डीएनए एक्सप्लेनर
How clothes and parties are ruining your CIBIL score: शॉपिंग वेबसाइट्स पर 'बाय नाउ, पे लेटर' और आसान ईएमआई के चक्कर में देश के युवा अनजाने में भारी कर्ज के जाल में फंस रहे हैं. जानिए कैसे फिनटेक कंपनियों के इस नए खेल पर सीए ने युवाओं को बड़ी चेतावनी दी है.
जब आप ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं या वीकेंड पर दोस्तों के साथ पार्टी का प्लान बनाते हैं, तो जेब खाली होने पर भी 'बाय नाउ, पे लेटर' (बीएनपीएल) का विकल्प आपको तुरंत खरीदारी की आजादी दे देता है. महज दो क्लिक में बिना किसी कागजी कार्रवाई के सामान आपके पास आ जाता है. लेकिन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स सुदेशना बसु इस नए ट्रेंड को लेकर बेहद चिंतित हैं. उनके मुताबिक, कॉलेज के छात्रों और नई नौकरी शुरू करने वाले युवाओं में बढ़ा यह 'नो-कॉस्ट ईएमआई' का क्रेज असल में एक सोची-समझी वित्तीय खाई है. युवाओं को लग रहा है कि वे सिर्फ एक आसान सुविधा का फायदा उठा रहे हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह छोटा-छोटा डिजिटल उधार युवाओं को उम्र के शुरुआती पड़ाव में ही डिफॉल्टर बनाने की ओर धकेल रहा है.
चलिए सीए सुदेशना बसु से इस बात को गहराई से समझाते हैं कि यह सिस्टम काम कैसे करता है. आमतौर पर जब आप बैंक से क्रेडिट कार्ड या लोन लेते हैं, तो बैंक आपकी पूरी सैलरी हिस्ट्री और सिबिल स्कोर खंगालने के बाद ही आपको लिमिट देता है. लेकिन बीएनपीएल (BNPL) कंपनियां बिना किसी मजबूत इनकम प्रूफ के, सिर्फ आधार और पैन कार्ड देखकर तुरंत लोन पास कर देती हैं. सीए के अनुसार, ये कंपनियां युवाओं की 'तुरंत सामान पाने' की कमजोरी का फायदा उठाती हैं. युवाओं को लगता है कि यह कोई लोन नहीं बल्कि एक डिजिटल वॉलेट है, जिससे वे कपड़े, गैजेट या ऑनलाइन खाना मंगा रहे हैं. लेकिन हकीकत में यह एक अनसिक्योर्ड पर्सनल लोन होता है, जिसकी शर्तों को युवा बिना पढ़े ही टिक कर देते हैं.
एक चार्टर्ड अकाउंटेंट के तौर पर वह इस बात पर सबसे ज्यादा जोर देती हैं कि युवाओं को लोन की टेक्निकल भाषा समझ नहीं आती. वह बताती हैं कि जब आप किसी ऐप से महज पांच सौ या एक हजार रुपये का भी सामान उधार लेते हैं, तो बैकएंड पर काम करने वाली फाइनेंस कंपनी उसे आपके पैन कार्ड पर एक 'शॉर्ट-टर्म पर्सनल लोन' के रूप में दर्ज कर देती है. अब मान लीजिए कि किसी छात्र की पॉकेट मनी लेट हो गई या वह लापरवाही में दो सौ रुपये की किस्त समय पर चुकाना भूल गया, तो ऐप तुरंत इसकी रिपोर्ट क्रेडिट ब्यूरो को भेज देता है. सीए के मुताबिक, अमाउंट चाहे कितना भी छोटा हो, किस्त बाउंस होते ही सिबिल स्कोर बहुत तेजी से नीचे गिर जाता है और युवाओं का फाइनेंशियल रिकॉर्ड पहली ही बार में खराब हो जाता है.

सुदेशना इस बात को लेकर सबसे बड़ी चेतावनी देती हैं कि कम उम्र में खराब हुआ यह सिबिल स्कोर आगे चलकर युवाओं के बड़े सपनों को पूरी तरह तबाह कर देता है. जब यही युवा तीन-चार साल बाद एक अच्छी और परमानेंट नौकरी में आते हैं और अपनी जिंदगी का पहला घर या गाड़ी खरीदने के लिए बैंक में होम लोन या कार लोन की अर्जी डालते हैं, तो बैंक पुराना खराब रिकॉर्ड देखते ही लोन रिजेक्ट कर देता है. सीए के पास ऐसे कई मामले आते हैं जहां युवाओं को महज कॉलेज के दिनों की एक हजार रुपये की लापरवाही के कारण, नौकरी में आने के बाद भी लाखों का लोन नहीं मिल पाता. बैंक ऐसे ग्राहकों को 'हाई रिस्क' मान लेते हैं, जिससे उन्हें भविष्य में या तो लोन मिलता ही नहीं या फिर बेहद भारी ब्याज दरों पर मिलता है.
सुदेशना का मानना है कि सोशल मीडिया की चकाचौंध और दोस्तों के बीच दिखावे की होड़ ने युवाओं की खर्च करने की आदतों को बिगाड़ दिया है. पहले लोग पैसे बचाने के बाद चीजें खरीदते थे, लेकिन आज ईएमआई कल्चर ने बचत की आदत को खत्म कर दिया है. सीए की सीधी सलाह है कि युवाओं को 'बाय नाउ, पे लेटर' जैसी सुविधाओं को मुफ्त का पैसा समझने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए. अपनी कुल आमदनी या पॉकेट मनी का एक हिस्सा पहले बचाने की आदत डालें. किसी भी फिनटेक ऐप से जुड़ने से पहले उसके छुपे हुए चार्ज और नियमों को ध्यान से पढ़ें, क्योंकि आज की एक छोटी सी डिजिटल लापरवाही आपके पूरे भविष्य की क्रेडिट प्रोफाइल को हमेशा के लिए खराब कर सकती है.
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