार्टअप के लिए पैसा उपलब्ध हो गया है. अगर आगे यह व्यवस्था लागू होती है तो शुरुआती और ग्रोथ स्टेज के स्टार्टअप के लिए ब्रिक्स देशों के बीच फाइनेंसिंग और बाजार तक पहुंच के नए रास्ते बन सकते हैं.
यहां एक छिपा हुआ कारोबारी एंगल भी है. सिर्फ पैसा मिलना ही महत्वपूर्ण नहीं होगा. किसी भारतीय स्टार्टअप को दूसरे ब्रिक्स देश के बाजार, इनक्यूबेटर, साझेदार या तकनीकी नेटवर्क तक पहुंच मिलना भी उतना ही बड़ा फायदा हो सकता है.
नई दिल्ली घोषणा में छोटे कारोबार और एमएसएमई के लिए भी कई पहल का समर्थन किया गया है. ब्रिक्स एमएसएमई कोऑपरेशन पोर्टल को ऐसा डिजिटल इकोसिस्टम बनाने की दिशा में रखा गया है, जहां एमएसएमई, टेक्नोलॉजी सेंटर, क्लस्टर, कारोबारी संगठन, वित्तीय संस्थान और प्रशिक्षण संस्थान आपस में जुड़ सकें.
इसका महत्व छोटे कारोबारियों के लिए बड़ा हो सकता है. अभी किसी भारतीय छोटे कारोबारी के लिए विदेश में ग्राहक, साझेदार, फाइनेंस या बाजार तलाशना बड़ी चुनौती हो सकता है. अगर ब्रिक्स के स्तर पर बाजार और कारोबारी नेटवर्क ज्यादा व्यवस्थित होते हैं तो निर्यात करने वाले छोटे कारोबारियों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं.
नई दिल्ली घोषणा में एमएसएमई के अंतरराष्ट्रीयकरण और वित्त तक पहुंच बढ़ाने के लिए सहयोग का भी समर्थन किया गया है. यानी आने वाले समय में छोटे कारोबार को सिर्फ घरेलू बाजार तक सीमित रखने के बजाय ब्रिक्स के बड़े बाजार से जोड़ने की कोशिश दिखाई देती है.
ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक को भी घोषणा में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है. दस्तावेज में बैंक से स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण बढ़ाने, फंडिंग के स्रोतों में विविधता लाने और टिकाऊ विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश तथा आर्थिक एकीकरण से जुड़ी परियोजनाओं को समर्थन देने के लिए काम आगे बढ़ाने को कहा गया है.
इसका असर सीधे आम आदमी की जेब में कल से दिखाई नहीं देगा. लेकिन सड़क, परिवहन, ऊर्जा, पानी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और दूसरे विकास प्रोजेक्ट के लिए वित्त उपलब्धता बढ़ती है तो लंबे समय में रोजगार, कारोबार और क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को फायदा हो सकता है.
नई दिल्ली घोषणा में कृषि सहयोग को भी जगह दी गई है. ब्रिक्स एग्रीन यानी एग्रो-इनपुट्स, जेनेटिक रिसोर्सेज एंड इन्फॉर्मेशन नेटवर्क, डिजिटल कृषि और एग्रोइकोलॉजी तथा रीजेनेरेटिव एग्रीकल्चर से जुड़े नेटवर्क का समर्थन किया गया है. किसानों के बीज अधिकारों से जुड़ा ग्लोबल फोरम भी शुरू करने की दिशा में कदम उठाया गया है.
इसका संभावित फायदा कृषि उत्पादकता, जलवायु जोखिम से निपटने, तकनीक और खेती से जुड़ी जानकारी के आदान-प्रदान में हो सकता है. खासकर छोटे किसानों के लिए डिजिटल कृषि और बेहतर कृषि तकनीक का महत्व आगे और बढ़ सकता है.
ऊर्जा के मामले में भी ब्रिक्स ने सुरक्षित और विविध ऊर्जा बाजार, मजबूत सप्लाई चेन और महत्वपूर्ण खनिजों पर सहयोग बढ़ाने की बात कही है. यह इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सौर ऊर्जा और मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर के लिए अहम हो सकता है.
नई दिल्ली घोषणा का सबसे बड़ा राजनीतिक और आर्थिक संदेश ग्लोबल साउथ की भूमिका मजबूत करने से जुड़ा है. ब्रिक्स ने वैश्विक संस्थाओं में ज्यादा प्रतिनिधित्व और बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार की जरूरत पर जोर दिया है. भारत सरकार के अनुसार मौजूदा 11 सदस्य देश दुनिया की करीब आधी आबादी और करीब 40 फीसदी वैश्विक जीडीपी का प्रतिनिधित्व करते हैं.
यानी ब्रिक्स अब सिर्फ पांच देशों का आर्थिक मंच नहीं है. इसका दायरा एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और लैटिन अमेरिका तक फैल चुका है. यही वजह है कि व्यापार, ऊर्जा, वित्त, तकनीक और सप्लाई चेन में इसकी गतिविधियों को कारोबारी दुनिया भी गंभीरता से देख रही है.
नई दिल्ली घोषणा का असर समझने का सबसे आसान तरीका यह है कि इसे डॉलर बनाम ब्रिक्स करेंसी की लड़ाई के रूप में न देखें. असली कहानी भुगतान की लागत, व्यापार के रास्ते, टैरिफ, सप्लाई चेन, एआई, स्टार्टअप, एमएसएमई, ऊर्जा और नए बाजारों की है.
अगर स्थानीय मुद्राओं में कारोबार बढ़ता है और सीमा-पार भुगतान आसान होता है तो कारोबारियों की लेन-देन लागत कम हो सकती है. अगर टैरिफ और व्यापार बाधाओं पर दबाव कम होता है तो आयात-निर्यात कारोबार को राहत मिल सकती है. अगर स्टार्टअप और एमएसएमई के लिए ब्रिक्स बाजार खुलते हैं तो नए ग्राहक और निवेश के अवसर बन सकते हैं.
लेकिन इन सभी बातों का असर धीरे-धीरे आएगा. 140 बिंदुओं की घोषणा अपने आप में तत्काल आर्थिक बदलाव नहीं है. असली कहानी अब इसके बाद शुरू होगी, जब अलग-अलग पहल नियम, फंडिंग, डिजिटल सिस्टम और वास्तविक कारोबारी समझौतों में बदलेंगी.
नई दिल्ली घोषणा का मतलब डॉलर का अंत या नई ब्रिक्स करेंसी की शुरुआत नहीं है. इसका बड़ा मतलब यह है कि ब्रिक्स देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं, तेज और सस्ते सीमा-पार भुगतान, एआई, स्टार्टअप, एमएसएमई, ऊर्जा और नई सप्लाई चेन में सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं. इसका असर कारोबार पर तत्काल नहीं, बल्कि धीरे-धीरे दिखाई देगा.
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