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Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला, पहली बार तय की राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन, 5 पॉइंट्स में जानें सबकुछ

Supreme Court News: सु्प्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को यह ऐतिहासिक फैसला दिया था, जिसका 415 पेज का डिटेल ऑर्डर अब टॉप कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड किया गया है. क्या है पूरा ऑर्डर चलिए हम आपको 5 पॉइंट्स में सबकुछ बताते हैं.

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Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला, पहली बार तय की राष्ट्रपति के लिए डेडलाइन, 5 पॉइंट्स में जानें सबकुछ
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Supreme Court News: सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में पहली बार राष्ट्रपति के लिए संसद या राज्य विधानसभा में मंजूरी होकर आने वाले बिल पर फैसला लेने की डेडलाइन तय कर दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचारार्थ सुरक्षित रखे गए बिलों के बारे में संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा. यह डेडलाइन सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने 8 अप्रैल को उस फैसले में तय की है, जिसमें बेंच ने तमिलनाडु सरकार की तरफ से राज्यपाल आरएन रवि के पास लंबित 10 बिलों को पास कर दिया है. तमिलनाडु के राज्यपाल ने इन बिलों को राष्ट्रपति के विचार करने के आधार पर रोका हुआ था, जिसके खिलाफ तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह बिल रोकने को अवैध बताते हुए सभी राज्यपालों के लिए विधानसभाओं से पारित बिल को 3 महीने के अंदर मंजूर या नामंजूर करने की टाइमलाइन तय कर दी है. इस ऐतिहासिक फैसले की 415 पेज की डिटेल सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 4 दिन बाद शुक्रवार रात 10.54 बजे अपलोड की गई है.

चलिए आपको 5 पॉइंट्स में बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा है-

1. गृह मंत्रालय की तय डेडलाइन अपनाना उचित
सुप्रीम कोर्ट बेंच ने अपने फैसले में कहा,'हम गृह मंत्रालय तरफ से तय डेडलाइन को अपनाना उचित समझते हैं. इस आधार पर हम तय करते हैं कि राष्ट्रपति को राज्यपाल की तरफ से विचार के लिए भेजे गए किसी बिल पर संदर्भ मिलने की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना होगा. यदि किसी कारण इससे ज्यादा समय लगता है तो उसका उचित कारण दर्ज कराना होगा और संबंधित राज्य को बताना होगा.' सुप्रीम कोर्ट ने कहा,'इस मामले में राज्यों को भी राज्यपाल या राष्ट्रपति की तरफ से उठने वाले सवालों का जवाब देकर सहयोग करना चाहिए और केंद्र सरकार के सुझावों पर शीघ्रता से विचार करना चाहिए.'

2. मंजूरी के दूसरे राउंड के लिए बिल को रोकना अवैध
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने 10 बिलों को दूसरे राउंड में राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए रोकने को अवैध बताया था. साथ ही इसे कानूनी रूप से भी त्रुटिपूर्ण कहते हुए खारिज कर दिया था. बेंच ने बिना किसी लाग लपेट के अपने फैसले में इस पर कमेंट किया है. बेंच ने कहा, 'राज्यपाल को कोई भी बिल राष्ट्रपति के विचार करने के लिए सुरक्षित रखने का अधिकार है. यदि राष्ट्रपति उस बिल पर अपनी मंजूरी नहीं देते हैं तो राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट में ऐसी किसी भी कार्रवाई करने का अधिकार है.'

3. राज्यपाल को ताकत देने वाले अनुच्छेद 200 पर भी बोला कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 200 पर भी बात की, जो राज्यपाल को अपने सामने मंजूरी के लिए लाए गए किसी भी बिल को राष्ट्रपति की सहमति या उनकी राय लेने के लिए रोकने का अधिकार देता है. बेंच ने तमिलनाडु के मामले का संदर्भ लेते हुए कहा,'राज्यपाल के पास ये बिल काफी लंबे समय से लंबित हैं और राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट के पंजाब राज्य के मामले में फैसला देने के तत्काल बाद इन्हें राष्ट्रपति के विचार के लिए पेश करने में स्पष्ट रूप से नेकनीयती नहीं दिखाई है. ऐसे में माना जा सकता है कि राज्यपाल ने उन्हें दोबारा विचार के बाद जिस तारीख को पेश किया था, उन्हें उसी दिन मंजूरी दे दी थी. संविधान के अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए स्पष्ट समयसमीा नहीं है, लेकिन इसके बावजूद यह अनुच्छेद इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता है कि इससे राज्यपाल को बिलों पर फैसला नहीं लेने की अनुमति मिल जाए. इससे राज्य में कानून बनाने की प्रक्रिया में देरी और बाधा उत्पन्न होती है.'

4. डेडलाइन का पालन नहीं होने पर होगी न्यायिक समीक्षा
बेंच ने राज्यपालों के विधानसभा से पारित होकर आए बिलों पर कार्रवाई के लिए डेडलाइन तय की. बेंच ने कहा,'राज्यपालों से अपेक्षा की जाती है कि राज्य कैबिनेट की सहायता और सलाह पर वे तत्काल कार्रवाई करें, जिसकी अधिकतम अवधि 1 महीना होगा. एक महीने के अंदर बिल को मंजूरी देने या नहीं देने या फिर इसे राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजने का काम करना होगा.' बेंच ने आगे कहा,'यदि राज्य कैबिनेट की सलाह के खिलाफ राज्यपाल मंजूरी नहीं दे रहे हैं तो उन्हें बिल को अधिकतम तीन महीने के अंदर इस संदेश के साथ वापस लौटाना होगा. ऐसा उन बिलों के मामले में भी होगा, जो राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजे गए हैं. यदि राज्य कैबिनेट पुनर्विचार कर फिर से बिल पेश करती है तो इस स्थिति में राज्यपाल को एक महीने के अंदर उसे मंजूरी देनी होगी यदि इस डेडलाइन का अनुपालन नहीं होता है या राज्यपाल निष्क्रियता दिखाते हैं तो यह कार्रवाई कोर्ट की न्यायिक समीक्षा के दायरे में आएगी.' बेंच ने अपनी रजिस्ट्री को इस फैसले की एक-एक कॉपी सभी हाई कोर्ट और सभी राज्यों के राज्यपालों के प्रधान सचिवों को भेजने का भी निर्देश दिया है. 

5. वीटो नहीं लगा सकते बिल पर राज्यपाल
बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्यपाल किसी भी बिल पर रोक लगाने के लिए 'पूर्ण वीटो' या 'पॉकेट वीटो' की अवधारणा नहीं अपना सकते. बेंच ने कहा,'अनुच्छेद 201 के तहत कार्यों के निर्वहन में राष्ट्रपति के पास पॉकेट वीटो या पूर्ण वीटो उपलब्ध नहीं है. अनुच्छेद 2-1 के मूल भाग के तहत दी गई अभिव्यक्ति 'घोषणा करेगा' का मतलब है कि राष्ट्रपति को उपलब्ध दो विकल्पों के बीच अनिवार्य रूप से चयन करना होगा यानी बिल को या तो मंजूरी देनी होगी या मंजूरी रोकनी होगी. संवैधानिक योजना किसी भी तरह से यह प्रावधान नहीं करती है कि कोई संवैधानिक प्राधिकारी संविधान के तहत अपनी शक्तियों का मनमाने ढंग से प्रयोग कर सके.' इसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत दी गई अपनी पूर्ण शक्ति का प्रयोग करते हुए तमिलनाडु के राज्यपाल के सामने दोबारा पेश किए गए बिलों को पारित मानने का फैसला दिया है. 

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